श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
भुवनं सर्वतोऽन्तर्बहिश्च वृत्वा | चाहिये । * वह भूमि अर्थात् संसार-
| को सर्वतः—बाहर और भीतरसे
व्याप्यात्यतिष्ठदतीत्य भुवनं सम- | व्याप्त करके संसारका भी अतिक्रमण
| करके स्थित है। दशाङ्गुल अर्थात्
धितिष्ठति। दशाङ्गुलमनन्तमपार- | अनन्त--अपार रूपसे । अथवा
मित्यर्थः। अथवा नाभेरुपार दशा- | नाभिसे ऊपर जो दश अङ्गुल
| परिमाणवाला हृदय है उसमें स्थित
ङ्गुलं हृदयं तत्राधितिष्ठति ॥१४॥ | है॥ १४ ॥
ननु सर्वात्मत्वे सप्रपञ्चं ब्रह्म | किन्तु सर्वात्मक होनेपर तो ब्रह्म
| सप्रपञ्च ( सविशेष ) सिद्ध होगा,
स्यात्तद्व्यतिरेकेणाभावादित्याह-- | क्योंकि उससे अतिरिक्त प्रपञ्चकी सत्ता
| ही नहीं है, इसपर श्रुति कहती है—
पुरुष एवेदग्ँ सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥१५॥
जो कुछ भूत और भविष्यत् है एवं जो अन्नके द्वारा वृद्धिको प्राप्त
होता है वह सब पुरुष ही है; तथा वही अमृतत्व ( मुक्ति ) का भी
प्रभु है ॥ १५ ॥
पुरुष एवेदमिति । पुरुष एवेदं | 'पुरुष एवेदम्' इत्यादि । यह
| जो अन्नसे बढ़ता है तथा यह जो
सर्वं यदन्नेनातिरोहति यदिदं | वर्तमान दिखायी देता है तथा जो
दृश्यते वर्तमानं यद्भूतं यच्च भव्यं | कुछ भूत और भविष्यत् है वह सब
| पुरुष ही है। इसके सिवा, वह
भविष्यत् । किञ्च—उतामृतत्व- | अमृतत्वका ईशान है अर्थात् अमरण-
- अर्थात् सहस्र यानी अनन्त अक्षि ( नेत्र ) और पाद ( चरण ) होनेके
कारण वह सहस्राक्ष और सहस्रपाद है।