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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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महापात वर्णन २४३
हैं । शाकाब्द या किसी अन्य (निकट के) वर्ष से अहर्गण साधन कर उससे ग्रह
निकालने की विधि जिस ग्रन्थ में हो उसे करण ग्रन्थ कहते हैं । इस सिद्धान्त
दर्पण में तीनों ही विधियां हैं ।
नृणां पापं दश दिन कृतं हन्ति सिद्धान्त वेत्ता
दृष्टः सद्यः त्रिदिन जनितं तन्त्रवेत्ता निहन्ति
एकाहोत्थं करण निपुणे यस्तु शास्त्रानभिज्ञ
कालं वृत्ते बहु वृजिनदः सोऽत्र नक्षत्रसूची । ६८ ।
सिद्धान्त ज्ञाता का दर्शन करने से दस दिन का पाप नष्ट होता है । तन्त्र वेत्ता
से ३ दिन का तथा करण जानने वाले के दर्शन से १ दिन का पाप नष्ट होता है ।
जो बिना ज्योतिष जाने काल की चर्चा करता है । वह नक्षत्र सूची है । और उसे
देखने से बहुत पाप होता है ।
चन्द्रं मन्दान्त्रि भसमधिकं प्रेक्ष्य पक्ष्यार्द्ध सिद्धं
द्वित्रिशाढ्या यदिह गदिता सम्मता यत्तथान्यै
चक्रे ऽ जादि स्थितिरपि पृथक्सम्मता यत्तथान्यै
रप्रामाण्या तदखिल मुपादत्तनौ चित्तमाम्रयाः । ६९ ।
भास्कर आदि कई ज्योतिर्विदों ने स्फुट चन्द्र को पक्ष अर्द्ध में मन्द (शनि) से
३ राशि अधिक देखकर अपने सिद्धान्त गणित (सिद्धान्त शिरोमणि) में नक्षत्र ध्रुव
में १/३ अंश जोड़ दिया । अर्थात् उन्होंने स्वयं स्फुट कर प्रत्यक्ष नहीं किया था ।
अन्य कई ज्योतिषियों ने मेष का आदि बिन्दु अलग अलग स्थानों में स्वीकार
किया है । प्रमाण के अभाव में मैने यह स्वीकार नहीं किया है ।
कैश्चित् प्रोक्तं नलिन जनुषः स्वायुषोऽर्द्धं व्यतीतं
कैरप्येतत् पतन मुनिभिः सार्द्ध वर्षाष्ट का द्वयं (८ १/२) ।
तद् वैतद् वा भवतु न ततः कोऽपि लोकोपयोगः
कल्पस्यास्य द्युचर गणितं स्यादिदं तन्मुदेवः । ७० ।
कई के मत से ब्रह्मा की परमायु का आधा (५०) तथा कुछ अन्य विशिष्ट
ऋषियों की मत से (५८ १/२ वर्ष) साढ़े ८ वर्ष अधिक) बीत गया है । इसमें
कोई भी मत ठीक हो उसका कोई लोक व्यवहार में उपयोग नहीं है क्योंकि ग्रह
गणित का वर्णन वर्तमान कल्प (दिन) से ही होता है-आप लोग इसी से सन्तुष्ट
हों)
यस्येच्छा मे निज भजन तो दूर मुत्सार्य बुद्धिम्
दै वाधीनां गणित विपणौ पात यत्यात तायाम्
संख्यातीता नु गत पति तो द्वार कारुण्य सिन्धुः ।
सस्याच्छेतः शरण चरणः सिन्धुजा प्राणबन्धुः । ७१ ।
जिससे मेरी बुद्धि को विष्णु भजन के प्रिय कर्म से दूर गणित बाजार में ठेल