सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
ग्रहर्क्षोदयास्तसमय वर्णनम् २१३
सूर्य मन्द भुजफल के वृहस्पति, शनि तथा मंगल के उदयास्त कालिक चतुर्थ
शीघ्र केन्द्र में जोड़ेगे या घटायेंगे । बुध और शुक्र में यह संस्कार विपरीत क्रम
से होगा ।
स्फुट केन्द्रे मथो भानो रयनांश परिष्कृतात् ।
ग्रहस्योनस्य पूर्वोक्त कालांशार्द्ध विशोध्य च । ५२ ।
तात्कालिक सायन सूर्य की राशि से ग्रह कम होने पर ग्रह के लिखे गये
कालांश के आधा को रवि से घटायेंगे ।
अधिकस्य रवौ तस्मिन् यो जयित्वा तदर्द्धकम् ।
यतस्याद्राश्यादिक भानौ प्राक्स्थे लग्नं तदेव हि । (५३ ।
रवि से ग्रह अधिक होने पर ग्रह कालांश का आधा रवि में जोड़ेगे । रवि
पूर्व में होने पर वही उस समय का लग्न होगा ।
प्रत्यक् स्थेषड् भयुक् कृत्वा तस्माद् वित्रिभतः पुनः ।
क्रान्ति मक्षांश संस्कारान्नतांशानुन्नतांश कान् । ५४ ।
रवि पश्चिम में रहने पर उक्त रवि राशि आदि में ६ राशि जोड़कर उस समय
का लग्न आयेगा । लग्न में ३ राशि घटाकर उससे क्रान्ति निकालेंगे । इस क्रान्ति
में अक्षांश संस्कार कर उससे नतांश और उन्नतांश निकालेंगे ।
आनीयाथ नता नंशान् कृते (४) षे (५) ङ्गा (६) ऽद्रि (७) दन्तिभिः (८) ।
क्रमाद् विभज्य शुक्रेज्या बुधार्किक्षमा भुवाकं ते । ५५ ।
इस प्रकार शुक्र, गुरु, बुध, शनि और मंगल का नतांश निकाल कर उसमें
क्रमानुसार ४,५,६,७ और ८ से भाग देकर
तत्फलाढ्या उन्नतांशा स्तेभ्यः साध्योन्नतज्यका
स्वस्वो दयास्त कालांश स्त्रि्ज्याघ्ना उन्नत ज्यया । ५६ ।
फल को उन्नतांश में जोड़कर उसकी ज्या निकालेंगे । इन ताराग्रहों के लिखे
गये उदयास्त कालांश को त्रिज्या से गुणा कर उस योग (उन्नतांश के संस्कार के
बाद) ज्या से
हता तत्फल मंशादयं ग्रहे तदप वृत्तगे ।
तत्सूर्येन्तर मेव स्याद् ध्रुवोऽस्तोदययोर्मतम् । ५७ ।
भागय देने पर जो अंश आदि फल होगा वह ग्रह का क्रान्ति वृत्तीय मान
होगा । इसे रवि से घटाने पर अस्तोदय का ध्रुव होगा ।
ध्रुवार्द्ध संस्कृते प्राग् वत् सायनार्के पुरः स्थिते ।
शून्ये कादि भगोतेषां क्षेत्रांश उत्कले यथा । ५८ ।
ग्रह के अस्तोदय ध्रुव का आधा से सायन रवि का संस्कार पहले की तरह
२१४ सिद्धान्त दर्पण
करते हैं । अर्थात् सायन रवि से कम ग्रह का ध्रुव का आधा सायन रवि से घटाया
जायेगा । रवि से अधिक ग्रह रहने पर सायन रवि में ध्रुव का आधा जोड़ा
जायेगा । यह संस्कृत सायन रवि ०,१,२ आदि जिस राशि में है उसके अनुसार
उत्कल में ग्रहों का क्षेत्रांश दिया जा रहा है ।
शून्ये भेदश काव्यस्य कलाभिरुयब्धि भिर्युताः (१०/४३)
एकस्मिन् षड् भुजैः काष्ठा (१०/२६) द्वयेर्नव च भूशरैः (९।५१) । ५९ ।
शुक्र क्षेत्रांश संस्कृत सायन रवि १ और १२ राशियों में- १०/२६
(उत्कल) २ और ११ राशियों -९/५१
त्रिषङ्का ख भुजै (९/२०) र्मेषु चतुर्षु नवचान्धिभिः(९/ ४०)
पञ्चस्वङ्काश्चषट् स्वङ्काभूवै (९।१) तेपञ्च भादिजाः । ६० ।
शुक्रक्षेत्रांश - संस्कृत सायनरवि ३,१० राशि में रहने पर- ९।२०
(उत्कल) ४-९ ” ” -९।४०
५-८ ” ” -९।०
६-७ ” ” - ९।१
व्युत्क्रमात्सप्तभाद्येषु ज्ञेया भानौ तु पश्चिमे
संस्कृते प्राग्वदे तस्मात् सषड् भान्तेंऽशकामतः । ६१ ।
ऊपर १ से ६ राशियों में जो क्षेत्रांश दिया हुआ है उसके उल्टे क्रम से ७-१२
राशियों में क्षेत्रांश होता है । यह ऊपर के श्लोक अर्थ में लिखा जा चुका है ।
रवि पश्चिम में रहने पर उसमें ६ राशि घटाकर उसका पहले के समान ०,१,२
आदि राशि में क्षेत्रांश होगा ।
एकैक भध्रुव लवान्तर घ्नैः संस्कृताकैजैः ।
अंशैः खाग्नि (३०) स्पष्टा बहल्पा वियुता युताः । ६२ ।
इसके बाद संस्कृत रवि के अंशादि को ध्रुवांश के अन्तर से गुणा कर ३० से
भाग देने पर जो लब्धि होगी उसको क्षेत्रांश अधिक होने पर उसमें जोड़ेगे । और
क्षेत्रांश कम होने पर उसमें घटाने से स्पष्ट क्षेत्रांश होगा ।
अथ शून्यैक भाद्येषु क्षेत्रांश पूर्ववद् गुरोः
विश्वमै (१३/२७) र्विश्वकेदो र्भ्या (१३/२)
सूर्यारुद्रैः (१२/११) पिनाकिनः । ६३ ।
इसी प्रकार उत्कल में वृहस्पति का क्षेत्रांश
सायन संस्कृत रवि, १,१२ राशि में १३°/२७'
” २-११ ” - १३°/२'
” ३-१० ” - १२°/११'
ग्रह युति वर्णनम् १८५
नक्षत्र चन्द्रयोर्युत्यां दृग् गतिः शत ताड़िता
धरित्री त्रिभुजै (२३१) र्भक्ता लम्बनाय परोत्त वेत् । ९५ ।
नक्षत्र और चन्द्र योग में वित्रीभ लग्न के शंकु को (१००) से गुणा कर (२३१)
से भाग देने पर स्फुट लम्बन के लिए पर ज्या होती है ।
एवंज्ञ शुक्रयोर्भानौ प्रवेशा पगम क्रमः
सशरोदिक् शरस्तत्रच्छेदके मध्यगो रविः । ९६ ।
चन्द्र और भगृह के योग की तरह, वक्री बुध और शुक्र की सूर्य मण्डल में
पूर्व से प्रवेश और पश्चिम से निर्गम करते है । रवि का शर नहीं रहने के कारण
बुध और शुक्र का शर ही युति शर और इस शर का दिग् ही शर दिग् होगा ।
परिलेख के समास वृत्त से मध्य में ही रवि बिम्ब होगा ।
तारा ग्रहाणां किरणैः शंकुच्छाया यदि स्फुटा
छायाग्रस्ते तदा दर्शे दृश्यास्ते शंकु मूर्ध्वगाः । ९७ ।
भौमादि तारा ग्रहों की किरण से १२ अंगुल शंकु की छाया नहीं दिखती है ।
अतः छायाग्र बिन्दु पर दर्पण रख कर शंकु अग्र बिन्दु की तरफ देखने पर छायाग्र
बिन्दु का स्थान मालूम होगा । (शंकु अग्र और ग्रह एक स्थान पर दिखेंगे ।
समभूमौ प्रतिष्ठाप्य पञ्च हस्तोच्छितं नरम् ।
दृढं सममृजुं वृत्तं द्वाद शांगुलान्वितम् । ९८ )
समतल भूमि में पांच हाथ ऊंचा एक शंकु खड़ा करेंगे । शंकु के १२ भाग
कर प्रत्येक भाग पर चिह्न देंगे । शंकुओं को दृढ़ और सीधा रखकर उसकी सतह
वृत्ताकार करेंगे ।
इष्ट कालिक खेटस्य नत का लान्तिजां प्रभाम्
शंकोरानीय तन्मान सूत्रेण परितो लिखेत् । ९९ ।
इष्ट काल ग्रह की नत कला से द्वादशां गुल शंकु की छाया निकाल कर
(त्रिप्रश्नाधिकार विधि से) छाया व्यासार्द्ध से शंकु से चारों ओर एक वृत्त खींचेंगे ।
