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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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२३६ सिद्धान्त दर्पण
कालेन यावता यावल्लभ्यतेऽप्यक्रमान्तरम्
तत्षष्टि गुणितं तत्तकाल नाड़ी हतं गतिः । ३२ ।
संस्कृत काल के क्रान्ति अन्तर को इष्ट नाड़ी से गुणा कर द्वितीय क्रान्ति गति
से भाग देने पर घटिका फल से संस्कृत समीकरण काल का पुनः संस्कार करेंगे ।
इष्ट काल के क्रान्त्यन्तर को ६० से गुणा कर इष्ट काल से भाग देने पर क्रान्ति
गति होगा ।
असकृत् कर्म संसिद्ध काल भुक्त्यपमान्तरैः ।
क्रान्त्योः साम्यं यदा स स्यात् मध्यः कालोऽन्तिमा गतिः । ३३ ।
इस प्रकार बार बार करने से इष्ट काल के क्रान्ति की अन्तर गति जो होगी,
उससे उस समय के रवि और चन्द्र की स्फुट क्रान्ति में समानता आयेगी । वही
पात मध्य काल होगा । अन्तिम गति पात मध्यकाल की क्रान्ति अन्तर गति होगी ।
पूर्णो योगस्तदैव स्याद् बिम्बयोर्मध्य विन्दुजः
स्थिति काला वगतये स्पर्शमोक्षौ ब्रुवेऽधुना । ३४ ।
पात के आदि से अन्त तक पूरा समय जानने के लिए पात के स्पर्श और
मोक्ष के बारे में मैं अब कहता हूँ ।
पूर्व वद् बिम्ब योर्मान योगार्द्ध रवि चन्द्रयोः ।
आनीयाभ्ररसा (६०) भ्यस्तं क्रान्ति गत्यन्त्ययो भजेत् । ३५ ।
चन्द्र ग्रहण की विधि से पात मध्य कालीन रवि और चन्द्र का बिम्ब निकाल
कर उनका मानैक्यार्द्ध (बिम्ब मान के योग का आधा) निकालेंगे । उसे (मानैक्यार्द्ध
को ६०) से गुणा कर अन्तिम क्रान्ति गति से भाग देंगे ।
लब्धा भवन्ति पातस्य मध्य स्थित्यर्द्ध नाड़िकाः ।
मध्य कालस्तदु नाड्य स्पर्शो मोक्षस्य मध्यमः । ३६ ।
फल पात की मध्यम स्थिति अर्द्ध नाड़ी होगी । पातमध्य काल से इसे घटाने
पर मध्यम स्पर्श काल तथा पात काल में मध्यम स्थिति अर्ध जोड़ने पर मध्यम
मोक्ष काल होगा ।
तत्काल प्रभवाकेंन्दु स्फुट क्रान्त्यो यदन्तरम्
तन्मान योगदलतो न्यूनं चेत् स्पर्शको गतः । ३७ ।
पुनः तत्कालीन रवि और चन्द्र की स्फुट क्रान्ति का अन्तर करेंगे । यह
मानैक्यार्द्ध से कम होने का अर्थ है कि स्पर्श समय बीत गया है (या मोक्ष होने
वाला है ।
मोक्षो भावो यदा तस्मात् बहुक्रान्ति द्वयान्तरम् ।
स्पर्शो भावो गतो मोक्षस्तत् क्रान्त्यन्तर लिप्तिकाः । ३८ ।