सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न वर्णनम् २५५
आयन दृक् कर्म में कदम्ब प्रोतीय शर को ध्रुव प्रोतीय करने पर प्राचीन रीति
से साधारणतः कम हो जाता है ।
भवन्मते तु सूक्ष्मस्य स्फुटस्य विशिखस्य किम् ।
क्रान्ति संस्कार योग्यस्य मध्यतोऽधिकतेक्ष्यते । ६५ ।
परन्तु आपके मत से शर का क्रान्ति संस्कार करने पर वह अधिक क्यों हो
जाता है ?
ग्रहोडुभिर्बहुतरै र्विहायसि महीयसि
व्याप्तेऽसि निशि किं न स्या दहनीव तमोहतिः । ६६ ।
अनन्त आकाश में असंख्य ग्रह और तारा व्याप्त हैं तथापि रात में दिन के
समान अन्धकार का नाश क्यों नहीं होता ?
सूर्यस्य किरण व्याप्तिः कतियोजन सम्मिता
कियती सा ग्रहक्षाणां कियद्दूरे च दृश्यता । ६७ ।
सूर्य की किरण कितने योजन तक जाती है ? ग्रह और तारों का प्रकाश कितने
दूर तक जाता है ? (वे कितने दूर से दीखते हैं ?)
क्षुणानि कुदिनानि स्यु ग्रहाणां गति योजनैः ।
ख कक्षा योजनानीति श्रुतिं यत्तदि हत्वयाः । ६८ ।
कल्प सावन दिन में दैनिक ग्रह योजन गति से गुणा करने पर ब्रह्माण्ड का
कक्षा योजन (परिधि की लम्बाई) होता है ऐसा श्रुति (वेद या प्राचीन शास्त्र) में
कहा गया है । पर यहां पर आपके अनुसार
निरस्त संगति वैषम्याद् यदि तद् वेष्टनं दिवः
भवन्मते कियन्मानं ब्रह्माण्डोदर नामकम् । ६९ ।
ग्रहों की दैनिक योजन गति समान नहीं है, अतः शास्त्र वाक्य खण्डित हुआ
(उसके अनुसार ब्रह्माण्ड का कक्षा का योजन नहीं आयेगा) । इस अवस्था में
आपके अनुसार ब्रह्माण्ड का परिधि मान कितना है ? और वह कैसे ज्ञात होगा ?
ग्रहर्क्षा स्तोदयौ यद्वा दृक् कर्मर्थ्यं त्वयादितौ ।
तथाकिं भवतो मेरौ न वा तन्निर्णयं वद । ७० ।
आपने आक्ष और आयन दृक् कर्म दोनों के द्वारा ग्रह और नक्षत्रों का उदय
और अस्त साधन करने को कहा है । क्या मेरु क्षेत्र में भी वह इसी प्रकार किया
जायेगा ? इसका निर्णय करें ।
क्षीयमाणाः कलादेवैः पीयन्तेऽमृत दीधितेः
इतिवादः पुराणाना मनृतः किमृतो मतः । ७१ ।
देवता लोग चन्द्र किरण का पान करते हैं । इस प्रकार पुराणों का वचन