सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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जिस नीलाद्रि विहारी पापनाशी जगन्नाथ के लिए सारा जगत् लीलाभूमि
है, उनके तेज का हृदय में ध्यान कर उनके अनुग्रह से मैने ग्रहगणित लिखना
समाप्त कर अब प्रसन्नापूर्वक गोल गणित आरम्भ करता हूँ जिसके बारे में प्राचीन
सिद्धान्तियों ने विस्तार से लिखा है ।
सिद्धान्त जातोद्धृत वाक्यचक्र सन्दर्भितात्म प्रथिताग्र्य पद्यैः
गोलं ब्रुवे बाल विबोधनाय वाचं पुरस्कृत्य च भास्करीयाम् । ५ ।
अनभिज्ञ लोगों को भी गोल गणित समझाने के लिए इसके विषय में मैंने
मुख्यतः भास्करा चार्य के कथनों की व्याख्या की है, इसके अतिरिक्त कहीं कहीं
अन्य आचार्यों के विचार दिये हैं तथा प्राचीन सिद्धान्तों के अध्ययन से उत्पन्न
मेरे विचार भी हैं।
सिद्धान्त शिरोमणौ-मध्याद्यं द्युषदां यदत्र गणितं तस्योपपत्तिं विना
प्रौढं प्रौढ सभा सुनैति गणको निः संशयो न स्वयम् ।
गोले सा विमला करामलकवत् प्रत्यक्ष तो दृश्यते ।
तस्मादास्म्युपपत्ति बोध विधये गोल प्रबन्धो द्यतः । ६ ।
ज्योतिष में ग्रहों का मध्य, स्फुट आदि गणित का वास्तविक अर्थ नहीं जानने
से ज्योतिषी के मन में सन्देह बना रहता है तथा वह विद्वत् समाज में आदर नहीं
पाता है । इस गणित का रहस्य हाथ में रखे आंवले के समान स्पष्ट भाव से
दिखायी दे- इस उद्देश्य से मैं गोल ग्रन्थ की रचना कर रहा हूँ।
भोज्यं यथा सर्व रसं विनाज्यं राज्यं यथा राज विवर्जितञ्च
सभान भातीव सुवक्तृ हीना गोलानभिज्ञो गणकस्तथैव । ७ ।
घी के विना सभी रसों का भोजन, राजा के बिना राज्य तथा ज्ञानी वक्ता के
बिना सभा की जिस प्रकार शोभा नहीं होती है उसी प्रकार गोल ज्ञान के बिना
गणक भी व्यर्थ है ।
वाग्मीव्याकरणं विनैव विदुषां धृष्टः प्रविष्टः सभां
जल्पन्नल्पमति स्म यात् पटुवटु भ्रूभंग वक्रोक्तिभिः
हीनः सन्नुपहास मेति गणको गोलानभिज्ञ स्तया
ज्योतिर्विद सदस प्रगल्भ गणक प्रश्न प्रपञ्चोक्तिभिः । ८ ।
कोई धूर्त वक्ता बिना व्याकरण ज्ञान के विद्वानों की सभा में बकवाद कर
उनके व्यंग दृष्टि और वचनों का शिकार होकर लज्जित होता है । इसी प्रकार गोल
नहीं जानने वाला गणक भी ज्योतिषियों की सभा में विभिन्न प्रकार के प्रश्न और
कौतुक उक्ति नहीं समझ कर उपहास का पात्र बनता है ।
दृष्टान्त एवावनिभ ग्रहाणां संस्थान मान प्रतिपादनाथर्म्
गोलः स्मृतः क्षेत्र विशेष एषप्राज्ञै रतः स्याद् गणकेन गम्यः । ९ ।