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सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

२३० सिद्धान्त दर्पण
न्यूना यद् गुरु बिम्बतो भवति तद् व्यक्तौ तदस्तोदयौ
रुद्रां (१) शैर्नतु सिद्धतोऽपरमत द्योत प्रवेश क्रमात् । ६६ ।
सूर्य से चन्द्र ११ अंश दूर रहने पर इसका प्रकाश १७ विकला के बुध बिम्ब
से अधिक और वृहस्पति के तेजस्वी बिम्ब से कम होता है । अतः जो लोग ११
अंश दूरी (कालांश) पर चन्द्र का उदय और अस्त मानते हैं वह ठीक नहीं है ।
(प्राचीन आचार्य चन्द्र का उदयास्त कालांश १२° मानते हैं । कई ११° मानते हैं ।
किन्तु लेखक ११° तथा ११° के बीच मानते हैं ।
बिम्बस्याष्टोत्तर शत (१०८) लव प्रेक्ष्य ते शुक्लपक्षे
प्राक्तिष्यन्ते (१) तनुरपि विधोः षष्ठ भागश्चतुर्थ्याम्
पञ्चम्यन्तेऽङ्घ्रि रथ दशमी प्रान्तभागे त्रिपादाः
पक्षान्ते (१५)ऽर्द्धे (८) खिलदल भृति वैष्णवान्ते (११) ऽरसांशः । ६७ ।
शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के अन्त में चन्द्र मण्डल का १०८ भाग अति सूक्ष्म होने
पर भी दीखता है । उसी पक्ष की चतुर्थी तिथि के अन्त में उसका १/६ भाग शुक्ल
दीखेगा । पञ्चमी तिथि के अन्त में १/४ भाग शुक्ल होगा । दशमी तिथि के समाप्त
होने पर ३/२ भाग शुक्ल होगा । पूर्णिमा में पूर्ण बिम्ब शुक्ल होगा । अष्टमी तिथि
में आधा बिम्ब शुक्ल तथा एकादशी के अन्त में ५/६ भाग शुक्ल दीखेगा ।
क्षीरोदरोधसि धरो परि रोचमानः
सारो जबान्धवि सरोक्षत रोक्तिरोपात्
नारोप गोपन परोऽरिधरो विरोधि-
मारोत्थरोग निकरोपरतिं करोत । ६८ ।
समुद्र कूल (पुरुषोत्तम क्षेत्र में) शोभित जो सुदर्शन चक्र धारी श्री जगन्नाथ
सूर्यपुत्र यम के क्रोध से लोगों की रक्षा करते हैं, तथा काम जनित सभी रोगों का
नाश करते हैं, वे हमारी कामना जनित सभी व्याधि दूर करें ।
इत्युत्कलो ज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्र शेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
शृङ्गोन्नतिर्व्यगम दिन्द्र (१४) मितः प्रकाशः । ६९ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा
वास्तविक घटना के समान गणना के लिए तथा छात्रों की शिक्षा के लिए लिखे
सिद्धान्त दर्पण में चन्द्र शृङ्गोन्नति सम्बन्धी १४ वां अध्याय समाप्त हुआ ।

पञ्चदश प्रकाश
महापात वर्णन
यात्रादीनां शुभ फलं मलं कर्मणा सकृतानां
यस्मिन् भस्मी भवति गण का यत्र मुह्यन्ति भूयः
तं योगेन्द्रं विवरण जयाद्येषु सूर्योपराग
प्रख्यं वक्ष्याम्यह मिह महापात मातत्य तत्त्वात् । १ ।
सज्जनों के यात्रा, उपनयन, विवाह आदि के शुभ कर्म जिस महापात के
कारण भस्म हो जाते हैं, जिस महापात की चर्चा में सिद्धान्ती लोग भी भ्रमित हो
जाते हैं, और जिस महापात में योग में दान, जप और स्नान आदि का फल सूर्य,
ग्रहण के समान ही शुभ होता है । उसी महापात का वर्णन मैं विभिन्न शास्त्रों
के अनुसार कर रहा हूँ ।
वैधृत्य व्यतिपाताख्यौ भेद्यौ पातस्य कीर्त्तितौ
गोलायन क्रान्ति भेद सम्भवौ रवि चन्द्रयोः । २ ।
पाद दो प्रकार के हैं- वैधृति और व्यतीपात । सूर्य और चन्द्र दोनों की क्रान्ति
बराबर होने पर पात होता है । एक ही अयन में रहने पर (भिन्न गोल में) वैधृति
योग तथा भिन्न अयन और एक गोल में रहने पर व्यतीसपात होता है ।
स्याद् गोल सन्धिरर्केन्दो र्विषुवद् वलयस्थयोः
सन्धि रायन एव स्यात् परमापक्रम स्थयोः । ३ ।
रवि और चन्द्र विषुव वृत्त (बृहत् अहोरात्र वृत्त) में रहने पर दोनों की गोल
सन्धि होती है । दोनों परम क्रांति के स्थान पर रहने से उनकी अयन सन्धि होती
है ।
क्रान्ति साम्यं यदा भिन्नायनयोः एव गोलयोः ।
योगः स्याद् व्यति पातारूयं तदा चन्द्रविवस्वतोः । ४ ।
रवि और चन्द्र एक गोल तथा भिन्न अयन में रहने पर जब दोनों की क्रान्ति
बराबर हो तो व्यतीपात योग होता है ।
विभिन्न गोल यो रेकायनयोः क्रान्ति तुल्यता
यदा तदा वैधृतारूयः सम्भवेद् दृष्टि योगजः । ५ ।
रवि और चन्द्र भिन्न गोल में पर एक ही अयन में हों और क्रान्ति बराबर हो
तो वैधृति योग होता है । क्रान्ति समान होने पर परस्पर दृष्टि योग होता है ।
सूर्य सिद्धान्ते-तुल्यांशु जाल सम्पर्का त्तयस्तु प्रवाहाहतः
तद् दृक् क्षेपोद् भवो वह्नि लोका भावाय जायते । ६ ।
(सूर्य सिद्धान्त में) रवि और चन्द्र दोनों की समान क्रान्ति होने पर उनकी

२३२ सिद्धान्त दर्पण
समान दिशा (या शक्ति) की किरणों के संयोग से अग्नि प्रवाह होता है । जिससे
प्राणी जगत नष्ट होता है ।
विनाशायाति पातोऽस्यः लोकानाम सकृद् यतः
व्यतिपातः प्रसिद्धोऽतः संज्ञा भेदेन वैधृतिः । ७ ।
अति पात योग सदा अकल्याण कर और संसार का विनाश करने वाला
होता है । इसी के अन्य नाम व्यतीपात तथा वैधृति भी हैं ।
यत्कृष्णो दारुण वपु र्लोहिताक्षो महोदरः
सर्वानिष्ट करो रौद्रो भूयोभूयः प्रजायते । इति । ८ ।
प्रत्येक पात का वर्ण कृष्ण, शरीर अति भयंकर तथा आखें लाल होती हैं ।
ये दोनों अति प्रचण्ड हैं और प्रति मास ये दोनों उत्पन्न होते हैं । (मध्यम मान
की तुलना में स्पष्ट मान से पात होना अधिक अनिष्ट कारी होता है । (सूर्य सिद्धान्त
उद्धरण समाप्त)
चलांश संस्कृताकै र्न्दयोर्योगश्चक्रं यदा भवेत्
तदा सन्निहितो योगो वैधृत्यः पुनरेतयोः । ९ ।
अपनांस संस्कृत रवि और चन्द्र का राशि आदि का योग जब १२ राशि हो
तब वैधृति योग निकट होता है ।
योगात् षड् भवनान्यष्टा दर्श वास भवन्ति चेत्
व्यतिपातस्तदासन्नो भिन्न पादस्तयो स्तुतौ । १० ।
इसी प्रकार अपनांश संस्कृत रवि और चन्द्र आदि की राशि आदि का योग
६ राशि या १८ राशि होता है । तो व्यतीपात योग आसन्न होता है । रवि और
चन्द्र दोनों वृत्त के भिन्न पादों (९०°) में रहने पर ही पात होता है ।
प्रायः तत् सम्भवो मासे द्विर्भवेत् न क्वचिद् भवेत्
क्वचित्सन्निहिते काले द्विःस्याद् विक्षेप भेदतः । ११ ।
प्रायः प्रतिमास दोनों योग (वैधृति और व्यतीपात) एक एक बार होते हैं)
किसी किसी मास में बिल्कुल ही पात नहीं होता है । चन्द्रशर की उन्नता के
कारण कभी कभी जल्दी जल्दी पात होता है - तब एक मास में २ बार भी ये
पात होते हैं ।
पात सम्भव कालोत्थ योगान् वक्ष्येयनांशकैऽ
कली कृतैर्युगुणितैश्चक्र (२१,६०००) चक्रार्द्ध (१०,८००) जाः कलाः । १२
पात सम्भावना कला के समय होने वाले विष्कम्भक आदि योगों का विवरण
दे रहा हूँ। अयनांश को कला कर दो गुणा करते हैं । इसको चक्र कला (२१,६००)
तथा चक्रार्द्ध कला (१०,८००) में-

