सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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क्रतुस्तदुत्तर स्थान स्तत्रोक्तौ पुलहः क्रतुः
ध्रुव सूत्रेण यल्लग्नौ तदृक्षस्थाम हर्षया । ४५ ।
पुलह के उत्तर में क्रतु है पुलह और क्रतु को मिलाने वाले ध्रुव प्रोत वृत्त
क्रान्ति नक्षत्र को जिस स्थान पर काटेगा उसी नक्षत्र (या राशि) में सप्तर्षि मण्डल
को माना जायेगा ।
कथ्यते साम्प्रतं सिंहे भूभुजांशा (२१) न्त गौ हितौ ।
कालांशैर्विश्वकैः (१३) प्राच्यां पुलस्त्ये वर्त ते ततः । ४६ ।
अभी पुलह और क्रतु सिंह राशि के २१ अंश पर या पूर्व फाल्गुनी के तृतीय
पाद में है । पुलह और क्रतु से १३ कालांश पूर्व में पुलस्त्य हैं ।
ततस्तैःसायकै (५) रत्रि रंगिरा नवभि (९) स्ततः ।
ततोऽष्टाभि (८) र्वशिष्ठोऽस्मान् मरीचिर्वततेऽ ष्टभिः (८) । ४७ ।
पुलह से ५ कालांश पूर्व में अत्रि, अत्रि से ९ कालांश पूर्व अंगिरा, अंगिरा,
से ८ कालांश पूर्व वशिष्ठ तथा वशिष्ठ से ८ कालांश पूर्व मरीचि है ।
अरुन्धतो स्थिता प्राच्यां स्वामिनोऽद्रि (७) कलान्तरे ।
या वशिष्ठाति ने दिष्ठा यन्त्र दृष्टा शुरेततः । ४८ ।
अरुन्धती वशिष्ठ से ७ कलान्तर पूर्व, वशिष्ठ के निकट बहुत छोटा तारा जो
आंख से कठिनाई से दीखता है या यन्त्र द्वारा दीखता है ।
स नेष्टा सदसद् दृष्टि फलोक्तः प्रथमेष्यते ।
एकास्या मानविकलाः त्रिस्त्रो ऽत्रेरुष्ट चान्यतः । ४९ ।
वह शुभ अशुभ फल दायक नहीं है । पहले जो कहा गया है । (वशिष्ठ से
७ कला पूर्व) वही अरुन्धती फल दायक है । इसका बिम्ब मान १ विकला है ।
अत्रि का बिम्ब ३ विकला और बाकी सभी तारों का (सप्तर्षि मण्डल में) बिम्ब
मान ८ विकला है ।
परस्परस्य चैतेषां सदातुल्यान्तर स्थितेः ।
गृह्न्यन्ता मृक्ष यो गेषुकालां शादिक् (१०) पलात्मकाः । ५० ।
इन तारा गणों की परस्पर दूरी समान है अतः इनका कालांश १० पल है ।
तेऽष्टादशशताभ्यस्ता व्यक्षलग्नासुभिर्हताः ।
प्राग् ध्रुवाढ्या भवन्तीह मुनिक्रान्त गृहांशकाः । ५१ ।
इस १० पल को १८०० से गुणा कर निरक्ष उदय (लग्न मान) असु से भाग
देने पर जो लब्धि होगी उसे पुलह और क्रतु के पूर्वोक्त ध्रुव (सिंह २१°) में जोड़ने
से ऋषि नक्षत्र का राशि आदि ध्रुव होगा ।