सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 346, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न वर्णनम् २४९
इन द्वीपों और सागर के बाहर लोकालोक पर्वत है जिसका भूभाग स्वर्णमय
है । इस पर्वत के बाहर ब्रह्म कटाह की भूमि घेरे हुए हैं ।
भानु मति भूपृष्ठा ल्लक्षयोजन दूरगः
मज्नु द्यन्निवा भाति तिर्यङ्ङत्यन्त दूरगः । २३ ।
भू पृष्ठ से १ लाख योजन दूर सूर्य परिभ्रमण करते हैं । भू पृष्ठ से अत्यन्त दूर
और तिरछा (स्पर्श रेखा) होने कारण सूर्य का उदय और अस्त होना दीखता है ।
भ्रमन्ति चन्द्र भौमाद्यां उपर्युपरि सूर्यतः
ध्रुवान्तः स च मेरु र्ध्वे ततो लोकाः स्थिता इति । २४ ।
सूर्य के ऊपर ऊपर चन्द्र, मंगल आदि ग्रह भ्रमण करते हैं । इन सबके ऊपर
ध्रुव की स्थिति । ध्रुव तारा मेरु के ठीक ऊपर है । ध्रुव के ऊपर क्रमशः महः,
जन, तप आदि लोक है ।
बौद्धास्तु भ प्रमालोकान्तिरा धारां कुमब्रुवन्
खेऽधोयात्तीञ्च स्वस्थस्या दशनाद् गुरु वस्तुनः । २५ ।
बौद्ध मत के अनुसार पृथ्वी के चारों तरफ नक्षत्र भ्रमण करते हैं । अतः पृथ्वी
का आधार किसी भी दिशा में नहीं है । आकाश में कोई भारी वस्तु नहीं होने
के कारण उनकी कल्पना है कि पृथ्वी लगातार नीचे जा रही है ।
जैना वदन्ति सूर्येन्दु द्वौ द्वौ च भगणौ तथा
चतुष्कोण स्तम्भ रूपं मेरु मध्यगतः स्थिरम् । २६ ।
जैन मत के अनुसारर आकाश में २ सूर्य, २ चन्द्र तथा ५४ नक्षत्र हैं । वे
चतुष्कोण स्तम्भ (चतुर्भुजाकार) के समान स्थिर मेरु पर्वत की-
पर्यंति भूर्जलान्तः स्थात्तस्यादार्कदियोजनैः
त एकान्तर मुद्यन्तो दृश्यन्ते मेरु कोणतः । २७ ।
परिक्रमा जल के भीतर रह कर करते हैं । अतः मेरु कोण से एक के बाद
एक क्रम से सूर्य का उदय दिखायी देता है ।
इंग्लैण्ड पण्डिताः सूक्ष्म मतयः कथयन्ति च
भूगोला वर्तुलः क्षुद्रो भौमादि ग्रहवद्दिवि । २८ ।
सूक्ष्म बुद्धि के इंग्लैण्ड के पण्डितों को कहना है कि पृथ्वी स्वयं दीर्घ
वृत्ताकर है और आकाश में मंगल आदि ग्रहों के समान -
स मध्यस्थ वृहत्सूर्य बिम्बस्य वयवप्रमैः
आकृष्टश्चक्र वद् भ्रान्ति क्रान्ति वृत्ते ब्रजत्यसौ । २९ ।
बहुत बड़े सूर्य बिम्ब से आकर्षण से क्रान्ति वृत्त में चक्र की तरह परिक्रमा
करते हैं ।