सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ सिद्धान्त दर्पण
समान दिशा (या शक्ति) की किरणों के संयोग से अग्नि प्रवाह होता है । जिससे
प्राणी जगत नष्ट होता है ।
विनाशायाति पातोऽस्यः लोकानाम सकृद् यतः
व्यतिपातः प्रसिद्धोऽतः संज्ञा भेदेन वैधृतिः । ७ ।
अति पात योग सदा अकल्याण कर और संसार का विनाश करने वाला
होता है । इसी के अन्य नाम व्यतीपात तथा वैधृति भी हैं ।
यत्कृष्णो दारुण वपु र्लोहिताक्षो महोदरः
सर्वानिष्ट करो रौद्रो भूयोभूयः प्रजायते । इति । ८ ।
प्रत्येक पात का वर्ण कृष्ण, शरीर अति भयंकर तथा आखें लाल होती हैं ।
ये दोनों अति प्रचण्ड हैं और प्रति मास ये दोनों उत्पन्न होते हैं । (मध्यम मान
की तुलना में स्पष्ट मान से पात होना अधिक अनिष्ट कारी होता है । (सूर्य सिद्धान्त
उद्धरण समाप्त)
चलांश संस्कृताकै र्न्दयोर्योगश्चक्रं यदा भवेत्
तदा सन्निहितो योगो वैधृत्यः पुनरेतयोः । ९ ।
अपनांस संस्कृत रवि और चन्द्र का राशि आदि का योग जब १२ राशि हो
तब वैधृति योग निकट होता है ।
योगात् षड् भवनान्यष्टा दर्श वास भवन्ति चेत्
व्यतिपातस्तदासन्नो भिन्न पादस्तयो स्तुतौ । १० ।
इसी प्रकार अपनांश संस्कृत रवि और चन्द्र आदि की राशि आदि का योग
६ राशि या १८ राशि होता है । तो व्यतीपात योग आसन्न होता है । रवि और
चन्द्र दोनों वृत्त के भिन्न पादों (९०°) में रहने पर ही पात होता है ।
प्रायः तत् सम्भवो मासे द्विर्भवेत् न क्वचिद् भवेत्
क्वचित्सन्निहिते काले द्विःस्याद् विक्षेप भेदतः । ११ ।
प्रायः प्रतिमास दोनों योग (वैधृति और व्यतीपात) एक एक बार होते हैं)
किसी किसी मास में बिल्कुल ही पात नहीं होता है । चन्द्रशर की उन्नता के
कारण कभी कभी जल्दी जल्दी पात होता है - तब एक मास में २ बार भी ये
पात होते हैं ।
पात सम्भव कालोत्थ योगान् वक्ष्येयनांशकैऽ
कली कृतैर्युगुणितैश्चक्र (२१,६०००) चक्रार्द्ध (१०,८००) जाः कलाः । १२
पात सम्भावना कला के समय होने वाले विष्कम्भक आदि योगों का विवरण
दे रहा हूँ। अयनांश को कला कर दो गुणा करते हैं । इसको चक्र कला (२१,६००)
तथा चक्रार्द्ध कला (१०,८००) में-