तन्मूलाद् वृत्तमत्र प्राक् परयोर्याम्य सौम्य योः
विलेखे केन्द्र संस्पर्शी सरलं रेखिका द्वयम् । १०० ।
उस वृत्त में दिक् चिह्न (त्रिप्रश्नाधिकार विधि से) देकर केन्द्र बिन्दुओं से
पूर्वा पर और याम्योत्तर रेखा खीचेंगे ।
ग्रहस्यर्क्षस्य वास्पष्ट क्रान्तिज्या भाश्रयोहता
लम्बज्याप्ता भवेदग्रा स्वेष्टा काले ऽङ्गुलात्मिका । १०१ ।
इसके बाद ग्रह या नक्षत्र के इष्ट काल की स्पष्ट क्रान्ति ज्या निकाल कर
उसको छाया कर्ण से गुणा कर लम्ब ज्या से भाग देंगे । लब्धि अंगुलात्मक कर्ण
१८६ सिद्धान्त दर्पण
वृत्ता ग्रा होगी ।
दक्षिणोत्तरयोः क्रान्त्यो स्तद् युतोना पल प्रभा
वियोगा च्छेष दिक् संस्था भुजां गुल संज्ञका । १०२ ।
कर्णवृत्ताग्रा की दिशा दक्षिण क्रान्ति से दक्षिण और उत्तर क्रान्ति में उत्तर
होगी । इसमें पल भा घटाने (उत्तर या गौम्य क्रान्ति में) या जोड़ने (याम्य क्रान्ति
में) से अंगुलात्मक छायाग्र का भुज होगा ।
दक्षिणोत्तर रेखायां शलाकां भुज सम्मिताम् ।
केन्द्रात् प्रसार्य दिग् भेदात् अग्रे बिन्दुं निधायच । १०३ ।
वृत्त केन्द्र सेदक्षिण उत्तर रेखा पर उल्टी दिशा में छायाग्र भुज के बराबर
(शलाका की) दूरी पर चिह्न देंगे । याम्य (यादक्षिण) भुज में उत्तर की तरफ सौम्य
भुज में दक्षिण की तरफ ।
भुज वर्गा न भा वर्गोत्तल शंकु र्भवेत् पदम् ।
साकोटि प्राक् कपालस्थे खगोविन्दो परांदिशम् । १०४ ।
छाया वर्ग में भुजवर्ग घटाकर उसका ग्रह लेने से घबराते शंकु होता है ।
जिसे कोटि भी कहते हैं ।
ग्रह बिम्ब पूर्व काल में रहने पर भुजाग्र बिन्दु से पश्चिम तथा -
प्रत्यक् स्थे प्रतिपूर्वाशां प्रासार्या यत्र सास्पृशत् ।
वृत्तं तत्र प्रभाग्रं स्यात् ततः शंकु शिखावधि । १०५ ।
ग्रह बिम्ब पश्चिम कपाल में रहने पर भुजाग्रबिन्दु से पूर्व मे कोटि देकर देखेंगे
कि किस स्थान में यह कोटि छाया वृत्तार्द्ध को छूता है । वह स्पर्श बिन्दु ही शंकु
का छायाग्र होगा ।
नलकं कर्णमार्गस्थ न्यस्यास्य शुषिरेण सः ।
भाग्रस्थ मुकुरे खेटो दर्शनीयो विपश्चिता । १०६ ।
इस छायाग्र बिन्दु से छाया कर्ण मार्ग से नली रखकर नीचे की तरफ से या
दर्पण रखकर प्रतिबिम्ब में वही ग्रह दीखेगा ।
योग काले ग्रहौद्रष्टुंतद् विक्षेप समान्तरम्
शंकुद्वयं निखायास्य शिखयोः सगता विमौ । १०७ ।
ग्रहयुति के समय में दोनों ग्रहों को देखने के लिए ग्रहों के शर के बराबर
अन्तर पर पहले की तरह दो शंकु गाड़कर उसकी शिखा को
छायाग्र लग्न नेत्राय दर्शनीयां सुबुद्धये
द्रष्टव्यानि फलान्यासां संहिता सु युधां बुधैः । १०८ ।
छायाग्र से आंख लगा कर ऊपर की तरफ देखने पर बुद्धिमान लोग आसानी
से दोनों ग्रह देख सकते हैं । विभिन्न प्रकार की ग्रह युति का फल संहिता ग्रन्थों
में (जैसे बृहत् संहिता) पण्डित लोग देखें ।
भक्ताये वृत्त बिम्बा इह गगन सदा सूक्ष्म बिम्बाश्च भानां
वक्ष्यन्ते तेऽच्छभावान्नृप (१६) गुण सित रुक् कान्ति जाज्वल्यमानाः
स्वीयेष्वस्तोदयाशेष मृतकर सम ज्योति रालोक नायो
च्यन्तेव्यासे श्रतुघ्नै स्तनवइति चतुर्थांश माना स्वतस्तः । १०९ ।
यहां जिन ग्रहों का वृत्त बिम्ब कहा गया तथा जिन तारा बिम्बों के बारे में
बाद में कहा जायेगा वे अति स्पष्ट होने के कारण चन्द्र बिम्ब से १६ गुणा ज्यादा
प्रकाश मान दीखते हैं । उदय और अस्त (सूर्य की निकटता के कारण) के समय
ग्रह बिम्ब का तेज चन्द्र समान दीखने के कारण उनका बिम्ब ४ गुणा कर के
कहा गया है । इस से यह स्पष्ट है कि बिम्ब का चतुर्थांश ही वास्तविक बिम्ब
मान है ।
दृष्टं शुक्रस्य गाढास्तमयजं मण्डलं चण्ड भानौ
कीटांशे पञ्चविंशे गतवति कलितोऽर्था दृगोऽब्ध्य (४९७५) ब्द वृन्दे
भास्वद् विकम्भ दन्तां (३२) शमित इदं खार्थषड् (६५०) योजनंस्य
दित्यन्यज्ज्ञेय मस्मान्नव इन तनो स्तार का को र्णहाः स्युः । ११० ।
शुक्र के कारण सूर्य ग्रहण निकालने के लिये उसका बिम्ब मान एवं तारा
ग्रह व्यवस्था कही जाती है । कलिगत वर्ष ४९७५ में सूर्य वृश्चिक राशि के शुक्रकृत
सूर्य ग्रहण हुआ था । उस समय शुक्र बिम्ब सूर्य बिम्ब का १/३२ अंश हुआ था
और यह (६५०) योजन के बराबर है । अतः सूर्य से बाकी तारा और जल ग्रहों
का बिम्ब बहुत छोटा है यह स्पष्ट भाव से प्रभावित हुआ ।
अम्बुदा वलि विड़म्बित तनु श्री रम्बु राशितट विस्फुट धामा
किम्बु पत्तन पतिः पतितानां सम्भ्युदस्यतु तम पटले नः । १११ ।
नील जलधर के तेज को जो अपने तेज से लज्जित करते हैं, और जो सागर
तीर पर वास करते हैं, वही प्रभु जगन्नाथ हमारे जैसे पतितो का अज्ञान अन्धकार
दूर करें ।
इत्यु त्कलो ज्जवल नृपाल कुल प्रसूत
श्रीचन्द्र शेखर कृते गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बालबोधे
एकादशोऽग्रहयुति प्रययौ प्रकाशः । ११२ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्र शेखर द्वारा
गणना और दृष्टि से समानता तथा छात्रों के पठन के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण
में ग्रह युति नामक एकादश अध्याय समाप्त हुआ ।
द्वादशः प्रकाश
भ ग्रह योग वर्णनम्
अथ भ ग्रह योगाय भानां वक्ष्ये ध्रुवान् शरान्
संख्याकारान् योगताराः सांगानां बिम्ब विस्तृतो । १ ।
तारा और ग्रह योग जानने के लिये अश्विनी आदि तारागणों का क्रान्ति
वृत्तीय ध्रुव राशि आदि, उनका आकार और संख्या, प्रत्येक का योग तारा (प्रशस्त
तारा और उनका शर और इस योग तारा का बिम्ब विस्तार इस प्रकार के आरम्भ
में कहा जाता है ।
द स्रादीनां ध्रुवांशा स्युर्व्यङ्घ्रि काष्ठाः
(१।९।४५) कुबाहव । (२।२१)
सपादेद्व्यग्नयः (३-३५।१५) सार्द्ध षडवेदाः
(४) ४६।३०) सांघ्रि खर्त्तवः । (५-६०/१५) । २ ।
अश्विनी आदि नक्षत्रों का ध्रुवांश (क्रान्ति वृत्त में मेष ०° से दूरी ) इस प्रकार
है- १. अश्विनी ९।४५, २. भरणी, २१ ३. कृत्ति का ३५।१५ ४. रोहिणी-४६/३०.
