श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
पृष्ठ 203, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 203ब्रह्मप्रमुखाणां देवानां स्वामि- | अब, ब्रह्मादि देवताओंके स्वामित्व,
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८९
ब्रह्मप्रमुखाणां देवानां स्वामि- | अब, ब्रह्मादि देवताओंके स्वामित्व,
तामाकाशादिलोकाश्रयत्वं प्रमा- | आकाशादि लोकोंके आश्रयत्व,
त्रादीनां नियन्तृत्वं बुद्धिशुद्धि- | प्रमातादिके नियन्तृत्व और बुद्धिकी
द्वारा सम्यग्ज्ञानसिद्धयर्थं मुमु- | शुद्धिके द्वारा सम्यग्ज्ञानकी सिद्धिके
क्षुभिः प्रार्थ्यमानत्वं च परमेश्वर- | लिये मुमुक्षुओं द्वारा प्रार्थनीयत्व आदि
स्याह— | परमात्माके गुणोंका वर्णन करती है—
यो देवानामधियो यस्मिँल्लोका अधिश्रिताः । य
ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥१३॥
जो देवताओंका स्वामी है, जिसमें सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं और जो
इस द्विपद एवं चतुष्पद प्राणिवर्गका शासन करता है उस आनन्दस्वरूप
देवकी हम हविके द्वारा परिचर्या (पूजा) करें ॥१३॥
यो देवानामधिय इति । यः | ‘यो देवानामधियः' इत्यादि ।
प्रकृतः परमेश्वरो देवानां ब्रह्मा- | जिसका यहाँ प्रसंग है ऐसा जो
दीनामधिपः स्वामी यस्मिन् | परमेश्वर ब्रह्मादि देवताओंका अधि-
परमेश्वरे सर्वकारणे भूरादयो | पति—स्वामी है, सबके कारणभूत
लोका अधिश्रिता अध्युपरि श्रिता | जिस परमेश्वरमें भूर्लोकादि सम्पूर्ण
अध्यस्ता इति यावत् । यः प्रकृतः | लोक अधिश्रित—अधि—ऊपर श्रित
परमेश्वरोऽस्य द्विपदो मनुष्यादे- | अर्थात् अध्यस्त है तथा जो प्रकृत
श्चतुष्पदः पश्वादेश्चेश ईष्टे । तका- | परमेश्वर इस मनुष्यादि द्विपद् ( दो
रलोपश्चान्दसः । कस्मै काया- | पैरवाले ) और पशु आदि चतुष्पाद्
नन्दरूपाय । स्मैभावोऽपि च्छा- | जीवसमुदायका शासन करता है ।
न्दसः । देवाय द्योतनात्मने | ‘ईशे’ इस क्रियापदमें तकारका लोप
| वैदिक है। * उस क—आनन्दरूप—
| मूलमें [ ‘क’ शब्दकी चतुर्थकि एक
| वचनको] ‘स्मै’ आदेश वैदिक† है—
| देव यानी द्योतनात्मक (प्रकाशस्वरूप)
- वास्तवमें यह पद ईश्+ते=ईष्टे है ।
† क्योंकि सर्वनाम शब्दोंसे परे ‘ङे’ विभक्तिको ही ‘स्मै' आदेश होता है ।