महापात वर्णन २३३
विलोम संस्कृता शक्रा धिकाश्चेत् चक्र शोधिताः ।
खखाष्टा (८००) प्ता गता योगा विष्कुम्भाद्याः सरूपकाः । १३ ।
विलोम संस्कार (अयनांश योग होने पर वियोग तथा ऋण होने पर योग)
करते हैं । फल (२१,६००) से अधिक होने पर उसमें चक्र घटाते हैं । शेष में
(८००) से भाग देने पर लब्धि विष्कुम्भ आदि से गत योग होगा । लब्धि में एक
जोड़ने पर -
वर्त्तमानस्ततः शेषात् षष्टिघ्नाखशराष्टभिः (८५०)
भाजितात् फल नाड्याद्या यदा सूक्ष्मा भवन्ति हि । १४ ।
वर्त्तमान योग की संख्या होगी । (८००) से भाग देने पर बचे शेष को ६०
से गुणा कर (८००) से भाग देने पर जितना नाड़ी आदि फल होगा उसे वर्तमान
योग में जोड़ने पर वह सूक्ष्म होता है ।
तदैवेन्दु शराभावे स्यान् मध्य समयः शरात्
प्राक् पश्चात् सम्भवेत्पातः साध्यताः प्रथमं ततः । १५ ।
इस समय चन्द्र का शर नहीं रहने पर पात का भी समय होता है । शर होने
पर इस समय से पहले या बाद में पात होता है । अतः पहले मध्यंम मान के
अनुसार क्रान्ति समान होने पर स्थूल पात का साधन करना चाहिये ।
अथेदानीं शुक्लं (२४) वृद्धौ तदीया (३) दम पादयो
भवति प्रायशो मध्य वैधृत्य व्यतीपातयोः । १६ ।
अभी (१८६८ ई.में) अयनांश २२° है । इस समय शुक्ल (२४ वां) तथा वृद्धि
(११ वां) योग में क्रमशः वैधृति ३ य पाद तथा व्यतीपात प्रथम पाद प्रायः पड़ता
है । अतः उस समय को इनका मध्य समय कहा जाता है ।
अतोऽनुमानाय तत्कालं चक्र चक्रार्द्धं जं यतेः ।
तद् योग दिनजौ कार्यों सूक्ष्मो सूर्य निशाकरौ । १७ ।
अतः शुक्ल योग और वृद्धि योग को चक्र (२१,६००) और चक्रार्द्ध (१०,८००)
का समय मान कर उस दिन का तात्कालिक सूक्ष्म सूर्य और चन्द्र साधन करेंगे ।
न्यूनाधिका विलिप्तासु तद् भुक्त्यन्तर भाजिताः
लब्धैर्दण्डादिभिः कालः पूर्वः कार्यो युतोनितः । १८ ।
(रवि और चन्द्र) दोनों का अयनांश संस्कार कर जोड़ेंगे । योगफल शुक्ल योग
में (२१,६००) कला से और वृद्धि योग में ( १०,८००) कला से कितना कम या
अधिक है यह ज्ञात करेंगे । इसको चन्द्र और रवि के गति अन्तर कला से भाग
देने पर लब्धि दण्ड आदि होगा । इस दण्ड आदि को पूर्व अनुमानित समय में
योग या वियोग करेंगे । (रविचन्द्र योग कला चक्र या चक्रार्द्ध से कम हो पर
योग अन्यथा वियोग)

२३४ सिद्धान्त दर्पण
एवं स्यादसकृत्कर्म चक्र भार्द्ध समीकृते
ततस्तत्काल जात्यातात् साध्यः सूर्येन्दु सायकः । १९ ।
इस प्रकार बार बार करने से सायन रवि और सायन चन्द्र का योग चक्र या
चक्रार्द्ध के समान हो जायेगा । इसके बाद चन्द्र के सूक्ष्म शर का साधन करेंगे ।
भू पृष्ठ निष्ट दृष्टीना मत्राप्य नु प योगतः
नैव कार्येन्दु दृक् कर्म लम्बनावनति क्रिया । २० ।
ये सभी योग आंख से नहीं दीखने के कारण चन्द्र में आक्षं, आयन कर्म या
लम्बन, नति कर्म नहीं किया जायेगा । भूकेन्द्र दृष्टि से ही पात का साधन किया
जायेगा ।
सूर्य सिद्धान्ते- अथौ ज पद गस्येन्दोः क्रान्ति विक्षेप संस्कृतः
यदास्यादधिका भानोः क्रान्तेः पातो गतस्तदा । २१ ।
(सूर्य सिद्धान्त में) विषम वृत्तपाद (प्रथम और तृतीय) में चन्द्र की शर संस्कृत
क्रान्ति (स्फुट क्रान्ति) सूर्य की क्रान्ति से अधिक होने पर पात बीत चुका है ऐसा
समझेंगे ।
ऊना चेत्स्यात्ततो भावो वामं युग्मपदस्य च
यदाल्पत्वं विधोः क्रान्तिर्विक्षेपाच्छेद वि शुद्ध्यति । इति । २२ ।
विषम पाद के चन्द्र की स्फुट क्रान्ति सूर्यक्रान्ति से कम होने का अर्थ है कि
पात आने वाला है । समवृत्त पाद (२ य तथा चतुर्थ) के चन्द्र की स्फुट क्रान्ति
सूर्य क्रान्ति से अधिक होने का अर्थ है कि पात होने वाला है, कम होने का अर्थ
है कि पात बीत चुका है । (उद्धरण समाप्त)
गोलज्ञैः सकलं ज्ञेयं गणकै र्वासना बलात्
गतैष्यत्वं हि बालानां बोधाय गणितक्रमः । २३ ।
गोल ज्ञान वाले गणक तर्क द्वारा पात होने वाला है या हो चुका है यह जान
सकते हैं । किन्तु अज्ञ लोगों के ज्ञान के लिये गत और गम्य गणित क्रिया लिखी
गयी है ।
योगभार्द्धन्वयोः सिद्धा यदा समकलीकृतिः
तत्कालतो गते पाते संशोध्या, षष्टिनाड़िकाः । २४ ।
जब रवि और चन्द्र की राशि का योग चन्द्र या चक्रार्द्ध की कला के बरा
बर हो जाय, तब यदि पात बीत चुका है, उस समय से ६० दण्ड घटायेंगे ।
गम्यतास्तत्र संयोज्याः पुनस्तत्काल सम्भवैः
सूर्येन्दुपात विशिखैः साध्यं क्रान्त्यान्तरं तयोः । २५ ।
पात यदि होने वाला है तो उस समय में ६० दण्ड जोड़ेंगे । इस समय का

