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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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२३० सिद्धान्त दर्पण
न्यूना यद् गुरु बिम्बतो भवति तद् व्यक्तौ तदस्तोदयौ
रुद्रां (१) शैर्नतु सिद्धतोऽपरमत द्योत प्रवेश क्रमात् । ६६ ।
सूर्य से चन्द्र ११ अंश दूर रहने पर इसका प्रकाश १७ विकला के बुध बिम्ब
से अधिक और वृहस्पति के तेजस्वी बिम्ब से कम होता है । अतः जो लोग ११
अंश दूरी (कालांश) पर चन्द्र का उदय और अस्त मानते हैं वह ठीक नहीं है ।
(प्राचीन आचार्य चन्द्र का उदयास्त कालांश १२° मानते हैं । कई ११° मानते हैं ।
किन्तु लेखक ११° तथा ११° के बीच मानते हैं ।
बिम्बस्याष्टोत्तर शत (१०८) लव प्रेक्ष्य ते शुक्लपक्षे
प्राक्तिष्यन्ते (१) तनुरपि विधोः षष्ठ भागश्चतुर्थ्याम्
पञ्चम्यन्तेऽङ्घ्रि रथ दशमी प्रान्तभागे त्रिपादाः
पक्षान्ते (१५)ऽर्द्धे (८) खिलदल भृति वैष्णवान्ते (११) ऽरसांशः । ६७ ।
शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के अन्त में चन्द्र मण्डल का १०८ भाग अति सूक्ष्म होने
पर भी दीखता है । उसी पक्ष की चतुर्थी तिथि के अन्त में उसका १/६ भाग शुक्ल
दीखेगा । पञ्चमी तिथि के अन्त में १/४ भाग शुक्ल होगा । दशमी तिथि के समाप्त
होने पर ३/२ भाग शुक्ल होगा । पूर्णिमा में पूर्ण बिम्ब शुक्ल होगा । अष्टमी तिथि
में आधा बिम्ब शुक्ल तथा एकादशी के अन्त में ५/६ भाग शुक्ल दीखेगा ।
क्षीरोदरोधसि धरो परि रोचमानः
सारो जबान्धवि सरोक्षत रोक्तिरोपात्
नारोप गोपन परोऽरिधरो विरोधि-
मारोत्थरोग निकरोपरतिं करोत । ६८ ।
समुद्र कूल (पुरुषोत्तम क्षेत्र में) शोभित जो सुदर्शन चक्र धारी श्री जगन्नाथ
सूर्यपुत्र यम के क्रोध से लोगों की रक्षा करते हैं, तथा काम जनित सभी रोगों का
नाश करते हैं, वे हमारी कामना जनित सभी व्याधि दूर करें ।
इत्युत्कलो ज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्र शेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
शृङ्गोन्नतिर्व्यगम दिन्द्र (१४) मितः प्रकाशः । ६९ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा
वास्तविक घटना के समान गणना के लिए तथा छात्रों की शिक्षा के लिए लिखे
सिद्धान्त दर्पण में चन्द्र शृङ्गोन्नति सम्बन्धी १४ वां अध्याय समाप्त हुआ ।