५ मृगशिरा ६०/१५
शरषट् (६-६५) सांघ्रि शून्यां काः (७-९०/१५)
कृताशा (८-१०४) वसुखेन्दवः (९-१०८)
रसाकाँ: (१०-१२६) सार्द्धवह्नीन्द्रा (११-१४३/३०)
राम बाणाहिमांशव (१२-१५३) । ३ ।
६. आर्द्रा (६५), ७. पुनर्वसु (९०।१५) ८. पुष्य (१०४), ९. अश्लेषा (१०८)
१०. मघा (१२६), ११. पूर्वाफाल्गुनी (१४३) १२. उत्तराफाल्गुनी (१५३)
शरभूपा (१३-१६५) नवघनाः (१४-१७९) त्रिनन्द सितमानव, (१५-१९३)
नगाभ्रपक्षाः (१६-२०७) सार्द्धाष्टभूभुजां (१७-२१८/३०) रसट्टग् दृशः । ४ ।
१३. हस्त (१६५) १४. चित्रा (१७९), १५. स्वाती (१९३), १६. विशाखा, (२०७)
१७. अनुराधा (२१८।३०) ।
अद्दोना (१८-२२५/३०) रूयंशहीनेन्दुसिद्धः
(१९-२४०।४०) खशरबाहवः (२०-२५०)
अर्द्धयुक् तर्क तत्वानि (२१-२५६/३०)
दलोना द्रीषु बाहवः ( १-२५६/३०) । ५ ।
१८. ज्येष्ठा (२२५/३०) १९. मूल (२४०/४०) २०. पूर्वाषाढ़ ( २५०) २१. उत्तराषाढ़
(२५६/३०), ०, अभिजित् (२५६ /३०)
भ ग्रह योग वर्णनम् १८९
त्रिभानि (२२-२७३) सार्द्ध पञ्चाष्ट पक्षा (२३-२८५।३०)
व्याघ्य्र्य ष्टभूगुणः (२४-३१७।४५) दृग् दन्ता (२५-३२२)
दन्ति गीर्वाणाः (२६-३३८) शून्यं (२७-०) साभिजितामिति । ६ ।
२२. श्रवण (२७३) २३. धनिष्ठा (२८५।३०) २४ शतभिष् (३१७।४५) २५.
पूर्व भाद्रपद (३२२) २६. उत्तर भाद्रपद (३३८), २७. रेवती (०)
क्रान्त्यान्तादेषामथविक्षेपांशान्लाढय
दिश (१-१०।३०) ईशाः (२-११)
सांग्र्य व्ययः (३-४।१५) सहाद्धेन्द्रियाणि
(४-५।३०) सार्द्धानलक्षितयः (५-१३।४०) ।७ ।
नक्षत्र मण्डल के योगतारा का शर या क्रान्ति वृत्त से उत्तर या दक्षिण दिशा
में उनकी दूरी कही जाती है ।
१ अश्विनी (उ-१०।३०) २. भरणी (उ-११) ३. कृत्तिका (३-४।१५) ४. रोहिणी
(द-५।३७) ५. मृगशिरा (द. १३।३०)
त्र्यंशोन तर्क चन्द्राः (६-१५।४०) सार्द्धरसाः
(७.६।३०) सांघ्रिरूप (८- १।१५) मकार्श्व (९-१२)
रूपदलंनिजषष्ठांशोनित (१०-०।२२) मर्थेन्दवो
(११-१२) विश्वे (१२-१३) । ८ ।
६. आर्द्रा (द-१५।४०) ७. पुनर्व (उ-६।३०) ९ पुष्प उत्तर १।१५) ९. अश्लेषा
(द-१२), १०. मघा (उ-०।१२) ११. १२. उत्तरा फाल्गुनी (उ-१३।०)
रुद्राः (१३-११) सरसांशदृशौ (१४-२।१०)
देवा (१५-३३) बाहू (१६-२) भुजौ (१७-२२)
सपादकृता (१८-४।१५) सदलानलरजनीशा (१९-१३।३०)
सार्द्धांगा (२०-६।३०) न्यत्रिभागकृताः (२१.३।४०) । ९ ।
१३. हस्त (द-११।०) चित्रा (द-२।१०) स्वाती (उ.३३।०) १६. विशाखा (द.
२।०) १७. अनुराधा (द.२।०) १८. ज्येष्ठा (द. ४।१५) १९.मूल (द-१३।३०), २०.
पूर्वाषाढ़ (द.६।३०), २१. उत्तराषाढ़ (द- ३।४०)
द्वाषष्टि (०-६२) रभ्ररामा (२२-३०
षट्त्रिंश (२३-३६ ) च्छितिदीधितेरूयंशः
(२४-०।२०) दन्ता (२५-३२)गजभुज संख्या
(२६-२८) शरा (२७-५।०) इतिशराक्रमाभानाम् । १० ।
०. अभिजित् (उ-६२।०) २२. श्रवण (उ-३०।०, ) २३. धनिष्ठा (उ- ३६।०)
२४. शतभिष् (द-०।२०) पूर्वभाद्रपद (उ-३२।०) २६. उत्तर भाद्रपद (उ-२८) २७
रेवती (उ.५।०) ।
१९० सिद्धान्त दर्पण
ब्रह्मात्रयस्य (४।५।६) राधाषटक (१६।१७।१८।१९।२०।२१)
स्वहेः (९) करस्य (१३) चित्राया (१४) वरुणस्य (२४)
च विक्षेपो याम्यः सौम्येऽपरर्क्षाणाम् । ११ ।
निम्नलिखित नक्षत्रों का विक्षेप दक्षिण दिशा में होता है ।
(४, ५, ६, १६, १७, १८, १९, २०, २१, ९, १३, १४, २४)
बाकी नक्षत्रों का विक्षेप उत्तर दिशा में होता है । (यह पहले ही दिखाया
जा चुका है ।
रामा (१-३) गुणाः (२-३) षड् (३ -६)
विषया (४-५) हुताशा (५-३)
रूपं (६-१) शरा (७-५) वह्नय
(८-३) आशुगाश्च (९-५)
बाणा (१०-५) दृशौ (११-२) युग्म
(११-२) मथेन्द्रियाणि (१३-५)
धरा (१४-१) स्थिरा (१५-१) पञ्च
(१६-५) नगाश्च (१७-७) रामाः (१८-३) । १२ ।
१. अश्विनी (३). २. भरणी (३) ३ कृत्तिका (६) ४. रोहिणी (५), ५ मृगशिरा
(३) ६. आर्द्रा (१), ७ पुनर्वसु (५) ८ पुष्य (३) अश्लेषा (५), १० मघा (५) ११.
