सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 609 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 294

भ ग्रह योग वर्णनम् १९५
कलि गताब्द (४२५१) में भास्करा चार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि में अगस्त्य का
ध्रुवांश ८७° कहा है ।
सोक्तादिति (७) ध्रुवा (९३) त्पश्चाद् भागषट्कान्तरे (८७) यतः ।
दृष्टोऽसौ साम्प्रतं सार्द्धघनां (१७।३०) शान्तर इक्ष्यते । ३९ ।
(सिद्धान्त शिरोमणि में ) पुनर्वसुका ध्रुव ९३° तथा अगस्त्य का उससे ६°
कम अर्थात् ८७° कहा है । अभी सिद्धान्त दर्पण के समय १८६८ ई में) में यह
(७) पुनर्वसु से १७° ३०' पीछे है । अर्थात् (९०° १५'- १७° ३०'- ७२° ४५') अगस्त्य
ध्रुव ९५° में चलांश २२° घटाने पर भी ७३° (प्रायः समान आता है ।
युग्मस्य विश्व (१३) भागान्ते तदब्दे गौकुपर्वतैः । (७१९)
तस्य स्थानान्तरं सिद्धं सार्द्धरुद्रायनांशजम् । (११।३०) । ४० ।
अगस्त्य का ८७° ध्रुव ११° ३०' अयनाश (सिद्धान्त शिरोमणि)के समय था ।
अभी का मिथुन १३° (७३°) ध्रुव भास्कर के ७१९ वर्ष का परिवर्तन है । (१८६८
ई.में)
सप्तर्षि मण्डल
सप्तर्षीणां ध्रुव प्राग्भिर्नोक्त सञ्चार सम्भवात्
तथाप्यतु भवालेषां व्यवस्था क्रियतेऽधुना । ४१ ।
चलन शील होने के कारण सप्तर्षि मण्डल का ध्रुव पूर्वा चार्यों ने नहीं कहा
है । तथापि अपने अनुभव के आधार पर इनकी स्थिति के बारे में मैं कहता हूँ ।
पूर्वाग्रंशकटाकार, मुदक् स्थ मुडु सप्तकम् ।
सुरर्षि मण्डल प्रोक्तं व्यक्तं विश्व नमस्कृतम् । ४२ ।
उत्तर दिशा में पूर्व से पश्चिम की तरफ शगड़ (बैल गाड़ी) की तरह सप्तर्षि
मण्डल बहुत स्पष्ट दीखता है । संहिता और पुराण में सप्तर्षि मण्डल को जगद्
वन्द्य कहा गया है ।
तत्पूर्वोन्नत रेखाग्रे मरीचिः पश्चिमे ततः ।
वशिष्ठोऽरुन्धती युक्तस्तत्पश्चादंगिराः स्थितः । ४३ ।
सप्तर्षि मण्डल में पूर्व की तरफ जो उठी हुयी रेखा दीखती है उसके आगे
में मरीचि का स्थान है । मरीचि के पीछे वशिष्ठ, अरुन्धती के साथ है । वशिष्ठ
के पश्चिम अंगिरा है ।
तत्पश्चात् चतुरस्रस्य शम्भु दिश्यत्रिरस्य च ।
पुलस्त्यो दक्षिणे तस्य पश्चिमे पुलहः स्थितः । ४४ ।
इसके बाद जो चतुर्भुज है उसके ईशान कोण में अत्रि हैं । अत्रि के दक्षिण
पुलस्त्य और पुलस्त्य के दक्षिण पुलह स्थित है ।