श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
दोषं विद्याया वैदिकत्वं गुप्तत्वं | कर इसका उपदेश करनेमें दोष,
सम्प्रदायपरम्परया प्रतिपादितत्वं | विद्याका वैदिकत्व, गुह्यत्व और
| सम्प्रदायपरम्पराद्वारा प्रतिपादित होना
चाह— | श्रुति बतलाती है—
वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम् ।
नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः॥२२॥
उपनिषदोंमें परम गुह्य इस विद्याका पूर्वकल्पमें उपदेश किया गया
था । जिसका चित्त अत्यन्त शान्त (रागादिमलरहित) न हो उस पुरुष-
को तथा जो पुत्र या शिष्य न हो उसको इसे नहीं देना चाहिये ॥२२॥
वेदान्त इति । वेदान्त इति | 'वेदान्ते' इत्यादि । 'वेदान्ते'
जात्येकवचनम् । सकलासूप- | इसमें जातिमें एकवचन है, अर्थात्
निषत्स्विति यावत् । परमं परम- | सभी उपनिषदोंमें, परम-परम-
पुरुषार्थस्वरूपं गुह्यं गोप्यानामपि | पुरुषार्थरूप, गुह्य-गोपनीयोंमें भी सब-
गोप्यतमं पुराकल्पे प्रचोदितं | से अधिक गोप्य [ यह विद्या ]
पूर्वकल्पे चोदितमुपदिष्टमिति | पुराकल्प-पूर्वकल्पमें प्रचोदित हुई—
सम्प्रदायप्रदर्शनं कृतमित्येतत् । | उपदेश की गयी थी । इस प्रकार
प्रशान्ताय पुत्राय प्रकर्षेण शान्तं | इसका सम्प्रदायप्रदर्शन किया गया ।
सकलरागादिमलरहितं चित्तं यस्य | प्रशान्त पुत्रको अर्थात् जिसका चित्त
तस्मै पुत्राय तादृशशिष्याय वा | प्रकर्ष—विशेषरूपसे शान्त यानी
दातव्यं वक्तव्यमिति यावत् । | रागादि सम्पूर्ण मलोंसे रहित हो उस
तद्विपरीतायापुत्रायाशिष्याय वा | पुत्रको या ऐसे ही गुणोंवाले शिष्य-
स्नेहादिना ब्रह्मविद्या न वक्तव्या। | को इसे देना यानी उपदेश करना
| चाहिये । इससे विपरीत स्वभाव-
| वालेको तथा जो पुत्र या शिष्य न
| हो उसे केवल स्नेहादिके कारण
| ब्रह्मविद्याका उपदेश नहीं करना
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४९
अन्यथा प्रत्यवायापत्तिरिति पुनः- | चाहिये ।* नहीं तो प्रत्यवाय
शब्दार्थः । | (पाप) लगता है—यह ‘पुनः’
| शब्दका तात्पर्य है ।
अत एव ब्रह्मविद्याविवक्षुणा | इसलिये जो गुरु ब्रह्मविद्याका
गुरुणा चिरकालं परीक्ष्य शिष्य- | उपदेश करना चाहे उसे बहुत
गुणाञ्ज्ञात्वा ब्रह्मविद्या वक्तव्येति | समयतक परीक्षा करके शिष्यके
भावः । तथा च श्रुतिः—“भूय | गुणोंको जानकर इसका उपदेश
एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया | करना चाहिये—ऐसा इसका भाव
संवत्सरं संवत्स्यथ” (प्र० उ० | है। ऐसी ही यह श्रुति भी है—
१।२) इति । श्रुत्यन्तरे च— | “फिर एक सालतक तपस्या,
“एकशतं ह वै वर्षाणि प्रजापतौ | ब्रह्मचर्य और श्रद्धापूर्वक तुम यहाँ
मघवान्ब्रह्मचर्यमुवास” (छा० | वास करो।” तथा एक अन्य
उ० ८।११।३) इति च। | श्रुतिमें कहा है—“इन्द्रने प्रजापति-
एतच्च बहुधा प्रपञ्चितमुपदेश- | के यहाँ एक सौ एक वर्षतक ब्रह्मचर्य
साहस्रिकामित्यत्र संकोचः कृतः | व्रतका पालन करते हुए निवास
॥२२॥ | किया” इत्यादि । इस प्रसंगका
| उपदेशसाहस्रीमें अनेक प्रकारसे
| विस्तृत वर्णन किया है, इसलिये यहाँ
| संक्षेपसे कह दिया है ॥२२॥
परमेश्वर और गुरुमें श्रद्धा-भक्ति रखनेवाले शिष्यके प्रति किये गये
उपदेशकी सफलता
अत्रापि देवतागुरुभक्तिमता- | अब श्रुति यह दिखलाती है कि
| यहाँ भी देवता और गुरुकी भक्ति-
- शिष्य और पुत्रके प्रति ही ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेकी विधिका रहस्य
यही जान पड़ता है कि जिसे उपदेश किया जाय उसकी उपदेशकके प्रति पूर्ण श्रद्धा
होनी चाहिये और ऐसी श्रद्धा केवल पुत्र या शिष्यकी ही हो सकती है । इसलिये
वे ही इसके उपदेशके अधिकारी हैं।