पूर्वाफाल्गुनी (२), १२. उत्तराफाल्गुनी (२), १३. हस्त (५) चित्रा (१) १५. स्वाती
(१), विशाखा (५) ५ अनुराधा (७) १८. ज्येष्ठा (३)
नन्दाः (१९-९) समुद्राः (२०-४) निगमा (२१-४) गुणाश्च (२-३)
रामा (२२-३) खाग्न भुवौ (२४- १००) भुजौ (२५-२) च
दृशौ (२६-२) द्विरामा (२७-३२) इति तारकाणां
संख्यादिता राभिजिता क्रमेण । १३ ।
१९. मूल (९) २०. पूर्वाषाढ़ (४) उत्तराषाढ (४) अभिजित् (३) २२. श्रवण
(३) २३. धनिष्ठा (५) २४. शतभिष (१००) २५ पूर्वभाद्रपद (२) २६. उत्तरभाद्रपद
(२) २७ रेवती (३२) ये विभिन्न नक्षत्रों में तारों की संख्या है ।
जीवर्क्षं (८) मध्ये बहुतारकाणां स्थितावपि व्यक्ति तयाविनाद्यैः ।
एकत्वमुक्तं कतिचिद् विभिन्न संख्यानि भानोत्यपरे वदन्ति । १४ ।
८. पुष्य नक्षत्र में अनेक तारा रहने पर भी वे स्पष्ट नहीं दीखने के कारण मेरे
मत से एक ही तारा है । कई आचार्य अनेक नक्षत्रों में ताराओं की संख्या भिन्न
भिन्न कहते हैं ।
ऋक्ष चयस्याकृतयः प्रत्यय हेतो तथा भिधास्यन्ते ।
तुर गवदन (१) त्रिकोश (२) ज्वलनशिखा (३) सदृक्षास्ताः । १५ ।
अब नक्षत्रों की आकृतिका वर्णन किया जाता है । १. अश्विनी का रूप घोड़े
भ ग्रह योग वर्णनम् १९१
के मुँह के समान, २. भरणी-त्रिकोण आकार ३ कृत्तिका अग्निशिखा के समान
तथा ४. रोहिणी-गाड़ी (शगड़) या बैल गाड़ी के समान ।
मार पाद (५) विद्रुम (६) कार्मुक )७)
कटिनीरजः (८) श्व पुच्छ (९) निभाः
लांगल (१०) भारसमामे (११) भार (१२)
कराभे (१३) च मुक्ताभा (१४) । १६ ।
५. मृगशिरा -बिल्ली के पैर या मृग के मुख के समान, ६. आर्द्रा मूंगा (
मणि) या बूंद की तरह ७. पुनर्वसु का आकार धनुष के समान ८. पुष्य का
आकार खल्ली (Chalk) के टुकड़े या तीर की तरह ९. अश्लेषा का आकार कुत्ते
की पूंछ के समान १०. मघा का आकार हल की तरह, ११. पूर्वा और उत्तरा
फाल्गुनी (१२) दोनों का आकार भार (कावरया लाठी पर दोनों तरफ लटकाये
हुए) के समान १३. हस्त का आकार हाथ के समान, १४. चित्रा का आकार मोती
के समान
माणिक्य (१५) तोरण (१६) फणि (१७)
कोड़रद (१८) किम्बु (१९) सर्प (२०) सदृश
तनवः सूर्या (२१) ग्निन बिम्बं सायक (२२)
मुरज (२३) वितान (२४) प्रतीकाशाः (१७) ।
१५. स्वाती का आकार माणिक्य, या मूंगा १६. विशाखा तोरण ( छप्पर )
की तरह १७. अनुराधा सांप के फण के समान, १८. ज्येष्ठा-सूअर के दांत की
तरह, १९. मूल-शंख के समान, (या सिंह की पूंछ की तरह) २०. पूर्वाषाढ़ और
२१ उत्तराषाढ दोनों सूप की तरह (या हाथी दांत की तरह) ०.० अभिजित् अग्नि
बिम्ब की तरह या त्रिकोण २२. श्रवण शर (तीर) की तरह (या वामन) २३.
धनिष्ठा- नगाड़ा की तरह, २४. शतभिष् तोरण की तरह ,
भारनिभा (२५ भारसमा (२६) मीनाभा (२७) चेतिसम्मताद् भढ़वः ।
काश्चित् कैश्चित् प्रोक्ता भिन्ना कृतयः स्वशास्त्रेषु । १८ ।
२५ पूर्व भाद्रपद और २६. उत्तर भाद्रपद भार (डण्डे के दोनों तरफ लटके)
या मञ्च के समान २७ रेवती का आकार मछली या नगाड़ा की तरह दीखता
है । नक्षत्रों का आकार समस्तो के मत से समान नहीं है ।
अश्वि (१) चन्द्र (५) भगे (११) न्द्राग्नि (१६) तोय २०) विश्वा (२१)
जपादका (२५) अहिर्बुध्नस्यो (२६) तरस्थायोगताराध्रुवां शगा । १९ ।
किस नक्षत्र का योगतारा कहां स्थित है यह कहा जाता है । १. अश्विनी ५.
मृगशिरा, ११. पूर्वाफाल्गुनी १६ विशाखा, २० पूर्वाषाढ, २१. उत्तराषाढ़, २५.
पूर्वभाद्रपद तथा २६. उत्तर भाद्रपद इन नक्षत्रों का योग तारा नक्षत्र के उत्तर दिशा
में है ।
१९२ सिद्धान्त दर्पण
इन्द्र (१८) गोविन्द (२२) मित्रा (१७) ग्नि (३) जीवानां (८) मध्यगा मताः ।
आदित्या (७) दित्य (१३) दैत्यानां (१९) ईशान दिग वस्थिताः । २० ।
१९. ज्येष्ठा, २२. श्रवण, १७. अनुराधा ३. कृत्तिका, ८. पुष्य इन नक्षत्रों का
योग तारा नक्षत्र के मध्य में । ७ पुनर्वसु, १३. हस्त, १९ मूल-इनका योग तारा
नक्षत्र के ईशान दिशा में है ।
वित्त (२३) स्याभिजितः (०) पश्चात् पूर्वस्या ब्रह्म (४) सर्पयो (९)
याम्या स्थूलापितुः (१०) पूषा यमा (२) र्यमणाञ्च (१२) दक्षिणाः । २१ ।
२३. धनिष्ठा और अभिजित् (०) का योग तारा नक्षत्र के पश्चिम में है । ४.
