सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहापात वर्णन २३३
विलोम संस्कृता शक्रा धिकाश्चेत् चक्र शोधिताः ।
खखाष्टा (८००) प्ता गता योगा विष्कुम्भाद्याः सरूपकाः । १३ ।
विलोम संस्कार (अयनांश योग होने पर वियोग तथा ऋण होने पर योग)
करते हैं । फल (२१,६००) से अधिक होने पर उसमें चक्र घटाते हैं । शेष में
(८००) से भाग देने पर लब्धि विष्कुम्भ आदि से गत योग होगा । लब्धि में एक
जोड़ने पर -
वर्त्तमानस्ततः शेषात् षष्टिघ्नाखशराष्टभिः (८५०)
भाजितात् फल नाड्याद्या यदा सूक्ष्मा भवन्ति हि । १४ ।
वर्त्तमान योग की संख्या होगी । (८००) से भाग देने पर बचे शेष को ६०
से गुणा कर (८००) से भाग देने पर जितना नाड़ी आदि फल होगा उसे वर्तमान
योग में जोड़ने पर वह सूक्ष्म होता है ।
तदैवेन्दु शराभावे स्यान् मध्य समयः शरात्
प्राक् पश्चात् सम्भवेत्पातः साध्यताः प्रथमं ततः । १५ ।
इस समय चन्द्र का शर नहीं रहने पर पात का भी समय होता है । शर होने
पर इस समय से पहले या बाद में पात होता है । अतः पहले मध्यंम मान के
अनुसार क्रान्ति समान होने पर स्थूल पात का साधन करना चाहिये ।
अथेदानीं शुक्लं (२४) वृद्धौ तदीया (३) दम पादयो
भवति प्रायशो मध्य वैधृत्य व्यतीपातयोः । १६ ।
अभी (१८६८ ई.में) अयनांश २२° है । इस समय शुक्ल (२४ वां) तथा वृद्धि
(११ वां) योग में क्रमशः वैधृति ३ य पाद तथा व्यतीपात प्रथम पाद प्रायः पड़ता
है । अतः उस समय को इनका मध्य समय कहा जाता है ।
अतोऽनुमानाय तत्कालं चक्र चक्रार्द्धं जं यतेः ।
तद् योग दिनजौ कार्यों सूक्ष्मो सूर्य निशाकरौ । १७ ।
अतः शुक्ल योग और वृद्धि योग को चक्र (२१,६००) और चक्रार्द्ध (१०,८००)
का समय मान कर उस दिन का तात्कालिक सूक्ष्म सूर्य और चन्द्र साधन करेंगे ।
न्यूनाधिका विलिप्तासु तद् भुक्त्यन्तर भाजिताः
लब्धैर्दण्डादिभिः कालः पूर्वः कार्यो युतोनितः । १८ ।
(रवि और चन्द्र) दोनों का अयनांश संस्कार कर जोड़ेंगे । योगफल शुक्ल योग
में (२१,६००) कला से और वृद्धि योग में ( १०,८००) कला से कितना कम या
अधिक है यह ज्ञात करेंगे । इसको चन्द्र और रवि के गति अन्तर कला से भाग
देने पर लब्धि दण्ड आदि होगा । इस दण्ड आदि को पूर्व अनुमानित समय में
योग या वियोग करेंगे । (रविचन्द्र योग कला चक्र या चक्रार्द्ध से कम हो पर
योग अन्यथा वियोग)