सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहापात वर्णन २३९
स्फुट क्रान्ति के लिये यह (अयन, भेद) लिया जाता है । गोल सन्धि में स्फुट
क्रान्ति का शर के कारण अयन भेद नहीं होता । किन्तु अयन सन्धि में क्रान्ति
गति का शर गति के कारण अन्तर पड़ता है । इसका कारण है गोल सन्धि में
क्रान्ति गति अधिक और अयन सन्धि में कम होती है ।
याम्य सौम्येऽयने चन्द्र सौम्य याम्य गतिः शरात्
दृष्टाप्ययन साम्मुख्या भावान्नायन भिन्नता । ५२ ।
दक्षिण और उत्तर गोल में शर के कारण चन्द्र की क्रमशः उत्तर और दक्षिण
गति (स्फुट क्रान्ति की उत्तर और दक्षिण गति) दीखने पर भी आयन के अनुसार
दिशा का अन्तर नहीं होता है ।
पातेन दूरतः खेटो विक्षिप्तोऽपि स्वपार्श्वयोः
न त्यजेत्क्रान्ति वृत्तस्य साम्मुख्यं हि कदाचन । ५३ ।
पात द्वारा ग्रह (चन्द्र) क्रान्ति वृत्त के दक्षिण और उत्तर की तरफ विशेष
विक्षिप्त होने (फेंके जाने) पर भी वह क्रान्ति की दिशा में ही चलता रहता है ।
क्रान्ति वृत्त की दिशा में गति नहीं बन्द होती, कितना भी अधिक शर क्यों न
हो ।
वराह मिहिराचार्ये वृहद् यात्रा ह्वये श्रुते
व्यवस्था विहिता सैव बहु युक्त पुरः सरम् । ५४ ।
वृहद्यात्रा नामक ग्रन्थ में वराह मिहिराचार्य ने महापात (वैधृति तथा
व्यतीपात) की गोल और अयन व्यवस्था का बहुत युक्ति युक्त वर्णन किया है ।
रवीन्दु योगतो योगो ये सप्त विंशतिः पुरा
साधिता स्तत्र यो सप्त विंश सप्तदशा विमौ । ५५ ।
पहले ग्रह स्फुट अध्याय में रवि और चन्द्र की राशि आदि योग के अनुसार
२७ योगो का वर्णन किया गया है । इन २७ योगों में २७ वां तथा १७ वां योग-
वैधृति व्यतीपाताख्यौ योगावत्यन्त दारुणौ
तौ हि खार्जुर चक्रैकार्गलगार्केन्दु दृग् भवौ । ५६ ।
क्रमशः वैधृति तथा व्यतीपात कहे जाते हैं । जो कि अत्यन्त दारुण योग हैं ।
सूर्य और चन्द्र क्रान्ति होने से) खार्जुर चक्र में एक लकड़ी से बंधे (तेल पेरने की
घानी या अन्न का दाना अलग करने की लिए बैलों की जोड़ी) रहने से दोनों
अत्यन्त क्रुद्ध होते है और उनकी दृष्टि से यह दो योग उत्पन्न होते हैं ।
सूर्य सिद्धान्ते- सार्पे (९) न्द्र (१८) पौष्ण (२७)
धिष्ण्या नामन्त्याः पादाभ स्कन्धयः
तदग्रभा (१०।१९।१) द्यपादाद्धं गण्डान्तं
नाम कीर्त्यते । इति । ५७ ।