रोहिणी और ९. अश्लेषा का योग तारा पूर्व में है । १० मघा का योग तारा अत्यन्त
स्थूल है और नक्षत्र के दक्षिण में है । २७ रेवती, २. भरणी और १२ . उत्तराफाल्गुनी
का योगतारा नक्षत्र के दक्षिण में है ।
कुपीटयोनि काष्ठायां योगतारा प्रचेतसः (२४)
शंकर त्वष्ट्र वातानां (६,१४,१५) स्वरूपाण्य के भावतः । २२ ।
२४. शतभिषा का योगतारा आग्नेय कोण में है । ६. आर्द्रा, १४ . चित्रा और
१५. स्वाती में एक ही तारा अतः इनके योगतारा और नक्षत्र पुञ्ज में कोई अन्तर
नहीं है । योगतारा का ही ध्रुव और शर, नक्षत्र का ध्रुव और शर होता है ।
योगतारा विलिप्तास्तु सूक्ष्मा, क्रमान् मानतः षड् (६) भुजौ
(२) वह्वयः (३) समयः (७) ईक्षणे (२) क्ष्माभृतः (७)
कुञ्जरा (८) लोचने (२) सिन्धवः (४) षड् (६)
गुणा (३ ) वार्द्धय (४) तथाब्धयः । २३ ।
योगताराओं की सूक्ष्म बिम्ब कला (विलिमा में) कही जाती है । १. अश्विनी
(६) २ भरणी (२) ३. कृत्तिका (३) ४. रोहिणी (७) ५. मृगशिरा (२) ६. आर्द्रा
(७) ७ पुनर्वसु (८) पुष्य (२) ९. अश्लेषा (४) १० मघा (६) ११. पूर्वाफाल्गुनी
(३) १२. उत्तरा फाल्गुनी (४) १३. हस्त (४)
सैन्धवा (७) स्त्रीन्दव (१३) श्रुक्षुषो (२) सिन्धवः (४) ।
सप्त (७) पञ्चा (५) ब्धय (४) श्रान्धयो (४) ऽ ब्धोन्दवः । (१४)
वाजिनः (७) पावका (३) वीति होत्राः (३) कृता (४)
अर्णवा (४) वह्वयः (३) श्चेति दस्रादितः । २४ ।
१४. चित्रा (७) १५. स्वाती (१३) १६. विशाखा (२) १७. अनुराधा (४ ) १८
ज्येष्ठा (७) १९. मूल (५) २०. पूर्वाषाढ़ (४) २१. उत्तराषाढ (४) ०. अभिजित् (१४)
२२. श्रवण (७) २३. धनिष्ठा (३) २४. शतभिष (३) २५. पूर्वाभाद्रपद (४) २६ उत्तर
भाद्रपद (४) २७. रेवती । (३) ।
भ ग्रह योग वर्णनम् १९३
देवमातु (७) पुनर्याम्यगा तारका सर्वतारा
धिका तद् विलिप्ता नखाः (२०)
तद् ध्रुव सप्त सप्तां (७७) शंका मार्गण,
खार्णवां (४०) शा निजापक्रमादक्षिणः । २५ ।
(अन्य कई तारों का ध्रुव, बिम्बमान तथा शर दिया जा रहा है । ७. पुनर्वसु
नक्षत्र के दक्षिण में सबसे उज्ज्वल एक तारा का बिम्ब कला (२०) ध्रुव (७७)
तथा ध्रुव प्रोतीय क्रान्ति (४०)
सूर्यसिद्धान्त वाक्यादियं तारका लुब्धका ख्यो सुनिश्चेति निश्चीयते ।
चेददित्या स्तदा याम्य गान्वा लघु स्तारका तत्समीपेऽपि निर्णीयताम् ।२६।
सूर्य सिद्धान्त के मत से इसे लुब्धकर तारा कहा जाता है । और एक छोटा
तारा भी (पुनर्वसु के दक्षिण में) दीखता है । जो लुब्धक नहीं है ।
केचिदातु मृगव्याधनामा मुनिः सोमभाद् (५)
याम्य गस्तद् ध्रुवोङ्गे षवः (५६)
याम्य वाणो रदाः ३२ स्वापमां दशकादिग् (१०)
विलिप्ताश्वतन्मण्डलस्या यतिः । २७ ।
कोई कोई आचार्य मृगव्याध नक्षत्र को मृगशिरा नक्षत्र के दक्षिण में मानते
हैं । इसका ध्रुव ५६ दक्षिणशर ३२ तथा बिम्ब मान १० है ।
तस्य चेशा (५) नभस्या (६) पिमध्य स्थितास्तारक
स्तिप्र ईषाभका ईल्वलाः ।
एक षष्टि (६१) ध्रुवः स्थूल भस्यार्द्ध युग्
वह्निपक्षाः (२३-१/२) शरोयाम्य आसा मतः । २८ ।
यह मृगव्याध और आर्द्रा नक्षत्र के बीच तीर के आकार के तीन तारा है ।
इनको ईल्वला कहा जाता है । इनके बीच का योगतारा है जिसका ध्रुव (६१)
तथा दक्षिण शर (२३।३० ) है ।
हुतभुग् ब्रह्म हृदय योः पक्षार्था (५२) शा ध्रुवश्व सौरोक्तः ।
प्रथमस्या ष्टौ (८) त्रिंश (३०) द्वितीय भस्यो त्तरेऽंशाः । २९ ।
हुतभुक् नक्षत्र का सूर्य सिद्धान्त के अनुसार ध्रुव (५२) और उत्तर शर (८)
है । ब्रह्महृदय का भी सूर्य सिद्धान्त के अनुसार ध्रुव (५२) तथा उत्तर शर (३०)
है ।
ब्रह्महृदय पूर्वस्यां पञ्चभिंरंशैः प्रजापति र्वसति
तस्योत्तर विक्षेपः कुञ्जर रामां (३८) शकोऽप्युदितः । ३० ।
ब्रह्महृदय से पूर्व ५° की दूरी पर प्रजापति नक्षत्र है । जिसका ध्रुव ५७° तथा
उत्तर शर ४८° है (सूर्य सिद्धान्त के अनुसार) ।
१९४ सिद्धान्त दर्पण
आधिनिकैरभियुक्ते निश्चित्योक्तं पृथक् च संस्थानम्
हत भुग् ब्रह्म हृदयोः प्रजापतये तत्पुन र्वच्मि । ३१ ।
आधुनिक प्रत्यक्ष दर्शी लोगों ने इन तारा का जो ध्रुव का कहा है वह मैं पुन
कहता हूँ ।
हृदभुक् ध्रुव, सपादाष्टाथी (५८।१५) खा साघ्रि पञ्च (५।१५)
सौम्यशरः षड् विकलास्त मानं ध्रुवः पुनर्ब्रह्म हृदयस्य । ३२ ।
हतभुक् का ध्रुव ५८° १५' शर ५° १५' उत्तर तथा बिम्ब मान (६) है । ब्रह्म
हृदय का ध्रुव -
अंगार्थाः (५६) सौम्य शर स्त्रिभुज (२३) लवान्नुपाः (१६)
स्तनुविकलाः सौम्य (५) याम्यगतो यो लुब्धक एतत् प्रजापतिम् । ३३ ।
५६° उत्तरशर २३° तथा बिम्बमान (१६) है । मृगशिरा नक्षत्र से दक्षिण के
तारा को लुब्धक कहा गया था उसे अब प्रजापति कहा जाता है ।
त्वाष्ट्र (१४) स्यापां वत्सः पञ्चलवान्ते वसत्युदक् भागे ।
आप्य वसु स्तत्सौम्य स्थूलः किञ्चित्ततोऽगां (६) शैः । ३४ ।
१४. चित्रा तारा के उत्तर ५° की दूरी पर अपांवत्स तारा है । इसके उत्तर ६°
की दूरी पर आप्य वसुतारा है, यह कुछ बढ़ा दीखता है । इसका अन्य नाम आप
है ।
ध्रुवोऽगस्तस्य पञ्चांक (९५) भागाः पञ्चाद्रयः (७५) शरः (५) ।
दक्षिणस्तद्द्भुवो वामं चलांशैः संस्कृतः स्फुटः । ३५ ।
अपां वत्स और आप्य वसु-दोनों का ध्रुव चित्रा के समान है । अपां वत्स
का उत्तर शर २° ५०' तथा आप्य वसु का उत्तरशर (८° ५०') है । अगस्त्य तारा
का ध्रुव ९५° और दक्षिण शर ७५° । इस अगस्त्य के ध्रुव का अयनांश संस्कार
(धन होने से जोड़ेगे, ऋण होने से घटायेंगे) करने पर यह स्फुट होगा ।
धृतयो (१८) विकलास्तस्य सूक्ष्ममण्डल विस्तृतिः ।
यमस्यैव द्विपक्षां (२२) शां ध्रुवो ऽगां गानि (६६) मार्गणः । ३६ ।
अगस्त्य का बिम्ब (१८") ध्रुव (२२°) शर (६६°) दक्षिण
याम्योऽष्टौ विकला बिम्बोऽगस्त्यब्द ध्रुव संस्कृतिः ।