महापात वर्णन २३५
रवि, चन्द्र का पात और शर निकाल कर रवि और चन्द्र की स्फुट क्रान्ति का
अन्तर निकालेंगे ।
तदा प्राक् कालतः चेत् स्याद् गतैष्यत्व विपर्ययः
तदात् षष्टि दण्डान्त मध्यं पातस्य सम्भवेत् । २६ ।
इस समय यदि पहले गये समय से पात (गत या गम्य) से उल्टा दीखे (गम्य
या गत) तो उक्त (६०) दण्ड में स्फुट क्रान्ति समान होगी ।
यदा गतस्य गतता गम्यता च भविष्यतिः
तदादूरे भवेद् योगान्तु तद्दिवसान्तरा । २७ ।
पर यदि पूर्व समय का गत या गम्य पात ठीक उसी प्रकार गत या गम्य ही
देखा जाय तो पात उक्त ६० दण्ड के बाद होगा । ६० दण्ड के दिन के भी तर
नहीं होगा ।
तत् सिद्धये गतिः साध्या याम्य सौम्यापमोद् भवा
प्राक् पश्चात् कालयोः पात यातैष्य त्व विपर्यये । २८ ।
योग सिद्धि के लिए रवि और चन्द्र की क्रान्ति का अन्तर निकालेंगे । चक्र
और चक्रार्द्ध समीकरण काल के पूर्व और पर काल के पात की पत और गम्यता
के विपरीत होने पर समीकरण काल का
तत्क्रान्त्यन्तरयो र्योगस्त्यागस्तद विपर्यये
भवेत्क्रान्ति गति साध्या पातार्थं कलिकात्मिका । २९ ।
क्रान्ति का अन्तर और ६० घटिका संस्कृत समीकरण कालिक क्रान्ति अन्तर-
इस प्रकार दो क्रान्ति अन्तरों का योग करेंगे । गति और गम्यता उल्टा नहीं होने
पर दोनों क्रान्ति अन्तरों का अन्तर करेंगे । पात निकालने के लिए यह कलात्मक
मान प्रथम क्रान्ति गति होगी ।
आद्य क्रान्त्यन्तर कलाः षष्टिघ्ना गति भाजिताः
फलं नाड्यादि संस्कार्यः काले समकालोद् भवे । ३० ।
प्रथम क्रान्ति अन्तर कला को ६० से गुणा कर प्रथम क्रान्ति गति से भाग देने
पर जो लब्धि होगी उसको समीकरण काल में पात होने वाला (गम्य) हो तो योग
करेंगे । यदि पात बीत चुका हो (गत) तो समीकरण समय से उसे घटायेंगे ।
गतैष्यता वशाद् भूयस्तत्काल क्रान्तितः पुनः
साध्यं क्रान्त्यन्तरं प्राग् वद् गतैष्यत्वाद् गतेः कलाः । ३१ ।
पात की तात्कालिक गत या गम्यता के अनुसार इष्ट काल में पुनः रवि चन्द्र
और क्रान्ति द्वारा पहले की तरह क्रान्ति अन्तर का साधन करेंगे । और पहले की
तरह क्रान्ति गति कला निकालेंगे-यह द्वितीय क्रान्ति गति होगी ।

२३६ सिद्धान्त दर्पण
कालेन यावता यावल्लभ्यतेऽप्यक्रमान्तरम्
तत्षष्टि गुणितं तत्तकाल नाड़ी हतं गतिः । ३२ ।
संस्कृत काल के क्रान्ति अन्तर को इष्ट नाड़ी से गुणा कर द्वितीय क्रान्ति गति
से भाग देने पर घटिका फल से संस्कृत समीकरण काल का पुनः संस्कार करेंगे ।
इष्ट काल के क्रान्त्यन्तर को ६० से गुणा कर इष्ट काल से भाग देने पर क्रान्ति
गति होगा ।
असकृत् कर्म संसिद्ध काल भुक्त्यपमान्तरैः ।
क्रान्त्योः साम्यं यदा स स्यात् मध्यः कालोऽन्तिमा गतिः । ३३ ।
इस प्रकार बार बार करने से इष्ट काल के क्रान्ति की अन्तर गति जो होगी,
उससे उस समय के रवि और चन्द्र की स्फुट क्रान्ति में समानता आयेगी । वही
पात मध्य काल होगा । अन्तिम गति पात मध्यकाल की क्रान्ति अन्तर गति होगी ।
पूर्णो योगस्तदैव स्याद् बिम्बयोर्मध्य विन्दुजः
स्थिति काला वगतये स्पर्शमोक्षौ ब्रुवेऽधुना । ३४ ।
पात के आदि से अन्त तक पूरा समय जानने के लिए पात के स्पर्श और
मोक्ष के बारे में मैं अब कहता हूँ ।
पूर्व वद् बिम्ब योर्मान योगार्द्ध रवि चन्द्रयोः ।
आनीयाभ्ररसा (६०) भ्यस्तं क्रान्ति गत्यन्त्ययो भजेत् । ३५ ।
चन्द्र ग्रहण की विधि से पात मध्य कालीन रवि और चन्द्र का बिम्ब निकाल
कर उनका मानैक्यार्द्ध (बिम्ब मान के योग का आधा) निकालेंगे । उसे (मानैक्यार्द्ध
को ६०) से गुणा कर अन्तिम क्रान्ति गति से भाग देंगे ।
लब्धा भवन्ति पातस्य मध्य स्थित्यर्द्ध नाड़िकाः ।
मध्य कालस्तदु नाड्य स्पर्शो मोक्षस्य मध्यमः । ३६ ।
फल पात की मध्यम स्थिति अर्द्ध नाड़ी होगी । पातमध्य काल से इसे घटाने
पर मध्यम स्पर्श काल तथा पात काल में मध्यम स्थिति अर्ध जोड़ने पर मध्यम
मोक्ष काल होगा ।
तत्काल प्रभवाकेंन्दु स्फुट क्रान्त्यो यदन्तरम्
तन्मान योगदलतो न्यूनं चेत् स्पर्शको गतः । ३७ ।
पुनः तत्कालीन रवि और चन्द्र की स्फुट क्रान्ति का अन्तर करेंगे । यह
मानैक्यार्द्ध से कम होने का अर्थ है कि स्पर्श समय बीत गया है (या मोक्ष होने
वाला है ।
मोक्षो भावो यदा तस्मात् बहुक्रान्ति द्वयान्तरम् ।
स्पर्शो भावो गतो मोक्षस्तत् क्रान्त्यन्तर लिप्तिकाः । ३८ ।

