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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 609 में से

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पृष्ठ 286

से दोनों ग्रह देख सकते हैं । विभिन्न प्रकार की ग्रह युति का फल संहिता ग्रन्थों
में (जैसे बृहत् संहिता) पण्डित लोग देखें ।
भक्ताये वृत्त बिम्बा इह गगन सदा सूक्ष्म बिम्बाश्च भानां
वक्ष्यन्ते तेऽच्छभावान्नृप (१६) गुण सित रुक् कान्ति जाज्वल्यमानाः
स्वीयेष्वस्तोदयाशेष मृतकर सम ज्योति रालोक नायो
च्यन्तेव्यासे श्रतुघ्नै स्तनवइति चतुर्थांश माना स्वतस्तः । १०९ ।
यहां जिन ग्रहों का वृत्त बिम्ब कहा गया तथा जिन तारा बिम्बों के बारे में
बाद में कहा जायेगा वे अति स्पष्ट होने के कारण चन्द्र बिम्ब से १६ गुणा ज्यादा
प्रकाश मान दीखते हैं । उदय और अस्त (सूर्य की निकटता के कारण) के समय
ग्रह बिम्ब का तेज चन्द्र समान दीखने के कारण उनका बिम्ब ४ गुणा कर के
कहा गया है । इस से यह स्पष्ट है कि बिम्ब का चतुर्थांश ही वास्तविक बिम्ब
मान है ।
दृष्टं शुक्रस्य गाढास्तमयजं मण्डलं चण्ड भानौ
कीटांशे पञ्चविंशे गतवति कलितोऽर्था दृगोऽब्ध्य (४९७५) ब्द वृन्दे
भास्वद् विकम्भ दन्तां (३२) शमित इदं खार्थषड् (६५०) योजनंस्य
दित्यन्यज्ज्ञेय मस्मान्नव इन तनो स्तार का को र्णहाः स्युः । ११० ।
शुक्र के कारण सूर्य ग्रहण निकालने के लिये उसका बिम्ब मान एवं तारा
ग्रह व्यवस्था कही जाती है । कलिगत वर्ष ४९७५ में सूर्य वृश्चिक राशि के शुक्रकृत
सूर्य ग्रहण हुआ था । उस समय शुक्र बिम्ब सूर्य बिम्ब का १/३२ अंश हुआ था
और यह (६५०) योजन के बराबर है । अतः सूर्य से बाकी तारा और जल ग्रहों
का बिम्ब बहुत छोटा है यह स्पष्ट भाव से प्रभावित हुआ ।
अम्बुदा वलि विड़म्बित तनु श्री रम्बु राशितट विस्फुट धामा
किम्बु पत्तन पतिः पतितानां सम्भ्युदस्यतु तम पटले नः । १११ ।
नील जलधर के तेज को जो अपने तेज से लज्जित करते हैं, और जो सागर
तीर पर वास करते हैं, वही प्रभु जगन्नाथ हमारे जैसे पतितो का अज्ञान अन्धकार
दूर करें ।
इत्यु त्कलो ज्जवल नृपाल कुल प्रसूत
श्रीचन्द्र शेखर कृते गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बालबोधे
एकादशोऽग्रहयुति प्रययौ प्रकाशः । ११२ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्र शेखर द्वारा
गणना और दृष्टि से समानता तथा छात्रों के पठन के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण
में ग्रह युति नामक एकादश अध्याय समाप्त हुआ ।