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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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भ ग्रह योग वर्णनम् २०१
वहां सदा उदित रहेगा (वहां उक्त नक्षत्र सदा दिखायी देगा) उस नक्षत्र की दक्षिण
स्फुट क्रान्ति लम्बांश से अधिक होने पर वह नक्षत्र उस स्थान पर सदा अस्त
रहेगा अर्थात् कभी दिखाई नहीं देगा ।
ग्रहाक्षान्तरजा लिप्ता ग्रह भुक्त्या विभाजिता ।
दिनादिभिः फलैर्योगो ग्रहे हीनेऽधिके ध्रुवात् । ८० ।
जिस ग्रह का किसी नक्षत्र के साथ योग जानना हो उस ग्रह का आयन दृक्
कर्म संस्कार कर उसका और नक्षत्र के ध्रुव का अन्तर निकालते हैं । ग्रह नक्षत्र
की अन्तर कला को ग्रह की स्फुट गति कला से भाग देकर लब्धि दिनादि होगी ।
ग्रह ध्रुव, (नक्षत्र) ध्रुव से कम होने पर उतने दिनों के बाद योग होगा, ध्रुव से
अधिक होने पर
एष्यो गतो वक्रगेतु गतैष्यत्व विपर्ययात् ।
असकृत् कर्मणा तुल्य कले स्यातां ग्रहो डुनी । ८१ ।
उतने समय (दिन आदि) पहले योग हो चुका है । ग्रह वक्री होने पर ग्रह
नक्षत्र योग का क्रम उल्टा होगा (ग्रह ध्रुव से कम रहने पर उतने समय पहले
योग हुआ, अधिक रहने पर बाद में योग होगा । योग समय का स्फुट ग्रह और
ध्रुव के अन्तर के पुनः अन्तर काल निकाल कर फिर योग काल निकालेंगे । बार
बार ऐसा करने से ग्रह और नक्षत्र की कला समान होती है ।
ग्रहस्यायन दृक् कर्म कृत्वाऽथ ग्रहतारयोः ।
कार्ये दिन निशा माने स्फुट क्रान्ति चर क्रमात् । ८२ ।
इसके बाद ग्रह और नक्षत्र की अपनी अपनी स्फुट क्रान्ति और चर निकाल
कर दिन और रात्रि मान का साधन होगा ।
उदयेऽस्त समये लग्न मस्त लग्नं प्रकल्प्य च ।
तत्समेऽर्के तदुदय मस्तं ज्ञात्वान्तरां शकैः । ८३ ।
इससे ग्रह और तारा दोनों का उदय के समय उदय लग्न तथा अस्त के समय
अस्त लग्न होगा । पहले कहे गये अक्षदृक् कर्म विधि से स्फुट रवि का अंश
उतना ही होने पर उदय और अस्त का समय होगा ।
कार्यात्समता प्राग् वद् याभ्य सौम्यान्तरन्तयोः ।
बिम्ब भेदश्च निर्णैतुं शक्यते ग्रह युद्धवत् । ८४ ।
इसके बाद नक्षत्र उदयास्त प्रकरण की विधि से उदय और अस्त स्फुट होगा ।
उसके बाद भी अन्तर रहने पर पहले की तरह कला समान करेंगे । इसके बाद
ग्रह योग बिधि से ग्रह और नक्षत्र का उत्तर दक्षिण अन्तर (ध्रुव प्रौतीय शरान्तर)
तथा बिम्ब अन्तर का निर्णय करेंगे ।