महापात वर्णन २३७
मानैक्यार्द्ध से क्रान्ति अन्तर अधिक होने पर स्पर्श होने वाला है ऐसा समझेंगे।
(या मोक्ष बीत चुका है)
खरसे (६०) गुणिता मध्य स्थित्यर्द्ध घटिका हताः
लब्धा भुक्ति कलाः स्पर्श मोक्षोत्थ प्रथमा मताः । ३९ ।
मध्यम स्पर्श और मोक्ष कालिक क्रान्ति अन्तर कला आदि को ६० से गुणा
कर मध्यम स्थिति अर्द्ध घटिका से भाग देने पर प्रथम स्पार्शिक और मौक्षिक
क्रान्ति कला आयेगी ।
मान योगार्द्ध विकलास्तद् भक्ताः स्पर्श मोक्षजा
स्थित्यर्द्ध नाड़िका मध्ये हीनाढ्या समये पुनः । ४० ।
स्पार्शिक या मौक्षिक मानैक्यार्द्ध विकला को क्रमशः स्पार्शिक और मौक्षिक
क्रान्ति गति कला से भाग देने पर स्पर्श और मोक्ष की स्थिति अर्ध नाड़ी आयेगी ।
इसको पात मध्य काल में घटाने और जोड़ने से क्रमशः स्पर्श और मोक्ष काल
आयेगा ।
तत्काल क्रान्ति विवर लिप्तिकाः षष्ठि ताड़िताः
द्वितीय स्थिति खण्डाप्ताः लब्धा भुक्तिरिति क्रमात् । ४१ ।
पुनः इस स्पर्श और मोक्ष काल के क्रान्ति अन्तर कला को ६० से गुणा कर
क्रमानुसार द्वितीय स्पार्शिक तथा मौक्षिक स्थितिअर्द्ध घटी से भाग देने पर द्वितीय
स्पार्शिक तथा मौक्षिक क्रान्ति गति (अन्तर) होगा ।
तत्क्रान्त्यन्तर योगार्द्ध साम्ये स्पर्श विनिर्गमौ
भवेतां सुस्थिरौ स्पष्टौ दण्डाश्च स्थिति खण्डजाः । ४२ ।
इस प्रकार बार बार करने से स्पार्शिक और मौक्षिक क्रान्तिअन्तर तथा स्पार्शिक
और मौक्षिक मानैक्यार्द्ध समान होने पर स्पर्श और मोक्ष काल स्थिर होगा । उससे
स्थित्यर्द्ध नाडिका आदि भी स्थिर होगा ।
सूर्य सिद्धान्ते-आद्यन्तकालयोर्मध्ये कालोज्ञेयोऽति दारुणः ।
प्रज्वल ज्वलनाकारः सर्व कर्मेषु गर्हितः । ४३ ।
(सूर्य सिद्धान्त में) पात के आरम्भ से अन्त तक का समय प्रज्वलित अग्नि
के समान अत्यन्त उग्र है तथा इस अवधि में (विवाह, उपनयन आदि) सभी शुभ
कार्य निन्दनीय हैं ।
एक काष्ठा गतं यावदर्केन्दो मण्डलान्तरम्
सम्भवस्ताव देवास्य सर्व कर्म विनाश कृत् । ४४ ।
रवि और चन्द्र की एक ही क्रान्ति होने पर पात की उत्पत्ति होती है । पात
होने से सभी शुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं ।

२३८ सिद्धान्त दर्पण
स्नान दान जप श्राद्ध व्रत होमादि कर्मभिः
प्राप्यते सुमहत् श्रेयः तत् कालज्ञानतः तथा । इति । ४५ ।
पात का समय जान कर उस समय ग्रहण काल के समान स्नान, दान, जप,
श्राद्ध, व्रत और होम आदि करने से अनेक प्रकार का मंगल होता है । (उद्धरण
समाप्त)
मध्यमः स्थिति कालोऽस्य प्रहर द्वितीयं भवेत्
नव दण्डात्मकोन्यूनः सत्र्यंशाहर्द्वयं (२।२०) महान् । ४६ ।
पात का मध्यम स्थिति काल दो प्रहर अर्थात् १५ दण्ड होता है । न्यूनतम
स्थिति काल ९ दण्ड तथा अधिकतम स्थिति काल (२।२० ) दिन होता है ।
चक्रान्ते चन्द्र पातोच्चौ रविश्चक्रान्त सन्निधौ
चन्द्रश्चेद् भार्द्धगस्तत्र पातस्याल्पस्थिति र्भवेत् । ४७ ।
१२ राशि के अन्तिम भाग में चन्द्र का उच्च तथा पात रहे, १२ राशि के निकट
सायन रवि तथा ६ राशि के निकट सायन चन्द्र होने पर पात का स्थिति काल
अत्यन्त कम होता है ।
चन्द्रोच्च पात शशिनो यदिस्सुः कर्कटादिगाः
धनुरन्त्यां श्रितो भानु स्तदा स्यात् सुचिर स्थितिः । ४८ ।
चन्द्र का उच्च, पात और स्वयं चन्द्र (सायन) यदि कर्क राशि के आरम्भ में
हों, (सायन) सूर्य धनुराशि के अन्तिम पाद में हो तो पात का स्थिति काल दीर्घ
होता है ।
पातोऽत्र द्वित्रिभागोनः स्यात् चेत् द्विः सन्निधौ भवेत ।
अयनान्ते विधोर्न स्याद् गजाक्षं (२८) शाधिकेऽपमे । ४९ ।
चन्द्र का पात यदि कर्क के आरम्भ में रहने के बदले मिथुन राशि के २८
अंश से कर्क के १ अंश के बीच में रहे तो अति कम समय में २ बार क्रान्ति
साम्य होता है । अयन समाप्ति के समय यदि चन्द्र की स्पष्ट क्रान्ति २८ अंश से
अधिक हो तो उसका क्रान्ति साम्य बिल्कुल नहीं होता है ।
अत्र विक्षेप जो ग्राह्यो गोल भेदः सितद्युतेः

महापात वर्णन २३९

स्फुट क्रान्ति के लिये यह (अयन, भेद) लिया जाता है । गोल सन्धि में स्फुट
क्रान्ति का शर के कारण अयन भेद नहीं होता । किन्तु अयन सन्धि में क्रान्ति
गति का शर गति के कारण अन्तर पड़ता है । इसका कारण है गोल सन्धि में
क्रान्ति गति अधिक और अयन सन्धि में कम होती है ।
याम्य सौम्येऽयने चन्द्र सौम्य याम्य गतिः शरात्
दृष्टाप्ययन साम्मुख्या भावान्नायन भिन्नता । ५२ ।
दक्षिण और उत्तर गोल में शर के कारण चन्द्र की क्रमशः उत्तर और दक्षिण
गति (स्फुट क्रान्ति की उत्तर और दक्षिण गति) दीखने पर भी आयन के अनुसार
दिशा का अन्तर नहीं होता है ।
पातेन दूरतः खेटो विक्षिप्तोऽपि स्वपार्श्वयोः
न त्यजेत्क्रान्ति वृत्तस्य साम्मुख्यं हि कदाचन । ५३ ।
पात द्वारा ग्रह (चन्द्र) क्रान्ति वृत्त के दक्षिण और उत्तर की तरफ विशेष
विक्षिप्त होने (फेंके जाने) पर भी वह क्रान्ति की दिशा में ही चलता रहता है ।
क्रान्ति वृत्त की दिशा में गति नहीं बन्द होती, कितना भी अधिक शर क्यों न
हो ।
वराह मिहिराचार्ये वृहद् यात्रा ह्वये श्रुते
व्यवस्था विहिता सैव बहु युक्त पुरः सरम् । ५४ ।
वृहद्यात्रा नामक ग्रन्थ में वराह मिहिराचार्य ने महापात (वैधृति तथा
व्यतीपात) की गोल और अयन व्यवस्था का बहुत युक्ति युक्त वर्णन किया है ।
रवीन्दु योगतो योगो ये सप्त विंशतिः पुरा
साधिता स्तत्र यो सप्त विंश सप्तदशा विमौ । ५५ ।
पहले ग्रह स्फुट अध्याय में रवि और चन्द्र की राशि आदि योग के अनुसार
२७ योगो का वर्णन किया गया है । इन २७ योगों में २७ वां तथा १७ वां योग-
वैधृति व्यतीपाताख्यौ योगावत्यन्त दारुणौ
तौ हि खार्जुर चक्रैकार्गलगार्केन्दु दृग् भवौ । ५६ ।
क्रमशः वैधृति तथा व्यतीपात कहे जाते हैं । जो कि अत्यन्त दारुण योग हैं ।
सूर्य और चन्द्र क्रान्ति होने से) खार्जुर चक्र में एक लकड़ी से बंधे (तेल पेरने की
घानी या अन्न का दाना अलग करने की लिए बैलों की जोड़ी) रहने से दोनों
अत्यन्त क्रुद्ध होते है और उनकी दृष्टि से यह दो योग उत्पन्न होते हैं ।
सूर्य सिद्धान्ते- सार्पे (९) न्द्र (१८) पौष्ण (२७)
धिष्ण्या नामन्त्याः पादाभ स्कन्धयः
तदग्रभा (१०।१९।१) द्यपादाद्धं गण्डान्तं
नाम कीर्त्यते । इति । ५७ ।

