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मिति यावत् । गुरूपदिष्ट- | प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य यह है कि
अखण्डज्ञानकी सिद्धिके लिये परमात्माकी प्रार्थना

ब्रह्मप्रमुखाणां देवानां स्वामि- | अब, ब्रह्मादि देवताओंके स्वामित्व,
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
१८८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
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१८८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
मिति यावत् । गुरूपदिष्ट- | प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य यह है कि
तत्त्वमादिवाक्यजन्यसुतत्त्वज्ञानेना- | गुरुके उपदेश किये हुए 'तत्त्वमसि' आदि वाक्योंसे उत्पन्न होनेवाले
विद्यातत्कार्यादिविश्वमायान्निवृत्त्या- | सम्यक्तत्त्वज्ञानसे अविद्या और उसके कार्यादिरूप सम्पूर्ण मायाके निवृत्त हो
त्यन्तं पुनरावृत्तिरहितं यथा | जानेसे वह आत्यन्तिकी-जिससे कि वह पुनरावृत्तिशून्य हो जाता है ऐसी
भवति तथैत्येकरसो भवती- | मुक्तिको प्राप्त हो जाता है; अर्थात् एकरस ( ब्रह्मस्वरूप ) हो जाता
त्येतत् ॥११॥ | है ॥ ११ ॥
अखण्डज्ञानकी सिद्धिके लिये परमात्माकी प्रार्थना
सूत्रात्मानं प्रत्यविरतमभि- | अब अखण्ड तत्त्वज्ञानकी सिद्धिके
मुखतया वीक्षन्तं परमेश्वरं प्रत्य- | लिये श्रुति सूत्रात्माके प्रति निरन्तर
खण्डिततत्त्वज्ञानसिद्धये प्रार्थना- | अभिमुख रहकर दृष्टिपात करनेवाले
माह- | परमात्माकी प्रार्थना करती है--
यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च
विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः ।
हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं
स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥१२॥
जो रुद्र देवताओंकी उत्पत्ति और ऐश्वर्यप्राप्तिका हेतु, जगत्का स्वामी
और सर्वज्ञ है तथा जिसने सबसे पहले हिरण्यगर्भको अपनेसे उत्पन्न देखा
था वह हमें शुद्ध बुद्धिसे संयुक्त करे ॥ १२ ॥
यो देवानामिति । पूर्वमेवास्य | 'यो देवानाम्' इत्यादि । इसका अर्थ पहले (अध्याय ३ मन्त्र ४ में)
प्रतिपादितोऽर्थः ॥१२॥ | ही कह दिया गया है ॥ १२ ॥
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अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८९
ब्रह्मप्रमुखाणां देवानां स्वामि- | अब, ब्रह्मादि देवताओंके स्वामित्व,
तामाकाशादिलोकाश्रयत्वं प्रमा- | आकाशादि लोकोंके आश्रयत्व,
त्रादीनां नियन्तृत्वं बुद्धिशुद्धि- | प्रमातादिके नियन्तृत्व और बुद्धिकी
द्वारा सम्यग्ज्ञानसिद्धयर्थं मुमु- | शुद्धिके द्वारा सम्यग्ज्ञानकी सिद्धिके
क्षुभिः प्रार्थ्यमानत्वं च परमेश्वर- | लिये मुमुक्षुओं द्वारा प्रार्थनीयत्व आदि
स्याह— | परमात्माके गुणोंका वर्णन करती है—
यो देवानामधियो यस्मिँल्लोका अधिश्रिताः । य
ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥१३॥
जो देवताओंका स्वामी है, जिसमें सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं और जो
इस द्विपद एवं चतुष्पद प्राणिवर्गका शासन करता है उस आनन्दस्वरूप
देवकी हम हविके द्वारा परिचर्या (पूजा) करें ॥१३॥
यो देवानामधिय इति । यः | ‘यो देवानामधियः' इत्यादि ।
प्रकृतः परमेश्वरो देवानां ब्रह्मा- | जिसका यहाँ प्रसंग है ऐसा जो
दीनामधिपः स्वामी यस्मिन् | परमेश्वर ब्रह्मादि देवताओंका अधि-
परमेश्वरे सर्वकारणे भूरादयो | पति—स्वामी है, सबके कारणभूत
लोका अधिश्रिता अध्युपरि श्रिता | जिस परमेश्वरमें भूर्लोकादि सम्पूर्ण
अध्यस्ता इति यावत् । यः प्रकृतः | लोक अधिश्रित—अधि—ऊपर श्रित
परमेश्वरोऽस्य द्विपदो मनुष्यादे- | अर्थात् अध्यस्त है तथा जो प्रकृत
श्चतुष्पदः पश्वादेश्चेश ईष्टे । तका- | परमेश्वर इस मनुष्यादि द्विपद् ( दो
रलोपश्चान्दसः । कस्मै काया- | पैरवाले ) और पशु आदि चतुष्पाद्
नन्दरूपाय । स्मैभावोऽपि च्छा- | जीवसमुदायका शासन करता है ।
न्दसः । देवाय द्योतनात्मने | ‘ईशे’ इस क्रियापदमें तकारका लोप
| वैदिक है। * उस क—आनन्दरूप—
| मूलमें [ ‘क’ शब्दकी चतुर्थकि एक
| वचनको] ‘स्मै’ आदेश वैदिक† है—
| देव यानी द्योतनात्मक (प्रकाशस्वरूप)
- वास्तवमें यह पद ईश्+ते=ईष्टे है ।
† क्योंकि सर्वनाम शब्दोंसे परे ‘ङे’ विभक्तिको ही ‘स्मै' आदेश होता है ।