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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 297

१९८ सिद्धान्त दर्पण
तथायनांश संस्कारो वामस्तेषां यदीरितः
तत्सर्वं कविभिर्भाव्यै ज्ञेय मत्कार्लिक स्थिते । ५९ ।
यम, अगस्त्य और सप्तर्षि मण्डल का अयन संस्कार ध्रुव से विपरीत दिशा
में करने के लिए कहा गया है । वह मेरे समय के लिए (१८६८ ई) के लिए हैं ।
लिप्ता तिथ्यंश (१५) मानः (४) खे यत्र राजत्युदग् ध्रुवः
न तन्मध्य ध्रुव स्थानं सूत्रा पाता र्ह मिष्यते । ६० ।
ध्रुव तारा (उत्तर) का बिम्ब मान लिप्ता का १/१५ भाग (या ४ विकला) है ।
उत्तर ध्रुव तारा का स्थान वास्तविक ध्रुव स्थान नहीं है । अतः यह विषुववृत्त
का केन्द्र नहीं है और ध्रुव और वृत्त इससे नहीं खींचा जाता है ।
कृताष्ट (८४) लिप्तान्तरितो निजकेन्द्राद् यतो ध्रुवः ।
मेषादिस्तोन्न मत्यस्मान् पौष्णभे (२७) गगनाङ्गगे । ६१ ।
दृश्य ध्रुव तारा नाड़ी वृत्त के पृष्ठ केन्द्र (गणितीय ध्रुव) से लिप्ता (१° २५')
की दूरी पर है । अतः रेवती नक्षत्र याम्योत्तर वृत्त पर आने से ध्रुवतारा मेषादि में
रहकर याम्योत्तर वृत्त पर ८४ कला नत दीखता है ।
उन्नतो दृश्यते विष्णो (२२) दित्यां (७) चाक्ष समोच्छितः
त्वाष्ट्रे (१४) नतस्ततो मध्य स्थान मस्या नुमीयताम् । ६२ ।
श्रवण पुनर्वसु याम्योत्तर वृत्त पर रहने के समय, यह ध्रुत नक्षत्र दिग्वलय से
अपने अक्षांश के समान उन्नत दीखता है । पुनः चित्रा नक्षत्र याम्योत्तर वृत्त पर
आने से ध्रुव अपने केन्द्र से ८४ कला नत दीखता है ।
एवं याम्य ध्रुवो मेधि मूलयोजित गौरिव
तुल्यादिस्थो भ्रमन्प्रे दृश्यते सुरभागगैः । ६३ ।
इसी प्रकार दक्षिण ध्रुव भी दक्षिण गोलार्द्ध के लोगों को वास्तविक ध्रुव केन्द्र
के चारों तरफ मेढ़ी के बैल की तरह घूमता दीखता है ।
अंशास्तु त्रिविधा ज्ञेया, मानांशा, काल जांशकाः ।
क्षेत्रांशाश्चेति लग्नानां भेदातौ क्षेत्र काल जौ ।
अंश तीन प्रकार के है-मानांश, कालांश और क्षेत्रांश । राशियों का उदय
मान भिन्न भिन्न हने के कारण क्षेत्रांश और कालांश -
अंशौ विभिन्नौ भवतः चक्रान्ते संख्यया समौ ।
मान कालांशयो साम्यं विषुवह्वत एव तत् । ६५ ।
भिन्न भिन्न होते हैं । पर चक्र समाप्त होने पर इन दोनों का मान ३६०° होता
है । मानांश और कालांश का मान विषुव वृत्त में समान होता है पर

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