२४० सिद्धान्त दर्पण
अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र के अन्तिम पाद में राशि और नक्षत्र की
सन्धि होने के कारण इनके अन्तिम पाद को गण्ड कहा जाता है। इनके अगले
नक्षत्रों (मघा, मूल तथा अश्विनी) के प्रथम पाद अर्द्ध को गण्डान्त कहा जाता
है।
दृष्टा लग्न नवांशक इह मयो च्यते कुलीरे झषे
कीटेन्त्या हरिचाप मेष मुखगा मीनाज सम्बन्धिनः
तेखण्डान्त भ सन्धि पात सदृशाः सर्वेषु कर्मस्वपि
त्याज्या विष्टि मुखास्त्वनिष्ट निकरा होरागमोक्ताः पुनः । ५८ ।
राशि संधि के दोष में शुभ कर्म सब प्रकार से त्याज्य हैं। कर्क, वृश्चिक और
मीन राशि का अन्तिम (९ वां) नवांश मीन राशि में होता है। सिंह, धनु और
मीन का प्रथम नवांश मेष आदि में पड़ता है। अतः ये सभी भी नवांश दोष युक्त
हैं। ये नवांश गण्डान्त की तरह राशि और नक्षत्र की सन्धि में पड़ने के कारण
इनमें सभी शुभ कर्म त्याज्य हैं। विष्टि आदि अनिष्ट कारक करण भी त्याज्य हैं।
होरा शास्त्र में इनको अनिष्ट कर कहा जाता है।
प्राक् कल्पे भूग्रहादि स्थिर चर सृजतः खाभ्र वेदाद्रि वेदा (४७,४००)
दिव्याब्दा ये व्यतीय सरसिज जनुषः प्रत्यहं पर्ययाणाम् ।
तावत् कालात् प्रवृत्ते रितर दिने मुखाद्यात् सौराब्द संघा
सृष्ट्याब्दाः सृष्टि कालव्यवकलन वशादूक्त पूर्वा ममोति । ५९ ।
चराचर सृष्टि करने में ब्रह्मा को ४७,४०० दिव्य वर्ष लगे, जिस समय को
सृष्टि काल या सृष्टि वर्ष कहते हैं। सृष्टि वर्ष समाप्त होने के अगले दिन से ही
ग्रह, उच्च और पात आदि का भगण आरम्भ हुआ। अतः मैंने पहले ही लिखा है
कि ग्रह साधन करने के लिए कल्पवर्ष से इतना सृष्टि वर्ष घटाया जायेगा।
सृष्ट्यन्ते चैत्र शुक्ल प्रतिपदि यम को ट्युद् गमे तिग्मभानो-
स्तद् वारे सोच्च पाता खिल गगन चराश्चक्रवक्त्रे नियुक्ताः
तस्मादस्राब्द मासापम भगण मुखा यौग पद्यात् प्रवृत्ताः
किञ्च ब्रह्महरादेर्युग मनु घटिका मात्र मन्यत्र किञ्चित् । ६० ।
सृष्टि वर्ष की समाप्ति पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि आरम्भ हुयी। यमकोटि
पत्तन नगर में सूर्य का उदय (लंका में मध्य रात्रि) थी। यह दिन रविवार माना
गया है। इस समय ब्रह्म ने ग्रह, उच्च, पात आदि को अपनी अपनी कक्षा में गति
आरम्भ करने के लिए अश्विनी नक्षत्र के आदि बिन्दु (मेष आदि विन्दु) से छोड़
दिया। ठीक इसी समय से दिन, मास, वर्ष, क्रान्ति और भगण आदि की प्रवृत्ति
आरम्भ हुई। ब्रह्मा के दिन से इन सबका आरम्भ नहीं हुआ। उस समय से केवल
घटी, युग और मनु आदि की उत्पत्ति हुयी।

महापात वर्णन २४१
ये प्रोक्ताः सदसत्फलाय जगतः श्री व्यास पित्रादि भो
राजाद्या जलदाः सदादिपतयो भागाः सुयोगादयः
भावाभाव जुषा नदृष्टवशतः तत् तत् फलानां मया
कादीचित्कतया नतेत्र गदिता स्त्यक्ताश्च सिद्धान्तिभिः । ६१ ।
पराशर आदि ऋषियों ने जगत के शुभ अशुभ फल के लिये राजा, मन्त्री और
पालक, द्रोण और पुष्कर आदि मेघ, आटका धिपति, अग्नि, वर्षा और व्याधि
आदि का भाग, राज योग और अधिराज योग आदि का वर्णन किया है । ये सब
कभी कभी वर्णित फल देते हैं । कभी नहीं भी देते हैं । यह सोचकर मैने इनके
विषय में नहीं लिखा है । अन्य सिद्धान्त ग्रन्थों में भी इनके बारे में नहीं लिखा
है ।
यत्सूर्येन्दो र्भगण विरतिः स्याद् युगे तत् कृतां (४) शे
निःशेषत्वं क्षिति दिनततो द्वापरान्त प्रसिद्धाः
सृष्टे रब्दायुगकृत (४) लवे (१०,८०,०००) नोद्धताः शेष शून्याः
स्तस्मात् नोक्त स्तपन शशिनो द्वापरान्त ध्रुवोऽत्र । ६२ ।
प्रति महायुग के अन्त में सूर्य और चन्द्र का भगण पूर्ण होता है । इस महायुग
के १/४ अंश (१०,८०,०००) वर्ष में भी सावन अहर्गण पूर्ण होता है । महायुग के
एक पाद में) इनकी ( सावन अहर्गण की) संख्या (३९,४४,७९,४५७) है । द्वापर
अन्त तक बीते सृष्ट्यब्द (१,९५,५८,८०,०००) को (१०,८०,०००) से भाग देने पर
लब्धि (१८११) तथा शेष शून्य होता है । इस कारण द्वापर अन्त में रवि और चन्द्र
का ध्रुव कहने की आवश्यकता नहीं है ।
सृष्ट्यब्दानां कलि गत समानां दिनौघ सुमेलः
स्यान्मध्यार्क क्रिय मुख गतावत्र तत् पूर्वघस्रे,
चैत्राद्युक्ता दिनगतियुता स्वे ध्रुवाः पञ्जिकादौ
सौरे तुल्याः करण शरदां तद्दिनां गार (३) वारात् । ६३ ।
मध्य सूर्य मेष आदि में प्रवेश करने के समय (उस दिन का) सृष्टि आरम्भ
से द्वापर अन्त तक गत वर्ष (१,९५,५८,८०,०००) एवं कलि गत वर्ष (४९७०)
(१८६८ ई. करणाब्द) का अहर्गण क्रमशः (७,१४,४०,२२,९६,६२७) तथा
(१८,१५,३३४) है । दोनों की वार शुद्धि ठीक है ।
करणाब्द के आरम्भ में मध्यम रवि मेष मे प्रवेश करने के पहले दिन मध्यम
मान से चैत्र शुक्ल प्रति पदा था । उस दिन का जो ध्रुव आदि कहा गया है ।
उसमें (ग्रह की दैनिक गति) जोड़ने से पञ्जिका में वह सूर्य सिद्धान्त के अनुसार
मध्यम ग्रह का ध्रुव होगा । करणाब्द अहर्गण का वार आदि मंगल वार से आरम्भ
होगा ।