राशित्रयमगस्त्यस्य ध्रुवः सौरोदितः पुरा । ३७ ।
तथा बिम्ब मान (८") है । सूर्य सिद्धान्त अगस्त्य तारा का ध्रुव ९०° कहा
है । (जब सत्ययुग में अल्प या १२१ वर्ष बाकी था) ।
सप्त नागां शक (८७) प्रोक्त सत्सिद्धान्त शिरोमणौ
भू शराक्षिकृता (४२५१) ब्देषु कलेभास्कर धीमता । ३७ ।
भ ग्रह योग वर्णनम् १९५
कलि गताब्द (४२५१) में भास्करा चार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि में अगस्त्य का
ध्रुवांश ८७° कहा है ।
सोक्तादिति (७) ध्रुवा (९३) त्पश्चाद् भागषट्कान्तरे (८७) यतः ।
दृष्टोऽसौ साम्प्रतं सार्द्धघनां (१७।३०) शान्तर इक्ष्यते । ३९ ।
(सिद्धान्त शिरोमणि में ) पुनर्वसुका ध्रुव ९३° तथा अगस्त्य का उससे ६°
कम अर्थात् ८७° कहा है । अभी सिद्धान्त दर्पण के समय १८६८ ई में) में यह
(७) पुनर्वसु से १७° ३०' पीछे है । अर्थात् (९०° १५'- १७° ३०'- ७२° ४५') अगस्त्य
ध्रुव ९५° में चलांश २२° घटाने पर भी ७३° (प्रायः समान आता है ।
युग्मस्य विश्व (१३) भागान्ते तदब्दे गौकुपर्वतैः । (७१९)
तस्य स्थानान्तरं सिद्धं सार्द्धरुद्रायनांशजम् । (११।३०) । ४० ।
अगस्त्य का ८७° ध्रुव ११° ३०' अयनाश (सिद्धान्त शिरोमणि)के समय था ।
अभी का मिथुन १३° (७३°) ध्रुव भास्कर के ७१९ वर्ष का परिवर्तन है । (१८६८
ई.में)
सप्तर्षि मण्डल
सप्तर्षीणां ध्रुव प्राग्भिर्नोक्त सञ्चार सम्भवात्
तथाप्यतु भवालेषां व्यवस्था क्रियतेऽधुना । ४१ ।
चलन शील होने के कारण सप्तर्षि मण्डल का ध्रुव पूर्वा चार्यों ने नहीं कहा
है । तथापि अपने अनुभव के आधार पर इनकी स्थिति के बारे में मैं कहता हूँ ।
पूर्वाग्रंशकटाकार, मुदक् स्थ मुडु सप्तकम् ।
सुरर्षि मण्डल प्रोक्तं व्यक्तं विश्व नमस्कृतम् । ४२ ।
उत्तर दिशा में पूर्व से पश्चिम की तरफ शगड़ (बैल गाड़ी) की तरह सप्तर्षि
मण्डल बहुत स्पष्ट दीखता है । संहिता और पुराण में सप्तर्षि मण्डल को जगद्
वन्द्य कहा गया है ।
तत्पूर्वोन्नत रेखाग्रे मरीचिः पश्चिमे ततः ।
वशिष्ठोऽरुन्धती युक्तस्तत्पश्चादंगिराः स्थितः । ४३ ।
सप्तर्षि मण्डल में पूर्व की तरफ जो उठी हुयी रेखा दीखती है उसके आगे
में मरीचि का स्थान है । मरीचि के पीछे वशिष्ठ, अरुन्धती के साथ है । वशिष्ठ
के पश्चिम अंगिरा है ।
तत्पश्चात् चतुरस्रस्य शम्भु दिश्यत्रिरस्य च ।
पुलस्त्यो दक्षिणे तस्य पश्चिमे पुलहः स्थितः । ४४ ।
इसके बाद जो चतुर्भुज है उसके ईशान कोण में अत्रि हैं । अत्रि के दक्षिण
पुलस्त्य और पुलस्त्य के दक्षिण पुलह स्थित है ।
१९६ सिद्धान्त दर्पण
क्रतुस्तदुत्तर स्थान स्तत्रोक्तौ पुलहः क्रतुः
ध्रुव सूत्रेण यल्लग्नौ तदृक्षस्थाम हर्षया । ४५ ।
पुलह के उत्तर में क्रतु है पुलह और क्रतु को मिलाने वाले ध्रुव प्रोत वृत्त
क्रान्ति नक्षत्र को जिस स्थान पर काटेगा उसी नक्षत्र (या राशि) में सप्तर्षि मण्डल
को माना जायेगा ।
कथ्यते साम्प्रतं सिंहे भूभुजांशा (२१) न्त गौ हितौ ।
कालांशैर्विश्वकैः (१३) प्राच्यां पुलस्त्ये वर्त ते ततः । ४६ ।
अभी पुलह और क्रतु सिंह राशि के २१ अंश पर या पूर्व फाल्गुनी के तृतीय
पाद में है । पुलह और क्रतु से १३ कालांश पूर्व में पुलस्त्य हैं ।
ततस्तैःसायकै (५) रत्रि रंगिरा नवभि (९) स्ततः ।
ततोऽष्टाभि (८) र्वशिष्ठोऽस्मान् मरीचिर्वततेऽ ष्टभिः (८) । ४७ ।
पुलह से ५ कालांश पूर्व में अत्रि, अत्रि से ९ कालांश पूर्व अंगिरा, अंगिरा,
से ८ कालांश पूर्व वशिष्ठ तथा वशिष्ठ से ८ कालांश पूर्व मरीचि है ।
अरुन्धतो स्थिता प्राच्यां स्वामिनोऽद्रि (७) कलान्तरे ।
या वशिष्ठाति ने दिष्ठा यन्त्र दृष्टा शुरेततः । ४८ ।
अरुन्धती वशिष्ठ से ७ कलान्तर पूर्व, वशिष्ठ के निकट बहुत छोटा तारा जो
आंख से कठिनाई से दीखता है या यन्त्र द्वारा दीखता है ।
स नेष्टा सदसद् दृष्टि फलोक्तः प्रथमेष्यते ।
एकास्या मानविकलाः त्रिस्त्रो ऽत्रेरुष्ट चान्यतः । ४९ ।
वह शुभ अशुभ फल दायक नहीं है । पहले जो कहा गया है । (वशिष्ठ से
७ कला पूर्व) वही अरुन्धती फल दायक है । इसका बिम्ब मान १ विकला है ।
अत्रि का बिम्ब ३ विकला और बाकी सभी तारों का (सप्तर्षि मण्डल में) बिम्ब
मान ८ विकला है ।
परस्परस्य चैतेषां सदातुल्यान्तर स्थितेः ।
गृह्न्यन्ता मृक्ष यो गेषुकालां शादिक् (१०) पलात्मकाः । ५० ।
इन तारा गणों की परस्पर दूरी समान है अतः इनका कालांश १० पल है ।
तेऽष्टादशशताभ्यस्ता व्यक्षलग्नासुभिर्हताः ।
प्राग् ध्रुवाढ्या भवन्तीह मुनिक्रान्त गृहांशकाः । ५१ ।
इस १० पल को १८०० से गुणा कर निरक्ष उदय (लग्न मान) असु से भाग
देने पर जो लब्धि होगी उसे पुलह और क्रतु के पूर्वोक्त ध्रुव (सिंह २१°) में जोड़ने
से ऋषि नक्षत्र का राशि आदि ध्रुव होगा ।
भ ग्रह योग वर्णनम् १९७
सप्तर्षि मण्डला याम स्त्रयब्धि (४३) कालांश कोऽपि यत्
सायनांश तुलाकन्या स्थित्यांगोऽब्ध्यंश (४६) इक्ष्यते । ५२ ।
सप्तर्षि मण्डल की पूर्व से पश्चिम दिशा में लम्बाई ४३ कालांश होने पर भी
सायन कन्या और तुला राशि में उसकी स्थिति के कारण यह लम्बाई (४६) अंश
दीखती है ।
क्रान्त्यन्तात्सौम्य बाणांशा लिख्यन्तेऽङ्गशराः (५६) क्रतोः ।
पुलहस्यैक पञ्चाशत् (५१) पुलस्त्यस्याग्नि सायकाः (५३) । ५३ ।
क्रतु का क्रान्तिवृत्त से ध्रुव प्रोत वृत्त पर उत्तर शर (५६°) अंश है । पुलह
का (५१°) तथा पुलस्त्य का (५३°) है ।
अंक पत्रिण (५९) एवात्रेः षष्टि (६०) रंगिरसोमता ।
द्वाषष्ट्यंशा (६२) वशिष्ठस्य मरीचेः षष्टि (६०) रीक्षिता । ५४ ।
अत्रि का (५९°), अंगिरा का (६०°), वशिष्ठ का (६२°) और मरीचि का
(६०°) उत्तर शर दीखता है ।
सर्वदायं शरः क्रान्ते र्यदि तुल्यो भवेत्तदा
युग्मान्तर वशिष्ठः स्यात् चतुर्भागान्तरो ध्रुवात् । ५५ ।
