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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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२०२ सिद्धान्त दर्पण
ब्रह्मो ज्यानल चित्र पित्र दितयो मित्रेन्द्र शक्राग्नयः
पौष्णाम्भः पति वैश्वदेव सलिला (४।८।३।१४।१०।७।१७
।१८।१६।२७।२४।२१।२०। नीषुक्रमात् खेचरैः । भिद्यन्ते
(१।२।५।६।९।११।१२।१३।१५।१९।०।२२।२३।२५।२६)
तत्र दितिभं (७) सर्वैः सदा भिद्यते ।
कादाचित्कतया जलान्त्यदहनाः (२०।२७।३)
शिष्टानि (४।८।१०।१४।१६।१७।१८।२१।२४) तैः प्रायशः । ८५ ।
रोहिणी, पुष्य, कृत्तिका, चित्रा, मघा, पुनर्वसु, अनुराधा, ज्येष्ठा विशाखा,
रेवती, शतभिषा, पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ इन १३ नक्षत्रों का ग्रह भेद करते हैं ।
अश्विनी भरणी, मृगशिरा, आर्द्रा, अश्लेषा, पूर्वा फाल्गुनी , हस्त, स्वाती, मूल,
अभिजित्, श्रवण, धनिष्ठा, पूर्व भाद्रपद और उत्तर भाद्रपद इन १५ नक्षत्रों का भेद
ग्रह नहीं कर पाते हैं । भेद्य नक्षत्रों में पुनर्वसु का सभी ग्रह भेद करते हैं । पूर्वाषाढ़,
रेवती और कृत्तिका का कभी-कभी भेद होता है । अन्य नक्षत्रों का क्रान्ति के
अनुसार प्रायः भेद होता है ।
यस्यस्याद् वृष राशि शक्र (१४) लवगस्या वाक् शरोऽ शद्वयात् ।
सत्र्यंशा (२।२०) दधिकोभिनत्ति शकटं स्वायम्भुवंसग्रहः ।
अन्यर्क्षाकृतिभेद भाग कलना यन्त्रेण कार्याबुधैः
याम्यो दिग्गमनक्षं भेदज फलं ज्ञेयं श्रुतान्मैहिरात् । ८६ ।
वृष राशि के १४ अंश में जिस ग्रह की दक्षिण क्रान्ति २° २०' से अधिक हो
वही रोहिणी (शकट आकार) का भेद कर सकता है ।
अन्य नक्षत्रों का ग्रह द्वारा भेदन होने पर, ज्योतिर्तिविद् उनकी स्थिति यन्त्रवेध
द्वारा स्थिर करते हैं ।
नक्षत्रों के आकार तथा उनके उत्तर या दक्षिण ग्रहों की गति का फल
वाराहमिहरि की वृहत्संहिता में देखा जा सकता है ।
प्राक् सिद्धानां ज्योतिषां स्थानमित्थं प्रोक्तं व्यक्तं यानि भानीतराणि ।
खे लक्ष्यन्ते तत्तदाख्यापि संख्या विद्भिः ख्याति माप्ता न पूर्वैः । ८७ ।
प्राचीन काल से विख्यात कई स्थानों की स्थिति इस प्रकार कही गयी ।
इसके अतिरिक्त और कितने नक्षत्र हैं उनकी संख्या भी ज्ञात नहीं है । अश्विनी
आदि के अतिरिक्त अन्य नक्षत्रों के बारे में यहां नहीं कहा गया है ।
अपव्योम्निच्छाया पथ इतिह वैश्वानर पथो-
ऽभिजिन्मार्ग सूक्ष्मैर्घन तर भचक्रे र्निचलितः ।
प्रकाशात्सा वृत्ता कृति रनुमितो भ्रामति च य-
स्तदीयं संस्थानं कियदिह वदामि स्फुट तयां । ८८ ।
आकाश में अत्यन्त सूक्ष्म तारा गणों का सघन और वृत्ताकार मार्ग गतिशील