२४२ सिद्धान्त दर्पण
चान्द्रे वारे व्यरचि करणाब्दादि राद्या (१) तिथियाँ
सावैशाखे यदपि मलिने स्पष्ट सूर्येन्दु जेऽभूत्
मध्यार्केन्दूद् भव मलिन मासस्य पूर्ण गतत्वा
तस्याः खेट ध्रुव समुचितः शुद्ध चैत्रादि भावः । ६४ ।
करणाब्द का पूर्व दिन मैंने सोमवार माना है । यह दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
था । स्पष्ट मान से यह वैशाख अधिमास की प्रतिपदा थी । इस करणाब्द आरम्भ
दिन के पहले मध्यम मान का वैशाख अधिमास पूर्ण हो जाने से यह चैत्र प्रतिपदा
शुद्ध माना गया और यही शुद्ध शुक्ल प्रतिपदा सोमवार दिन ग्रह पात आदि का
ध्रुव कहने के लिये अत्यन्त उपयुक्त है ।
एतत् पूर्वं सपद् कृत देवार्ध भृधृत्यहोभि (१८,१५,३३४।१५)
र्या कल्यादौ मधु मुखति थिस्तुल्य मध्येन्दिनोत्था
प्राग्भि प्रोक्ता ध्रुव गण युता सास्फुटे माधवोऽभूत्
तत् खेटादि ध्रुव निगमने मध्य मध्यादिरिष्ट । ६५ ।
करणाब्द आरम्भ से (१८,१५,३३४-१५) दिन पहले कलियुग का आरम्भ लंका
की अर्द्ध रात्रि में हुआ था । उस समय मध्यम मान का चैत्र शुक्ल प्रतिपदा प्राचीन
सिद्धान्तियों के मत से था । पुनः अब करणाब्द (१८६८ ई.) का प्रथम दिन स्पष्ट
मान से वैशाख में पड़ रहा है । यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा निकालने के लिये द्वापारान्त
ध्रुव जोड़ना पड़ेगा । इससे लगता है कि ग्रह, उच्च और पात आदि का ध्रुव कहने
के लिये मध्य और स्पष्ट काल जानना होगा ।
कल्यब्द वेदकृत खगुणै (३०४४) रुनिता विक्रमा ब्दा
स्तेशाकाब्दाः शर गुण कुभि (१३५) स्तेकु पक्षाग्न चन्द्रेः (१०२१)
शास्त्राब्दास्तेऽपिच विधुशरै (५१) र्भास्करीयाब्दकाः स्यु-
स्तेनागेन्द्रे (१४८) रधृति नगै (७१९) कौचना दार्पणाब्दाः । ६६ ।
कलि गत वर्ष से ३०४४ वर्ष घटाने पर वर्तमान विक्रमाब्द होगा । विक्रमाब्द
से १३५ वर्ष घटाने से शकाब्द होगा । शकाब्द से १०२१ घटाने से भास्वती अब्द
होगा ) भास्वती शास्त्राब्द से ५१ वर्ष कम या विक्रमाब्द से १२२१ वर्ष घटाने से
भास्कराब्द होगा भास्कराब्द से १४८ घटाने से कुचनाब्द तथा भास्कराब्द से ७१९
घटाने से दर्पणाब्द (सिद्धान्त दर्पण का) होगा ।
यस्मिन् खेटानयन मुदितं सृष्टिजाद्यहर्गणेभ्यः
सिद्धान्तोऽसौ युगदिन गणात् यद्गतन्त्रं तदेव
यस्मिन् शाकाद्यभिमत समा वासरे व्यस्तयुक्तं
शास्त्रं प्राज्ञैः करण मिति तत्कार्य मत्रास्ति सर्वम् । ६७ ।
जिस (ग्रन्थ) में सृष्टि आदि के अहर्गण द्वारा ग्रह साधन का वर्णन हो उसे
सिद्धान्त कहते हैं । युगादि अहर्गण से जो ग्रन्थ ग्रह साधन करे उसे तन्त्र कहते

महापात वर्णन २४३
हैं । शाकाब्द या किसी अन्य (निकट के) वर्ष से अहर्गण साधन कर उससे ग्रह
निकालने की विधि जिस ग्रन्थ में हो उसे करण ग्रन्थ कहते हैं । इस सिद्धान्त
दर्पण में तीनों ही विधियां हैं ।
नृणां पापं दश दिन कृतं हन्ति सिद्धान्त वेत्ता
दृष्टः सद्यः त्रिदिन जनितं तन्त्रवेत्ता निहन्ति
एकाहोत्थं करण निपुणे यस्तु शास्त्रानभिज्ञ
कालं वृत्ते बहु वृजिनदः सोऽत्र नक्षत्रसूची । ६८ ।
सिद्धान्त ज्ञाता का दर्शन करने से दस दिन का पाप नष्ट होता है । तन्त्र वेत्ता
से ३ दिन का तथा करण जानने वाले के दर्शन से १ दिन का पाप नष्ट होता है ।
जो बिना ज्योतिष जाने काल की चर्चा करता है । वह नक्षत्र सूची है । और उसे
देखने से बहुत पाप होता है ।
चन्द्रं मन्दान्त्रि भसमधिकं प्रेक्ष्य पक्ष्यार्द्ध सिद्धं
द्वित्रिशाढ्या यदिह गदिता सम्मता यत्तथान्यै
चक्रे ऽ जादि स्थितिरपि पृथक्सम्मता यत्तथान्यै
रप्रामाण्या तदखिल मुपादत्तनौ चित्तमाम्रयाः । ६९ ।
भास्कर आदि कई ज्योतिर्विदों ने स्फुट चन्द्र को पक्ष अर्द्ध में मन्द (शनि) से
३ राशि अधिक देखकर अपने सिद्धान्त गणित (सिद्धान्त शिरोमणि) में नक्षत्र ध्रुव
में १/३ अंश जोड़ दिया । अर्थात् उन्होंने स्वयं स्फुट कर प्रत्यक्ष नहीं किया था ।
अन्य कई ज्योतिषियों ने मेष का आदि बिन्दु अलग अलग स्थानों में स्वीकार
किया है । प्रमाण के अभाव में मैने यह स्वीकार नहीं किया है ।
कैश्चित् प्रोक्तं नलिन जनुषः स्वायुषोऽर्द्धं व्यतीतं
कैरप्येतत् पतन मुनिभिः सार्द्ध वर्षाष्ट का द्वयं (८ १/२) ।
तद् वैतद् वा भवतु न ततः कोऽपि लोकोपयोगः
कल्पस्यास्य द्युचर गणितं स्यादिदं तन्मुदेवः । ७० ।
कई के मत से ब्रह्मा की परमायु का आधा (५०) तथा कुछ अन्य विशिष्ट
ऋषियों की मत से (५८ १/२ वर्ष) साढ़े ८ वर्ष अधिक) बीत गया है । इसमें
कोई भी मत ठीक हो उसका कोई लोक व्यवहार में उपयोग नहीं है क्योंकि ग्रह
गणित का वर्णन वर्तमान कल्प (दिन) से ही होता है-आप लोग इसी से सन्तुष्ट
हों)
यस्येच्छा मे निज भजन तो दूर मुत्सार्य बुद्धिम्
दै वाधीनां गणित विपणौ पात यत्यात तायाम्
संख्यातीता नु गत पति तो द्वार कारुण्य सिन्धुः ।
सस्याच्छेतः शरण चरणः सिन्धुजा प्राणबन्धुः । ७१ ।
जिससे मेरी बुद्धि को विष्णु भजन के प्रिय कर्म से दूर गणित बाजार में ठेल

२४४ सिद्धान्त दर्पण
दिया है तथा इच्छा के विरुद्ध मेरी बुद्धि जिनके अधीन काम कर रही है वही
कृपासिन्धु समुद्रतनया लक्ष्मी के प्राण बन्धु के चरण युगल मेरी बुद्धि के आश्रय
स्थल हों (जिससे वह दिग्भ्रमित न हों) क्योंकि उस महाप्रभु जगन्नाथ असंख्य
पतितों का उद्धार करने वाले करुणा के समुद्र हैं ।
इत्युत्कलो़ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्र शेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे ।
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
यातः सपाट इह पञ्चदशः प्रकाशः । ७२ ।
इस प्रकार उड़ीसा के उज्ज्वल राज वंश में उत्पन्न श्री चन्द्र शेखर द्वारा गणना
और वास्तव में समानता तथा बालकों के ज्ञान के लिए लिखे सिद्धान्त दर्पण में
पात वर्णन सम्बन्धी १५ वां अध्याय समाप्त हुआ ।
इति मुदित सुधीरे शुद्ध सिद्धान्त पूर्वे
नयन विषय सिद्ध व्योमगे दर्पणेऽस्मिन्
त्रिभिरिद मधिकारैः (३) पञ्चभूमिः (१५) प्रकाशै
र्ग्रहगणित समाख्यं पूर्वमर्द्धंयं समाप्तम् । ७३ ।
इस प्रकार ३ अधिकार के १५ प्रकाश सहित सिद्धान्त दर्पण ग्रन्थ का पूर्वार्द्ध
समाप्त हुआ जिसमें विद्वानों के आनन्द के लिये दृक् सिद्ध ग्रह गणित तथा शुद्ध
सिद्धान्त है ।

