सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० सिद्धांत दर्पण
सपादाशुगषड्वह्नि ३६५।१५ दिनैः पूर्वगतिक्रमात् ।
भगणः स्वतनूद् प्रान्त्या द्युरात्रं चास्य सम्भवेत् । ३० ।
इस प्रकार पूर्व दिशा में गति से ३६५।१५ दिन में पृथ्वी का एक भगण पूर्ण
होता है । पृथ्वी का अपने स्थान पर भ्रमण (अपनी धुरी पर) से दिन और रात
होते हैं ।
इत्थं गति र्द्विधा भूमे राहिन की वार्षिकीति च
भ्रमन्त्याः स्वतनौर्यस्मान्नित्यं स्थानान्तर स्थितिः । ३१ ।
इस प्रकार पृथ्वी की आह्निक और वार्षिक-इन दो गतियों के कारण क्रमशः
दिन रात तथा वर्ष होते हैं । पृथ्वी की वार्षिक गति के कारण प्रतिदिन उसकी
अलग अलग स्थान में स्थिति होती है ।
न पतन्ति जना भूमे र्मध्याकर्षण शक्तितः
पश्यन्त्यर्कादिकान् भ्रान्तान्ना विका हि नगानिव । ३२ ।
पृथ्वी के केन्द्र की तरफ आकर्षण शक्ति होने के कारण लोग पृथ्वी से किसी
दिशा में गिरते नहीं है । जिस प्रकार स्वयं गति शील नाव में नाविक लोगों को
नाव स्थिर तथा पर्वत चलता हुआ लगता है उसी प्रकार पृथ्वी के लोगों को
पृथ्वी स्थिर पर ग्रह नक्षत्र आदि गतिशील लगते हैं ।
भुवि मेषादि निष्ठायां तुलादौ दृश्यते रवि
दक्षिणोत्तर गायान्तु सौम्य याम्यापमौ तथा । ३३ ।
पृथ्वी मेषादि में रहने पर सूर्य तुलादि में दीखता है। पृथ्वी की दक्षिण और
उत्तर गति (झुकाव) के कारण सूर्य की क्रमशः उत्तर और दक्षिण क्रान्ति होती
है ।
बुध शुक्रावनी भौम गुरुमन्दाः क्रमाद्रवे
दूरत्वान्मन्द गतयः परिगच्छन्तितं प्रति । ३४ ।
बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, गुरु और शनि क्रमशः सूर्य से अधिक दूर हैं। दूर
होने के कारण क्रमशः इनकी गति मन्द होती जाती है । अपनी अपनी गति से ये
सूर्य की प्रदक्षिणा करते हैं ।
तान् प्रत्युपग्रहाः क्षुद्रा भ्रमन्तस्थो समंपुनः
भ्रमन्त्यर्कं यथाकृष्टो भुवेन्दुस्तां परिभ्रमन् । ३५ ।
क्षुद्र उपग्रह ग्रहों की परिक्रमा करते हैं और ग्रहों के साथ रहने के कारण
सूर्य की भी परिक्रमा करते हैं । उदाहरण स्वरूप पृथ्वी का उपग्रह चन्द्र पृथ्वी
की परिक्रमा करता है और पृथ्वी के साथ (पृथ्वी की कक्षा में) रहकर सूर्य की
भी परिक्रमा करता है ।
भ्रान्ति रूपाय आलोक ऋतु भेदाश्च सूर्यतः
भू विग्रहेषु कार्याणि सर्वाणि स्युर भेदतः । ३६ ।