यदि क्रान्ति से वशिष्ठ का शर सर्वदा समान रहे तो यह युग्मान्त (मिथुन
अंत) में रहने के कारण ध्रुव से ४° पर रहेगा । वशिष्ठ का उत्तर या सौम्य शर
६२ युग्मान्त की क्रान्ति २४° कुल ८६°, अतः ध्रुव ९०° से अन्तर ५° हुआ ।)
स्फुट क्रान्ते र्महर्षीणां तुल्यता यदि सर्वदा
तदा राश्यन्तर प्राप्तौ विक्षेपो भिन्नतां व्रजेत् । ५६ ।
सप्तर्षियों में प्रत्येक की स्फुट क्रान्ति सदा समान रहने पर भी, वे अन्य राशि
में जाने पर उनका शर बदलता है ।
यमागस्त्य स्फुट क्रान्ते र्यथा साम्यं सदेक्ष्यते ।
दस्त्रादीनाञ्च वैषम्यं तथैषां नेक्षितोऽपमः । ५७ ।
यम और अगस्त्य की स्फुट क्रान्ति सदा समान होती है । अश्विनी आदि
नक्षत्रों की क्रान्ति सदा बदलती है । सप्तर्षि मण्डल की क्रान्ति कभी सम कभी
असमान होती है ।
प्रत्यब्द प्राग् गतिः प्रोक्ता पुराणे रष्ट लिप्तिका
तेषां नो निश्चिता पूर्वा नुभावा दर्शनान्यथा । ५८ ।
पूर्व आचार्यों से सप्तर्षिमण्डल की पश्चिम से पूर्व गति वर्ष में ८ कला मानी
है । पर मैने (लेखक) यह गति नहीं देखी है । अतः इसे नहीं मानता हूँ ।
१९८ सिद्धान्त दर्पण
तथायनांश संस्कारो वामस्तेषां यदीरितः
तत्सर्वं कविभिर्भाव्यै ज्ञेय मत्कार्लिक स्थिते । ५९ ।
यम, अगस्त्य और सप्तर्षि मण्डल का अयन संस्कार ध्रुव से विपरीत दिशा
में करने के लिए कहा गया है । वह मेरे समय के लिए (१८६८ ई) के लिए हैं ।
लिप्ता तिथ्यंश (१५) मानः (४) खे यत्र राजत्युदग् ध्रुवः
न तन्मध्य ध्रुव स्थानं सूत्रा पाता र्ह मिष्यते । ६० ।
ध्रुव तारा (उत्तर) का बिम्ब मान लिप्ता का १/१५ भाग (या ४ विकला) है ।
उत्तर ध्रुव तारा का स्थान वास्तविक ध्रुव स्थान नहीं है । अतः यह विषुववृत्त
का केन्द्र नहीं है और ध्रुव और वृत्त इससे नहीं खींचा जाता है ।
कृताष्ट (८४) लिप्तान्तरितो निजकेन्द्राद् यतो ध्रुवः ।
मेषादिस्तोन्न मत्यस्मान् पौष्णभे (२७) गगनाङ्गगे । ६१ ।
दृश्य ध्रुव तारा नाड़ी वृत्त के पृष्ठ केन्द्र (गणितीय ध्रुव) से लिप्ता (१° २५')
की दूरी पर है । अतः रेवती नक्षत्र याम्योत्तर वृत्त पर आने से ध्रुवतारा मेषादि में
रहकर याम्योत्तर वृत्त पर ८४ कला नत दीखता है ।
उन्नतो दृश्यते विष्णो (२२) दित्यां (७) चाक्ष समोच्छितः
त्वाष्ट्रे (१४) नतस्ततो मध्य स्थान मस्या नुमीयताम् । ६२ ।
श्रवण पुनर्वसु याम्योत्तर वृत्त पर रहने के समय, यह ध्रुत नक्षत्र दिग्वलय से
अपने अक्षांश के समान उन्नत दीखता है । पुनः चित्रा नक्षत्र याम्योत्तर वृत्त पर
आने से ध्रुव अपने केन्द्र से ८४ कला नत दीखता है ।
एवं याम्य ध्रुवो मेधि मूलयोजित गौरिव
तुल्यादिस्थो भ्रमन्प्रे दृश्यते सुरभागगैः । ६३ ।
इसी प्रकार दक्षिण ध्रुव भी दक्षिण गोलार्द्ध के लोगों को वास्तविक ध्रुव केन्द्र
के चारों तरफ मेढ़ी के बैल की तरह घूमता दीखता है ।
अंशास्तु त्रिविधा ज्ञेया, मानांशा, काल जांशकाः ।
क्षेत्रांशाश्चेति लग्नानां भेदातौ क्षेत्र काल जौ ।
अंश तीन प्रकार के है-मानांश, कालांश और क्षेत्रांश । राशियों का उदय
मान भिन्न भिन्न हने के कारण क्षेत्रांश और कालांश -
अंशौ विभिन्नौ भवतः चक्रान्ते संख्यया समौ ।
मान कालांशयो साम्यं विषुवह्वत एव तत् । ६५ ।
भिन्न भिन्न होते हैं । पर चक्र समाप्त होने पर इन दोनों का मान ३६०° होता
है । मानांश और कालांश का मान विषुव वृत्त में समान होता है पर
भ ग्रह योग वर्णनम् १९९
महदन्तर मे वस्यात्तदुदग् याम्य भागयोः
प्राक् पश्चिमान्तरस्यायं क्रमोना वागुदं मिते । ६६ ।
विषुव से उत्तर का दक्षिण जाने पर कालांश और मानांश में बहुत अन्तर
होगा । सप्तर्षि मण्डल के तारों का क्रम पूर्व पश्चिम दिशा स्थिति (देशान्तर के
अनुसार) लिया जाता है (सबसे पश्चिम का पहला तारा आदि) यह उत्तर दक्षिण
दिशा (अक्षांश) के क्रम से नहीं लिया जाता ।
यथात्र पुलह क्रत्वो सौम्य याम्यन्तरं शराः (५)
भागा एव समादृष्टा मरीच्यन्तं क्रतो पुनः । ६७ ।
जिस प्रकार पुलह और क्रतु का शरान्तर (ध्रुव प्रोतीय वृत्तान्तर) ५° मात्र है,
यह सदा समान रहता है । उसी प्रकार क्रतु और मारीचि का पूर्व-पश्चिम अन्तर
प्राक् पश्चादन्तरेदृष्टा दृष्टा मानांश स्तत्त्व (२५) संख्यकाः ।
सार्द्धा (०।३०) तत्त्व शरां शेभ्य स्तयोः साध्यौ स्फुटा पमौ । ६८ ।
मानांश २५° तथा शरांश २५° ३०' है । इससे पूर्व विधि से स्फुट क्रान्ति का
साधन किया जा सकता है ।
दिनव्यास दले प्राग्वत् तद् योगार्द्ध हति र्भवेत् ।
मानां शास्त्रि ज्याभ्यस्ता हृत्प्राप्ताः क्षेत्रजांशकाः । ६९ ।
स्फुट क्रान्ति द्वारा द्युज्या का साधन होगा । दोनों द्युज्या (क्रान्ति वृत्तीय और
विषुव वृत्तीय) का योगार्द्ध हार कहलाता है । मानांश को त्रिज्या से गुणा कर
हार से भाग देने से प्राप्त फल क्षेत्रांश (क्रान्ति वृत्तीय अंश)
स्युस्ते लग्नाः सुगुणिताः ख ख नाग मही (१८००) हताः ।
कालांशाः स्युस्ततो मान भाग व्युत्क्रम कर्मतः । ७० ।
क्षेत्रांश को राशि से उदयासु से गुणा कर (१८००) से भाग देने पर फल का
कालांश होता है । इस प्रकार मरीचि और क्रतु का कालांश आयेगा विपरीत
क्रिया से इस कालांश से मानांश निकलेगा ।
एवं ध्रुव भ्रान्ति मार्ग खांगाग्नि (३६०) क्षेत्र भाग कः ।
अप्यष्टाम्बुधि लिप्तास्तु वसु (८।४८) मानांश सम्मिताः । ७१ ।
ध्रुव क्षेत्र के भ्रमण मार्ग का वृत्त ३६०° अंश होने से उसका मानांश
(३६०X८४)/३४३८ = ८'४८" मात्र है ।
क्रान्ति भेदे महर्षि णा माकृतेः समता यदि
स्यात्तदान्तर कालांशाः क्रान्त्यल्पत्व महत्वयोः । ७२ ।
क्रान्ति बदलने पर सप्तर्षियों का आकार यदि स्थिर रहता है (क्रान्ति कै साथ
नहीं बदलता) तो क्रान्ति कम या अधिक होने पर