षोडशः प्रकाशः
गोलाधिकारः
प्रश्न वर्णनम्
यत्पादाम्बुरुह प्रसक्त हृदया ब्रह्मादयोऽनास्थया
कालेऽन्यत्र च नेत्र साम्य विरहात्तत्र द्विरागायवा
शिष्य प्रश्न वशात्च सूक्ष्मवचसा सिद्धान्त जातं जगुः ।
सर्वज्ञा अपि मादृशा इव नम स्तस्मै जगत्स्वा मिने । १ ।
जिनके चरण कमलों में ध्यान रख कर ब्रह्मा वशिष्ठ आदि ज्ञानियों ने समय
समय पर पहले के सिद्धान्तों में त्रुटि दीखने से उत्पन्न अनास्था के कारण नये
सिद्धान्त ग्रन्थों की रचना की एवं शिष्यों के प्रश्नों का सूक्ष्म विश्लेषण कर उत्तर
दिया तथा सर्वज्ञ होने पर भी मेरे (सामन्त चन्द्रशेखर की) भांति छोटे छोटे सिद्धान्त
ग्रन्थ लिखे, उसी जगत के स्वामी महाप्रभु जगन्नाथ की वन्दना करता हूँ ।
यश्चक्षुर्ग्रहपति मोऽपि गगने गृह्णन् ग्रहाणां गणं
भूगोलं परि गच्छति ग्रहपतिः सर्वाग्रिमो मध्यमः
लोका लोक विशोक तावन कृते स्पष्ट स्त्रयो मूर्त्तिमान्
यश्चक्षु

२४६ सिद्धान्त दर्पण
जिस नीलाद्रि विहारी पापनाशी जगन्नाथ के लिए सारा जगत् लीलाभूमि
है, उनके तेज का हृदय में ध्यान कर उनके अनुग्रह से मैने ग्रहगणित लिखना
समाप्त कर अब प्रसन्नापूर्वक गोल गणित आरम्भ करता हूँ जिसके बारे में प्राचीन
सिद्धान्तियों ने विस्तार से लिखा है ।
सिद्धान्त जातोद्धृत वाक्यचक्र सन्दर्भितात्म प्रथिताग्र्य पद्यैः
गोलं ब्रुवे बाल विबोधनाय वाचं पुरस्कृत्य च भास्करीयाम् । ५ ।
अनभिज्ञ लोगों को भी गोल गणित समझाने के लिए इसके विषय में मैंने
मुख्यतः भास्करा चार्य के कथनों की व्याख्या की है, इसके अतिरिक्त कहीं कहीं
अन्य आचार्यों के विचार दिये हैं तथा प्राचीन सिद्धान्तों के अध्ययन से उत्पन्न
मेरे विचार भी हैं।
सिद्धान्त शिरोमणौ-मध्याद्यं द्युषदां यदत्र गणितं तस्योपपत्तिं विना
प्रौढं प्रौढ सभा सुनैति गणको निः संशयो न स्वयम् ।
गोले सा विमला करामलकवत् प्रत्यक्ष तो दृश्यते ।
तस्मादास्म्युपपत्ति बोध विधये गोल प्रबन्धो द्यतः । ६ ।
ज्योतिष में ग्रहों का मध्य, स्फुट आदि गणित का वास्तविक अर्थ नहीं जानने
से ज्योतिषी के मन में सन्देह बना रहता है तथा वह विद्वत् समाज में आदर नहीं
पाता है । इस गणित का रहस्य हाथ में रखे आंवले के समान स्पष्ट भाव से
दिखायी दे- इस उद्देश्य से मैं गोल ग्रन्थ की रचना कर रहा हूँ।
भोज्यं यथा सर्व रसं विनाज्यं राज्यं यथा राज विवर्जितञ्च
सभान भातीव सुवक्तृ हीना गोलानभिज्ञो गणकस्तथैव । ७ ।
घी के विना सभी रसों का भोजन, राजा के बिना राज्य तथा ज्ञानी वक्ता के
बिना सभा की जिस प्रकार शोभा नहीं होती है उसी प्रकार गोल ज्ञान के बिना
गणक भी व्यर्थ है ।
वाग्मीव्याकरणं विनैव विदुषां धृष्टः प्रविष्टः सभां
जल्पन्नल्पमति स्म यात् पटुवटु भ्रूभंग वक्रोक्तिभिः
हीनः सन्नुपहास मेति गणको गोलानभिज्ञ स्तया
ज्योतिर्विद सदस प्रगल्भ गणक प्रश्न प्रपञ्चोक्तिभिः । ८ ।
कोई धूर्त वक्ता बिना व्याकरण ज्ञान के विद्वानों की सभा में बकवाद कर
उनके व्यंग दृष्टि और वचनों का शिकार होकर लज्जित होता है । इसी प्रकार गोल
नहीं जानने वाला गणक भी ज्योतिषियों की सभा में विभिन्न प्रकार के प्रश्न और
कौतुक उक्ति नहीं समझ कर उपहास का पात्र बनता है ।
दृष्टान्त एवावनिभ ग्रहाणां संस्थान मान प्रतिपादनाथर्म्
गोलः स्मृतः क्षेत्र विशेष एषप्राज्ञै रतः स्याद् गणकेन गम्यः । ९ ।

प्रश्न वर्णनम् २४७
पृथ्वी, तारा और ग्रहों की स्थिति परिमाण आदि समझाने के लिए गोल एक
दृष्टान्त (प्रतिरूप या model) है । विद्वानों ने गोल को एक क्षेत्र (स्वतन्त्र विषय)
माना है । जिसे कोई गणक गणित की सहायता से ही समझ सकता है ।
ज्योतिः शास्त्र फलं पुराण गणकै रादेश इत्युच्यते
नूनं लग्नबलाश्रितं पुनरिदं तत्स्पष्ट खेटाश्रयम्
ते गोला श्रयिणोऽन्तरेण गणित गोलोऽपिन ज्ञायतेः
तस्माद् यो गणितं न वेत्ति सकथं गोलादिकं ज्ञास्यति । १० ।
प्राचीन गणकों ने ज्योतिष शास्त्र फल को आदेश (प्रमाणिक) माना है । फल
लग्न के अनुसार होता है, लग्न ग्रह (पृथ्वी) की स्थिति के अनुसार है । बिना
स्पष्ट ग्रह जाने केवल लग्न द्वारा फल नहीं कहा जा सकता है । सभी ग्रह (ब्रह्माण्ड
रूपी) गोल में ही भ्रमण करते हैं । अतः स्पष्ट ग्रह जानने के लिये गोल आवश्यक
है । गोल गणित द्वारा ही समझा जा सकता है । अतः जो गणित नहीं जानता
वह (गोल आदि) ज्योतिष कैसे जान सकता है ?
द्विविध गणित मुक्तं व्यक्त मव्यक्त युक्तं
तद व गमन निष्ठाः शब्दशास्त्रे पचिष्ठः
यदि भवति तदेवं ज्योतिषं भूरि भेदं
प्रपठित मधिकारोऽस्यान्यथा नामधारी । इति । ११ ।
गणित दो प्रकार का है- व्यक्त (पाटी) और अव्यक्त (बीज) । इन दो प्रकार
के गणित तथा व्याकरण (शब्द शास्त्र) का अच्छा ज्ञान होने पर ही कोई ज्योतिष
शास्त्र पढ़कर समझ (पचा) सकता है, अन्यथा वह नाम मात्र का ही ज्योतिषी
होगा । (सिद्धान्त शिरोमणि का उद्धरण समाप्त)
गुर्वन्ते वा सिसंवाद व्याजेनाथ विविच्यते ।
तत्व ख भू भगोलानां वासना वगतिर्यतः । १२ ।
गुरु और शिष्य के संवाद रूप में अब आकाश, पृथ्वी तथा नक्षत्र गोल का
वर्णन किया जा रहा है, जिससे सभी का कारण (वासना या रहस्य) ज्ञात होगा ।
तत्र भोः श्रीमदाचार्य निजवागमृते न यत्
त्व योक्तं खेट गणितं गोलारुयं यच्च सूचितम् । १३ ।
(शिष्य)- हे आचार्य महोदय, आपने अपनी अमृत समान वाणी से जो ग्रह
गणित कहा तथा गोल के विषय में सूचना दी ।
तेन मे द्वापर लता वृद्धैव न तु वर्द्धिता
नाना मत द्रुमालम्ब बहु शास्त्रीकृता यतः । १४ ।
उससे मेरा सन्देह और बढ़ा है, घटा नहीं है-क्योंकि आपने जो कहा वह
अनेक आचार्यों के मत रूप वृक्ष और उनकी बहुत सी शाखायें है जिसमें बहुत

