सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रह युति वर्णनम् १८५
नक्षत्र चन्द्रयोर्युत्यां दृग् गतिः शत ताड़िता
धरित्री त्रिभुजै (२३१) र्भक्ता लम्बनाय परोत्त वेत् । ९५ ।
नक्षत्र और चन्द्र योग में वित्रीभ लग्न के शंकु को (१००) से गुणा कर (२३१)
से भाग देने पर स्फुट लम्बन के लिए पर ज्या होती है ।
एवंज्ञ शुक्रयोर्भानौ प्रवेशा पगम क्रमः
सशरोदिक् शरस्तत्रच्छेदके मध्यगो रविः । ९६ ।
चन्द्र और भगृह के योग की तरह, वक्री बुध और शुक्र की सूर्य मण्डल में
पूर्व से प्रवेश और पश्चिम से निर्गम करते है । रवि का शर नहीं रहने के कारण
बुध और शुक्र का शर ही युति शर और इस शर का दिग् ही शर दिग् होगा ।
परिलेख के समास वृत्त से मध्य में ही रवि बिम्ब होगा ।
तारा ग्रहाणां किरणैः शंकुच्छाया यदि स्फुटा
छायाग्रस्ते तदा दर्शे दृश्यास्ते शंकु मूर्ध्वगाः । ९७ ।
भौमादि तारा ग्रहों की किरण से १२ अंगुल शंकु की छाया नहीं दिखती है ।
अतः छायाग्र बिन्दु पर दर्पण रख कर शंकु अग्र बिन्दु की तरफ देखने पर छायाग्र
बिन्दु का स्थान मालूम होगा । (शंकु अग्र और ग्रह एक स्थान पर दिखेंगे ।
समभूमौ प्रतिष्ठाप्य पञ्च हस्तोच्छितं नरम् ।
दृढं सममृजुं वृत्तं द्वाद शांगुलान्वितम् । ९८ )
समतल भूमि में पांच हाथ ऊंचा एक शंकु खड़ा करेंगे । शंकु के १२ भाग
कर प्रत्येक भाग पर चिह्न देंगे । शंकुओं को दृढ़ और सीधा रखकर उसकी सतह
वृत्ताकार करेंगे ।
इष्ट कालिक खेटस्य नत का लान्तिजां प्रभाम्
शंकोरानीय तन्मान सूत्रेण परितो लिखेत् । ९९ ।
इष्ट काल ग्रह की नत कला से द्वादशां गुल शंकु की छाया निकाल कर
(त्रिप्रश्नाधिकार विधि से) छाया व्यासार्द्ध से शंकु से चारों ओर एक वृत्त खींचेंगे ।
तन्मूलाद् वृत्तमत्र प्राक् परयोर्याम्य सौम्य योः
विलेखे केन्द्र संस्पर्शी सरलं रेखिका द्वयम् । १०० ।
उस वृत्त में दिक् चिह्न (त्रिप्रश्नाधिकार विधि से) देकर केन्द्र बिन्दुओं से
पूर्वा पर और याम्योत्तर रेखा खीचेंगे ।
ग्रहस्यर्क्षस्य वास्पष्ट क्रान्तिज्या भाश्रयोहता
लम्बज्याप्ता भवेदग्रा स्वेष्टा काले ऽङ्गुलात्मिका । १०१ ।
इसके बाद ग्रह या नक्षत्र के इष्ट काल की स्पष्ट क्रान्ति ज्या निकाल कर
उसको छाया कर्ण से गुणा कर लम्ब ज्या से भाग देंगे । लब्धि अंगुलात्मक कर्ण