सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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चान्द्रे वारे व्यरचि करणाब्दादि राद्या (१) तिथियाँ
सावैशाखे यदपि मलिने स्पष्ट सूर्येन्दु जेऽभूत्
मध्यार्केन्दूद् भव मलिन मासस्य पूर्ण गतत्वा
तस्याः खेट ध्रुव समुचितः शुद्ध चैत्रादि भावः । ६४ ।
करणाब्द का पूर्व दिन मैंने सोमवार माना है । यह दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
था । स्पष्ट मान से यह वैशाख अधिमास की प्रतिपदा थी । इस करणाब्द आरम्भ
दिन के पहले मध्यम मान का वैशाख अधिमास पूर्ण हो जाने से यह चैत्र प्रतिपदा
शुद्ध माना गया और यही शुद्ध शुक्ल प्रतिपदा सोमवार दिन ग्रह पात आदि का
ध्रुव कहने के लिये अत्यन्त उपयुक्त है ।
एतत् पूर्वं सपद् कृत देवार्ध भृधृत्यहोभि (१८,१५,३३४।१५)
र्या कल्यादौ मधु मुखति थिस्तुल्य मध्येन्दिनोत्था
प्राग्भि प्रोक्ता ध्रुव गण युता सास्फुटे माधवोऽभूत्
तत् खेटादि ध्रुव निगमने मध्य मध्यादिरिष्ट । ६५ ।
करणाब्द आरम्भ से (१८,१५,३३४-१५) दिन पहले कलियुग का आरम्भ लंका
की अर्द्ध रात्रि में हुआ था । उस समय मध्यम मान का चैत्र शुक्ल प्रतिपदा प्राचीन
सिद्धान्तियों के मत से था । पुनः अब करणाब्द (१८६८ ई.) का प्रथम दिन स्पष्ट
मान से वैशाख में पड़ रहा है । यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा निकालने के लिये द्वापारान्त
ध्रुव जोड़ना पड़ेगा । इससे लगता है कि ग्रह, उच्च और पात आदि का ध्रुव कहने
के लिये मध्य और स्पष्ट काल जानना होगा ।
कल्यब्द वेदकृत खगुणै (३०४४) रुनिता विक्रमा ब्दा
स्तेशाकाब्दाः शर गुण कुभि (१३५) स्तेकु पक्षाग्न चन्द्रेः (१०२१)
शास्त्राब्दास्तेऽपिच विधुशरै (५१) र्भास्करीयाब्दकाः स्यु-
स्तेनागेन्द्रे (१४८) रधृति नगै (७१९) कौचना दार्पणाब्दाः । ६६ ।
कलि गत वर्ष से ३०४४ वर्ष घटाने पर वर्तमान विक्रमाब्द होगा । विक्रमाब्द
से १३५ वर्ष घटाने से शकाब्द होगा । शकाब्द से १०२१ घटाने से भास्वती अब्द
होगा ) भास्वती शास्त्राब्द से ५१ वर्ष कम या विक्रमाब्द से १२२१ वर्ष घटाने से
भास्कराब्द होगा भास्कराब्द से १४८ घटाने से कुचनाब्द तथा भास्कराब्द से ७१९
घटाने से दर्पणाब्द (सिद्धान्त दर्पण का) होगा ।
यस्मिन् खेटानयन मुदितं सृष्टिजाद्यहर्गणेभ्यः
सिद्धान्तोऽसौ युगदिन गणात् यद्गतन्त्रं तदेव
यस्मिन् शाकाद्यभिमत समा वासरे व्यस्तयुक्तं
शास्त्रं प्राज्ञैः करण मिति तत्कार्य मत्रास्ति सर्वम् । ६७ ।
जिस (ग्रन्थ) में सृष्टि आदि के अहर्गण द्वारा ग्रह साधन का वर्णन हो उसे
सिद्धान्त कहते हैं । युगादि अहर्गण से जो ग्रन्थ ग्रह साधन करे उसे तन्त्र कहते