सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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वृत्ता ग्रा होगी ।
दक्षिणोत्तरयोः क्रान्त्यो स्तद् युतोना पल प्रभा
वियोगा च्छेष दिक् संस्था भुजां गुल संज्ञका । १०२ ।
कर्णवृत्ताग्रा की दिशा दक्षिण क्रान्ति से दक्षिण और उत्तर क्रान्ति में उत्तर
होगी । इसमें पल भा घटाने (उत्तर या गौम्य क्रान्ति में) या जोड़ने (याम्य क्रान्ति
में) से अंगुलात्मक छायाग्र का भुज होगा ।
दक्षिणोत्तर रेखायां शलाकां भुज सम्मिताम् ।
केन्द्रात् प्रसार्य दिग् भेदात् अग्रे बिन्दुं निधायच । १०३ ।
वृत्त केन्द्र सेदक्षिण उत्तर रेखा पर उल्टी दिशा में छायाग्र भुज के बराबर
(शलाका की) दूरी पर चिह्न देंगे । याम्य (यादक्षिण) भुज में उत्तर की तरफ सौम्य
भुज में दक्षिण की तरफ ।
भुज वर्गा न भा वर्गोत्तल शंकु र्भवेत् पदम् ।
साकोटि प्राक् कपालस्थे खगोविन्दो परांदिशम् । १०४ ।
छाया वर्ग में भुजवर्ग घटाकर उसका ग्रह लेने से घबराते शंकु होता है ।
जिसे कोटि भी कहते हैं ।
ग्रह बिम्ब पूर्व काल में रहने पर भुजाग्र बिन्दु से पश्चिम तथा -
प्रत्यक् स्थे प्रतिपूर्वाशां प्रासार्या यत्र सास्पृशत् ।
वृत्तं तत्र प्रभाग्रं स्यात् ततः शंकु शिखावधि । १०५ ।
ग्रह बिम्ब पश्चिम कपाल में रहने पर भुजाग्रबिन्दु से पूर्व मे कोटि देकर देखेंगे
कि किस स्थान में यह कोटि छाया वृत्तार्द्ध को छूता है । वह स्पर्श बिन्दु ही शंकु
का छायाग्र होगा ।
नलकं कर्णमार्गस्थ न्यस्यास्य शुषिरेण सः ।
भाग्रस्थ मुकुरे खेटो दर्शनीयो विपश्चिता । १०६ ।
इस छायाग्र बिन्दु से छाया कर्ण मार्ग से नली रखकर नीचे की तरफ से या
दर्पण रखकर प्रतिबिम्ब में वही ग्रह दीखेगा ।
योग काले ग्रहौद्रष्टुंतद् विक्षेप समान्तरम्
शंकुद्वयं निखायास्य शिखयोः सगता विमौ । १०७ ।
ग्रहयुति के समय में दोनों ग्रहों को देखने के लिए ग्रहों के शर के बराबर
अन्तर पर पहले की तरह दो शंकु गाड़कर उसकी शिखा को
छायाग्र लग्न नेत्राय दर्शनीयां सुबुद्धये
द्रष्टव्यानि फलान्यासां संहिता सु युधां बुधैः । १०८ ।
छायाग्र से आंख लगा कर ऊपर की तरफ देखने पर बुद्धिमान लोग आसानी