२४८ सिद्धान्त दर्पण
शास्त्रीय वर्णन हो गया है ।
निवासाय पुरा स्माकं सृष्टाया विष्णुनाधरा
युज्यते प्रथमं तस्याः स्वरूपं परिशीलितुम् । १५ ।
बहुत पहले सृष्टि के आरम्भ में विधाता ने हम लोगों के लिए इस पृथ्वी को
बनाया । पहले मुझे इसी का स्वरूप समझाइये ।
गोलं ज्ञात्वा ततस्तस्मिन्निः सन्देहं नमः सदाम्
गणितस्यानुभूतिर्मे भूयाद् भवद नुग्रहात् । १६ ।
उसके बाद आपकी कृपा से मेरा खगोल और ग्रह गणित का वास्तविक
अनुभव हो सकता है ।
चक्राकारां वसुमतीं कथयन्ति पुराविदः
धृतां क्रीड़ा हि कूर्माद्यैः पञ्चाशत् कोटि योजनम् । १७ ।
पुराणों में पृथ्वी का आकार चक्र के समान कहा गया है । इस पृथ्वी को
पुनः वराह, सर्प, (शेषनाग) और कच्छप आदि ने धारण किया है । पृथ्वी का
विस्तार ५० कोटियोजन है (क्षेत्रफल)
तन्मध्ये जाम्बवो द्वीपो लक्षयोजन विस्तृतः
तावता लवणोदेने वेष्टिता नवर्ष भृत् । १८ ।
इसके बीच में १ लाख योजन विस्तार (क्षेत्रफल) का जम्बू द्वीप है । जो चारों
तरफ लवण समुद्र से घिरा है ।
मध्येतस्यस्थितो मेरु ख खाब्ध्यष्ट (८४,०००) योजनैः
सच्छितो भू प्रविष्टोऽसौ खा प्राप्तांगेन्दु (१६,०००) योजनैः । १९ ।
जम्बू द्वीप के मध्य में (८४,०००) योजन लम्बा मेरु पर्वत है । (ऊंचाई) मेरु
का १६००० योजन भूगर्भ में है ।
जम्बू द्वीपाद् बहि द्वीपाः परितः स्व समैर्वृताः
सिन्धुभिस्ते पुराणोक्ताः क्रमद्विगुण विस्तृताः । २० ।
जम्बू द्वीप के बाहर क्रमशः दो गुणा विस्तृत अन्य द्वीप है तथा उनको भी
समुद्र घेरे हुए हैं ।
प्रान्तस्थ पुष्कर द्वीप मध्यगे वलयो कृतौ
भ्रमत्यर्क रथायुद्धं मानसोत्तर पर्वते । २१ ।
अन्त में स्थित पुष्कर द्वीप के मध्य भाग में वलय के आकार का मानसोत्तर
पर्वत है जिसके ऊपर सूर्य का रथ भ्रमण करता है ।
द्वीपाब्धीनां बहिः स्वर्ण भूलोका लोक पर्वतौ ।
गर्भादस्तद् बहि ब्रह्म कटाहक्ष्मादि भिर्वृतः । २२ ।

प्रश्न वर्णनम् २४९
इन द्वीपों और सागर के बाहर लोकालोक पर्वत है जिसका भूभाग स्वर्णमय
है । इस पर्वत के बाहर ब्रह्म कटाह की भूमि घेरे हुए हैं ।
भानु मति भूपृष्ठा ल्लक्षयोजन दूरगः
मज्नु द्यन्निवा भाति तिर्यङ्ङत्यन्त दूरगः । २३ ।
भू पृष्ठ से १ लाख योजन दूर सूर्य परिभ्रमण करते हैं । भू पृष्ठ से अत्यन्त दूर
और तिरछा (स्पर्श रेखा) होने कारण सूर्य का उदय और अस्त होना दीखता है ।
भ्रमन्ति चन्द्र भौमाद्यां उपर्युपरि सूर्यतः
ध्रुवान्तः स च मेरु र्ध्वे ततो लोकाः स्थिता इति । २४ ।
सूर्य के ऊपर ऊपर चन्द्र, मंगल आदि ग्रह भ्रमण करते हैं । इन सबके ऊपर
ध्रुव की स्थिति । ध्रुव तारा मेरु के ठीक ऊपर है । ध्रुव के ऊपर क्रमशः महः,
जन, तप आदि लोक है ।
बौद्धास्तु भ प्रमालोकान्तिरा धारां कुमब्रुवन्
खेऽधोयात्तीञ्च स्वस्थस्या दशनाद् गुरु वस्तुनः । २५ ।
बौद्ध मत के अनुसार पृथ्वी के चारों तरफ नक्षत्र भ्रमण करते हैं । अतः पृथ्वी
का आधार किसी भी दिशा में नहीं है । आकाश में कोई भारी वस्तु नहीं होने
के कारण उनकी कल्पना है कि पृथ्वी लगातार नीचे जा रही है ।
जैना वदन्ति सूर्येन्दु द्वौ द्वौ च भगणौ तथा
चतुष्कोण स्तम्भ रूपं मेरु मध्यगतः स्थिरम् । २६ ।
जैन मत के अनुसारर आकाश में २ सूर्य, २ चन्द्र तथा ५४ नक्षत्र हैं । वे
चतुष्कोण स्तम्भ (चतुर्भुजाकार) के समान स्थिर मेरु पर्वत की-
पर्यंति भूर्जलान्तः स्थात्तस्यादार्कदियोजनैः
त एकान्तर मुद्यन्तो दृश्यन्ते मेरु कोणतः । २७ ।
परिक्रमा जल के भीतर रह कर करते हैं । अतः मेरु कोण से एक के बाद
एक क्रम से सूर्य का उदय दिखायी देता है ।
इंग्लैण्ड पण्डिताः सूक्ष्म मतयः कथयन्ति च
भूगोला वर्तुलः क्षुद्रो भौमादि ग्रहवद्दिवि । २८ ।
सूक्ष्म बुद्धि के इंग्लैण्ड के पण्डितों को कहना है कि पृथ्वी स्वयं दीर्घ
वृत्ताकर है और आकाश में मंगल आदि ग्रहों के समान -
स मध्यस्थ वृहत्सूर्य बिम्बस्य वयवप्रमैः
आकृष्टश्चक्र वद् भ्रान्ति क्रान्ति वृत्ते ब्रजत्यसौ । २९ ।
बहुत बड़े सूर्य बिम्ब से आकर्षण से क्रान्ति वृत्त में चक्र की तरह परिक्रमा
करते हैं ।