सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ सिद्धान्त दर्पण
स्नान दान जप श्राद्ध व्रत होमादि कर्मभिः
प्राप्यते सुमहत् श्रेयः तत् कालज्ञानतः तथा । इति । ४५ ।
पात का समय जान कर उस समय ग्रहण काल के समान स्नान, दान, जप,
श्राद्ध, व्रत और होम आदि करने से अनेक प्रकार का मंगल होता है । (उद्धरण
समाप्त)
मध्यमः स्थिति कालोऽस्य प्रहर द्वितीयं भवेत्
नव दण्डात्मकोन्यूनः सत्र्यंशाहर्द्वयं (२।२०) महान् । ४६ ।
पात का मध्यम स्थिति काल दो प्रहर अर्थात् १५ दण्ड होता है । न्यूनतम
स्थिति काल ९ दण्ड तथा अधिकतम स्थिति काल (२।२० ) दिन होता है ।
चक्रान्ते चन्द्र पातोच्चौ रविश्चक्रान्त सन्निधौ
चन्द्रश्चेद् भार्द्धगस्तत्र पातस्याल्पस्थिति र्भवेत् । ४७ ।
१२ राशि के अन्तिम भाग में चन्द्र का उच्च तथा पात रहे, १२ राशि के निकट
सायन रवि तथा ६ राशि के निकट सायन चन्द्र होने पर पात का स्थिति काल
अत्यन्त कम होता है ।
चन्द्रोच्च पात शशिनो यदिस्सुः कर्कटादिगाः
धनुरन्त्यां श्रितो भानु स्तदा स्यात् सुचिर स्थितिः । ४८ ।
चन्द्र का उच्च, पात और स्वयं चन्द्र (सायन) यदि कर्क राशि के आरम्भ में
हों, (सायन) सूर्य धनुराशि के अन्तिम पाद में हो तो पात का स्थिति काल दीर्घ
होता है ।
पातोऽत्र द्वित्रिभागोनः स्यात् चेत् द्विः सन्निधौ भवेत ।
अयनान्ते विधोर्न स्याद् गजाक्षं (२८) शाधिकेऽपमे । ४९ ।
चन्द्र का पात यदि कर्क के आरम्भ में रहने के बदले मिथुन राशि के २८
अंश से कर्क के १ अंश के बीच में रहे तो अति कम समय में २ बार क्रान्ति
साम्य होता है । अयन समाप्ति के समय यदि चन्द्र की स्पष्ट क्रान्ति २८ अंश से
अधिक हो तो उसका क्रान्ति साम्य बिल्कुल नहीं होता है ।
अत्र विक्षेप जो ग्राह्यो गोल भेदः सितद्युतेः