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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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२१४ सिद्धान्त दर्पण
करते हैं । अर्थात् सायन रवि से कम ग्रह का ध्रुव का आधा सायन रवि से घटाया
जायेगा । रवि से अधिक ग्रह रहने पर सायन रवि में ध्रुव का आधा जोड़ा
जायेगा । यह संस्कृत सायन रवि ०,१,२ आदि जिस राशि में है उसके अनुसार
उत्कल में ग्रहों का क्षेत्रांश दिया जा रहा है ।
शून्ये भेदश काव्यस्य कलाभिरुयब्धि भिर्युताः (१०/४३)
एकस्मिन् षड् भुजैः काष्ठा (१०/२६) द्वयेर्नव च भूशरैः (९।५१) । ५९ ।
शुक्र क्षेत्रांश संस्कृत सायन रवि १ और १२ राशियों में- १०/२६
(उत्कल) २ और ११ राशियों -९/५१
त्रिषङ्का ख भुजै (९/२०) र्मेषु चतुर्षु नवचान्धिभिः(९/ ४०)
पञ्चस्वङ्काश्चषट् स्वङ्काभूवै (९।१) तेपञ्च भादिजाः । ६० ।
शुक्रक्षेत्रांश - संस्कृत सायनरवि ३,१० राशि में रहने पर- ९।२०
(उत्कल) ४-९ ” ” -९।४०
५-८ ” ” -९।०
६-७ ” ” - ९।१
व्युत्क्रमात्सप्तभाद्येषु ज्ञेया भानौ तु पश्चिमे
संस्कृते प्राग्वदे तस्मात् सषड् भान्तेंऽशकामतः । ६१ ।
ऊपर १ से ६ राशियों में जो क्षेत्रांश दिया हुआ है उसके उल्टे क्रम से ७-१२
राशियों में क्षेत्रांश होता है । यह ऊपर के श्लोक अर्थ में लिखा जा चुका है ।
रवि पश्चिम में रहने पर उसमें ६ राशि घटाकर उसका पहले के समान ०,१,२
आदि राशि में क्षेत्रांश होगा ।
एकैक भध्रुव लवान्तर घ्नैः संस्कृताकैजैः ।
अंशैः खाग्नि (३०) स्पष्टा बहल्पा वियुता युताः । ६२ ।
इसके बाद संस्कृत रवि के अंशादि को ध्रुवांश के अन्तर से गुणा कर ३० से
भाग देने पर जो लब्धि होगी उसको क्षेत्रांश अधिक होने पर उसमें जोड़ेगे । और
क्षेत्रांश कम होने पर उसमें घटाने से स्पष्ट क्षेत्रांश होगा ।
अथ शून्यैक भाद्येषु क्षेत्रांश पूर्ववद् गुरोः
विश्वमै (१३/२७) र्विश्वकेदो र्भ्या (१३/२)
सूर्यारुद्रैः (१२/११) पिनाकिनः । ६३ ।
इसी प्रकार उत्कल में वृहस्पति का क्षेत्रांश
सायन संस्कृत रवि, १,१२ राशि में १३°/२७'
” २-११ ” - १३°/२'
” ३-१० ” - १२°/११'