सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहर्क्षोदयास्तसमय वर्णनम् २१३
सूर्य मन्द भुजफल के वृहस्पति, शनि तथा मंगल के उदयास्त कालिक चतुर्थ
शीघ्र केन्द्र में जोड़ेगे या घटायेंगे । बुध और शुक्र में यह संस्कार विपरीत क्रम
से होगा ।
स्फुट केन्द्रे मथो भानो रयनांश परिष्कृतात् ।
ग्रहस्योनस्य पूर्वोक्त कालांशार्द्ध विशोध्य च । ५२ ।
तात्कालिक सायन सूर्य की राशि से ग्रह कम होने पर ग्रह के लिखे गये
कालांश के आधा को रवि से घटायेंगे ।
अधिकस्य रवौ तस्मिन् यो जयित्वा तदर्द्धकम् ।
यतस्याद्राश्यादिक भानौ प्राक्स्थे लग्नं तदेव हि । (५३ ।
रवि से ग्रह अधिक होने पर ग्रह कालांश का आधा रवि में जोड़ेगे । रवि
पूर्व में होने पर वही उस समय का लग्न होगा ।
प्रत्यक् स्थेषड् भयुक् कृत्वा तस्माद् वित्रिभतः पुनः ।
क्रान्ति मक्षांश संस्कारान्नतांशानुन्नतांश कान् । ५४ ।
रवि पश्चिम में रहने पर उक्त रवि राशि आदि में ६ राशि जोड़कर उस समय
का लग्न आयेगा । लग्न में ३ राशि घटाकर उससे क्रान्ति निकालेंगे । इस क्रान्ति
में अक्षांश संस्कार कर उससे नतांश और उन्नतांश निकालेंगे ।
आनीयाथ नता नंशान् कृते (४) षे (५) ङ्गा (६) ऽद्रि (७) दन्तिभिः (८) ।
क्रमाद् विभज्य शुक्रेज्या बुधार्किक्षमा भुवाकं ते । ५५ ।
इस प्रकार शुक्र, गुरु, बुध, शनि और मंगल का नतांश निकाल कर उसमें
क्रमानुसार ४,५,६,७ और ८ से भाग देकर
तत्फलाढ्या उन्नतांशा स्तेभ्यः साध्योन्नतज्यका
स्वस्वो दयास्त कालांश स्त्रि्ज्याघ्ना उन्नत ज्यया । ५६ ।
फल को उन्नतांश में जोड़कर उसकी ज्या निकालेंगे । इन ताराग्रहों के लिखे
गये उदयास्त कालांश को त्रिज्या से गुणा कर उस योग (उन्नतांश के संस्कार के
बाद) ज्या से
हता तत्फल मंशादयं ग्रहे तदप वृत्तगे ।
तत्सूर्येन्तर मेव स्याद् ध्रुवोऽस्तोदययोर्मतम् । ५७ ।
भागय देने पर जो अंश आदि फल होगा वह ग्रह का क्रान्ति वृत्तीय मान
होगा । इसे रवि से घटाने पर अस्तोदय का ध्रुव होगा ।
ध्रुवार्द्ध संस्कृते प्राग् वत् सायनार्के पुरः स्थिते ।
शून्ये कादि भगोतेषां क्षेत्रांश उत्कले यथा । ५८ ।
ग्रह के अस्तोदय ध्रुव का आधा से सायन रवि का संस्कार पहले की तरह