क्रमादल्पाश्च भूयासो भवेयु र्द्युगुण क्रमात्
कालांशशर मेतेषां क्रान्ति भेदे यदि स्थिरम् । ७३ ।
उदयान्तर भी कम या अधिक होता है (क्रमानुसार द्युज्या अधिक या कम
होने के कारण) ।
यदि क्रान्ति भेद होने पर सप्तर्षि तारों का कालान्तर स्थिर रहता है,
तद् कृतेर्हानि वृद्धि स्या तामृक्षान्तरांश वत् ।
स्थिरा क्रान्ति र्यदैषां स्यात् कालांश, स्युस्तदास्थिराः । ७४ ।
तो क्रान्ति कम या अधिक होने पर तारा का पूर्व पश्चिम अन्तर कम या अधिक
अक्षांश अन्तर के समान होता है । यदि ताराओं की कान्ति स्थिर हो तो उनका
कालांश भी स्थिर रहेगा ।
क्षेत्रांशानां स्थिरत्वे स्यात् काल मानाल्प भूरिता
क्षेत्र मानांशयोः सिद्धिः काल भागां शयोरिव । ७५ ।
क्षेत्रांश स्थिर रहने पर कालांश के साथ मानांश कम या अधिक होगा ।
कालांश और भागांश के समान ही कालांश और मानांश का परस्पर सम्बन्ध
निकलेगा ।
नक्षत्राणां ध्रु
भ ग्रह योग वर्णनम् २०१
वहां सदा उदित रहेगा (वहां उक्त नक्षत्र सदा दिखायी देगा) उस नक्षत्र की दक्षिण
स्फुट क्रान्ति लम्बांश से अधिक होने पर वह नक्षत्र उस स्थान पर सदा अस्त
रहेगा अर्थात् कभी दिखाई नहीं देगा ।
ग्रहाक्षान्तरजा लिप्ता ग्रह भुक्त्या विभाजिता ।
दिनादिभिः फलैर्योगो ग्रहे हीनेऽधिके ध्रुवात् । ८० ।
जिस ग्रह का किसी नक्षत्र के साथ योग जानना हो उस ग्रह का आयन दृक्
कर्म संस्कार कर उसका और नक्षत्र के ध्रुव का अन्तर निकालते हैं । ग्रह नक्षत्र
की अन्तर कला को ग्रह की स्फुट गति कला से भाग देकर लब्धि दिनादि होगी ।
ग्रह ध्रुव, (नक्षत्र) ध्रुव से कम होने पर उतने दिनों के बाद योग होगा, ध्रुव से
अधिक होने पर
एष्यो गतो वक्रगेतु गतैष्यत्व विपर्ययात् ।
असकृत् कर्मणा तुल्य कले स्यातां ग्रहो डुनी । ८१ ।
उतने समय (दिन आदि) पहले योग हो चुका है । ग्रह वक्री होने पर ग्रह
नक्षत्र योग का क्रम उल्टा होगा (ग्रह ध्रुव से कम रहने पर उतने समय पहले
योग हुआ, अधिक रहने पर बाद में योग होगा । योग समय का स्फुट ग्रह और
ध्रुव के अन्तर के पुनः अन्तर काल निकाल कर फिर योग काल निकालेंगे । बार
बार ऐसा करने से ग्रह और नक्षत्र की कला समान होती है ।
ग्रहस्यायन दृक् कर्म कृत्वाऽथ ग्रहतारयोः ।
कार्ये दिन निशा माने स्फुट क्रान्ति चर क्रमात् । ८२ ।
इसके बाद ग्रह और नक्षत्र की अपनी अपनी स्फुट क्रान्ति और चर निकाल
कर दिन और रात्रि मान का साधन होगा ।
उदयेऽस्त समये लग्न मस्त लग्नं प्रकल्प्य च ।
तत्समेऽर्के तदुदय मस्तं ज्ञात्वान्तरां शकैः । ८३ ।
इससे ग्रह और तारा दोनों का उदय के समय उदय लग्न तथा अस्त के समय
अस्त लग्न होगा । पहले कहे गये अक्षदृक् कर्म विधि से स्फुट रवि का अंश
उतना ही होने पर उदय और अस्त का समय होगा ।
कार्यात्समता प्राग् वद् याभ्य सौम्यान्तरन्तयोः ।
बिम्ब भेदश्च निर्णैतुं शक्यते ग्रह युद्धवत् । ८४ ।
इसके बाद नक्षत्र उदयास्त प्रकरण की विधि से उदय और अस्त स्फुट होगा ।
उसके बाद भी अन्तर रहने पर पहले की तरह कला समान करेंगे । इसके बाद
ग्रह योग बिधि से ग्रह और नक्षत्र का उत्तर दक्षिण अन्तर (ध्रुव प्रौतीय शरान्तर)
तथा बिम्ब अन्तर का निर्णय करेंगे ।
२०२ सिद्धान्त दर्पण
ब्रह्मो ज्यानल चित्र पित्र दितयो मित्रेन्द्र शक्राग्नयः
पौष्णाम्भः पति वैश्वदेव सलिला (४।८।३।१४।१०।७।१७
।१८।१६।२७।२४।२१।२०। नीषुक्रमात् खेचरैः । भिद्यन्ते
(१।२।५।६।९।११।१२।१३।१५।१९।०।२२।२३।२५।२६)
तत्र दितिभं (७) सर्वैः सदा भिद्यते ।
कादाचित्कतया जलान्त्यदहनाः (२०।२७।३)
शिष्टानि (४।८।१०।१४।१६।१७।१८।२१।२४) तैः प्रायशः । ८५ ।
रोहिणी, पुष्य, कृत्तिका, चित्रा, मघा, पुनर्वसु, अनुराधा, ज्येष्ठा विशाखा,
रेवती, शतभिषा, पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ इन १३ नक्षत्रों का ग्रह भेद करते हैं ।
अश्विनी भरणी, मृगशिरा, आर्द्रा, अश्लेषा, पूर्वा फाल्गुनी , हस्त, स्वाती, मूल,
अभिजित्, श्रवण, धनिष्ठा, पूर्व भाद्रपद और उत्तर भाद्रपद इन १५ नक्षत्रों का भेद
ग्रह नहीं कर पाते हैं । भेद्य नक्षत्रों में पुनर्वसु का सभी ग्रह भेद करते हैं । पूर्वाषाढ़,
रेवती और कृत्तिका का कभी-कभी भेद होता है । अन्य नक्षत्रों का क्रान्ति के
अनुसार प्रायः भेद होता है ।
यस्यस्याद् वृष राशि शक्र (१४) लवगस्या वाक् शरोऽ शद्वयात् ।
सत्र्यंशा (२।२०) दधिकोभिनत्ति शकटं स्वायम्भुवंसग्रहः ।
अन्यर्क्षाकृतिभेद भाग कलना यन्त्रेण कार्याबुधैः
याम्यो दिग्गमनक्षं भेदज फलं ज्ञेयं श्रुतान्मैहिरात् । ८६ ।
वृष राशि के १४ अंश में जिस ग्रह की दक्षिण क्रान्ति २° २०' से अधिक हो
वही रोहिणी (शकट आकार) का भेद कर सकता है ।
अन्य नक्षत्रों का ग्रह द्वारा भेदन होने पर, ज्योतिर्तिविद् उनकी स्थिति यन्त्रवेध
द्वारा स्थिर करते हैं ।
नक्षत्रों के आकार तथा उनके उत्तर या दक्षिण ग्रहों की गति का फल
वाराहमिहरि की वृहत्संहिता में देखा जा सकता है ।
प्राक् सिद्धानां ज्योतिषां स्थानमित्थं प्रोक्तं व्यक्तं यानि भानीतराणि ।
खे लक्ष्यन्ते तत्तदाख्यापि संख्या विद्भिः ख्याति माप्ता न पूर्वैः । ८७ ।
प्राचीन काल से विख्यात कई स्थानों की स्थिति इस प्रकार कही गयी ।
इसके अतिरिक्त और कितने नक्षत्र हैं उनकी संख्या भी ज्ञात नहीं है । अश्विनी
आदि के अतिरिक्त अन्य नक्षत्रों के बारे में यहां नहीं कहा गया है ।
अपव्योम्निच्छाया पथ इतिह वैश्वानर पथो-
ऽभिजिन्मार्ग सूक्ष्मैर्घन तर भचक्रे र्निचलितः ।
प्रकाशात्सा वृत्ता कृति रनुमितो भ्रामति च य-
स्तदीयं संस्थानं कियदिह वदामि स्फुट तयां । ८८ ।
आकाश में अत्यन्त सूक्ष्म तारा गणों का सघन और वृत्ताकार मार्ग गतिशील