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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 344, कुल 609 में से

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प्रश्न वर्णनम् २४७
पृथ्वी, तारा और ग्रहों की स्थिति परिमाण आदि समझाने के लिए गोल एक
दृष्टान्त (प्रतिरूप या model) है । विद्वानों ने गोल को एक क्षेत्र (स्वतन्त्र विषय)
माना है । जिसे कोई गणक गणित की सहायता से ही समझ सकता है ।
ज्योतिः शास्त्र फलं पुराण गणकै रादेश इत्युच्यते
नूनं लग्नबलाश्रितं पुनरिदं तत्स्पष्ट खेटाश्रयम्
ते गोला श्रयिणोऽन्तरेण गणित गोलोऽपिन ज्ञायतेः
तस्माद् यो गणितं न वेत्ति सकथं गोलादिकं ज्ञास्यति । १० ।
प्राचीन गणकों ने ज्योतिष शास्त्र फल को आदेश (प्रमाणिक) माना है । फल
लग्न के अनुसार होता है, लग्न ग्रह (पृथ्वी) की स्थिति के अनुसार है । बिना
स्पष्ट ग्रह जाने केवल लग्न द्वारा फल नहीं कहा जा सकता है । सभी ग्रह (ब्रह्माण्ड
रूपी) गोल में ही भ्रमण करते हैं । अतः स्पष्ट ग्रह जानने के लिये गोल आवश्यक
है । गोल गणित द्वारा ही समझा जा सकता है । अतः जो गणित नहीं जानता
वह (गोल आदि) ज्योतिष कैसे जान सकता है ?
द्विविध गणित मुक्तं व्यक्त मव्यक्त युक्तं
तद व गमन निष्ठाः शब्दशास्त्रे पचिष्ठः
यदि भवति तदेवं ज्योतिषं भूरि भेदं
प्रपठित मधिकारोऽस्यान्यथा नामधारी । इति । ११ ।
गणित दो प्रकार का है- व्यक्त (पाटी) और अव्यक्त (बीज) । इन दो प्रकार
के गणित तथा व्याकरण (शब्द शास्त्र) का अच्छा ज्ञान होने पर ही कोई ज्योतिष
शास्त्र पढ़कर समझ (पचा) सकता है, अन्यथा वह नाम मात्र का ही ज्योतिषी
होगा । (सिद्धान्त शिरोमणि का उद्धरण समाप्त)
गुर्वन्ते वा सिसंवाद व्याजेनाथ विविच्यते ।
तत्व ख भू भगोलानां वासना वगतिर्यतः । १२ ।
गुरु और शिष्य के संवाद रूप में अब आकाश, पृथ्वी तथा नक्षत्र गोल का
वर्णन किया जा रहा है, जिससे सभी का कारण (वासना या रहस्य) ज्ञात होगा ।
तत्र भोः श्रीमदाचार्य निजवागमृते न यत्
त्व योक्तं खेट गणितं गोलारुयं यच्च सूचितम् । १३ ।
(शिष्य)- हे आचार्य महोदय, आपने अपनी अमृत समान वाणी से जो ग्रह
गणित कहा तथा गोल के विषय में सूचना दी ।
तेन मे द्वापर लता वृद्धैव न तु वर्द्धिता
नाना मत द्रुमालम्ब बहु शास्त्रीकृता यतः । १४ ।
उससे मेरा सन्देह और बढ़ा है, घटा नहीं है-क्योंकि आपने जो कहा वह
अनेक आचार्यों के मत रूप वृक्ष और उनकी बहुत सी शाखायें है जिसमें बहुत