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शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

( २० )
हे त्रिपुरान्तक ! श्री विष्णुजी सहस्रकमल लेकर आपके
चरणों का पूजन करते समय एक कमल कम रहा देखकर दृढ़
भक्ति से उन्होंने अपना नेत्र निकाल कमल की जगह देकर पूजन
पूर्ण कर दिया । श्रीविष्णुजी की यह दृढ़ भक्ति सुदर्शन चक्र का
रूप होकर तीनों लोकों में रक्षा कर रही है । १६॥
क्रतौ सुप्ते जाग्रत्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते ।
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढ़परिकरः कर्मसु जनः॥२०॥
सौंवैं जग्य दान, तउ आप जजमानन कों
नित फल देन काज जागत रहत है
साधन कहाँ है छोड़ पुरुष आराधन कों
बीते कर्महू को फल जाते प्रगटत है ।
देखत सबैई फल दीबे हेतु जग्यन में
स्वामी समरथ आप जामिन बनत हैं ।
यातें धरि आस बिश्वास बेदबादन पै
कर्म करिवे में लोग चाव सौं लगत हैं ॥२०॥
हे भगवन ! आप ही को यज्ञ फल देने वाला जानकर और
देवताओं में दृढ़ विश्वास कर मनुष्य कटिबद्ध होकर कर्मों को
करते हैं, क्योकि जब कार्य समाप्त होता है तो आप ही विद्यमान
रहते हो, यदि कहो कि नष्ट कर्म ही फल देता है तो निश्चय है

( २१ )
कि चैतन्य पुरुष की उपासना के बिना नष्ट कर्म भी फल देने
वाले नहीं होते । अर्थात कर्ममात्र के फलदाता आप ही हो ॥२०॥
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता-
मृषीणामात्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः ।
क्रतुभ्रन्तस्त्वत्तः क्रतुफलविधानव्यसनिनो
ध्रु ॰ वक्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥२१॥
जजमान दच्छ हैं क्रिया में अति दच्छ जहां
अखिल अधीस जिन्हें जानें प्रजाजन हैं
एही सरनागत को] पालन करनहार
ऋषिवृन्द ऋत्विज, सदस्य सुरगन हैं
हाथ सों तिहारे नाथ जग्य कौ बिनास तहां
जाहि जग्य फल के विधान को व्यसन हैं
साँचि यह बात होति हानि जजमान ही की
जानि को करत बिन श्रद्धा को जतन है ॥२१॥
हे शरणागतरक्षक ! यज्ञ की क्रिया में कुशल दक्ष प्रजापति
जैसा यज्ञकर्ता यजमान और जिसके सभासद ब्रह्मादि देवताओं
का समूह और त्रिकालदर्शी ऋषि जिसमें यज्ञ कराने वाले थे ।
इतने पर भी यज्ञ बिगड़ जाय तो आश्चर्य है, सो हे भगवन् !
आपकी अश्रद्धा से ही यज्ञ का नाश हुआ । क्योंकि यज्ञ के फल-
दाता आप ही हैं । आपकी श्रद्धा से जो किया जाय वह सब
सफल हो होगा ॥२१॥

( २२ )
प्रजानाथं नाथ ! प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥२२॥
बस में अनंग के ह्वै निज तनुजा के संग
धायो विधि करन प्रसंग वरजोरी सौं
ताहीं धरी लाज सौं गरीं सो हरिनी ह्वै भगी
ह्वै कै प्रजानाथहू हरिन चल्यौ चोरी सौं
देखि यह पाप आप चाप कौं चढ़ायो, छूटि
बेध्यौ मृग ब्याध ज्यौं सपंष सर, डोरी सौं
नाकहूँ गए पे डारि ना कहूँ तजै है अबौं
बान सो पिनाकपानि जू कौ खरौ खोरी सौं ॥२२॥
यहाँ उषा और सूर्यदेव के प्रातःकालिक संयोग का रुचिर
रूप के द्वारा वर्णन किया गया है।
हे नाथ ! जिस समय ब्रह्मा काम के वश हो रमण की इच्छा
से अपनी पुत्री के पीछे दौड़े तब वह कन्या पाप के डर से मृगी
बनकर भाग चली। उस समय ब्रह्मा ने भी मृग का रूप धारण
कर उसका पीछा किया। उस समय आपने ऐसी अनीति देख-
कर मृग पर धनुष हाथ में लेकर शिकार का उत्साह किया तो
वह ब्रह्मा स्वर्ग तक भागे परन्तु आपके धनुष ने उनका पीछा
नहीं छोड़ा। आपका धनुष बाण अन्यायियों का पीछा कभी
नहीं छोड़ता है ॥२२॥

( २३ )
स्वलावण्याशंसाधृतधनुषमन्हाय तृणवत
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरतदेहार्धघटना
दवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः ॥२३॥
अपनी लुनाई के भरोसे गिरिजा न लख्यौ
चाप गहें दाप सौं कुसुम धनु वारौ है
संजम विरत सुरभंजन ! भया सौ तहाँ
सामुहैं तिनूका सो तुरत जरि छारौ है
ताहू पे तिहारे तन आधे मैं निवास पाय
दास तिय कौ जो तुम्हें करति बिचारो है
चारों कहा, वरद ! बिचारौ एती गूढ़ बात
मूढ़ जुवतीन की जमात निरधारौ है ॥२३॥
हे भगवन ! आपने धनुषधारी कामदेव को शीघ्र ही भस्म
किया, उसका आधा शरीर पैदा कर अपने शरीर में धारण
किया। यह लीला देखकर निज स्वरूपाभिमानी पार्वती जी
आपको स्त्री पर आसक्त समझती हैं, क्योंकि कामदेव को भस्म
किया और फिर उत्पन्न कर अपने शरीर में धारण किया।
परन्तु हे भगवन ! आपमें यह दोष लगाना यथार्थ में सत्य नहीं,
क्योंकि युवती स्त्री अर्धांगिनी होती है, उनके कहने में क्या
लगता है ॥२३॥

( २४ )
श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर ! पिशाचाः सहचरा
श्चिताभस्माऽऽलेपः स्रगपिनृकरोटी परिकरः ।
अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं ।
तथाऽपि स्मर्तॄणां वरद ! परमं मंगलमसि ॥२४॥
भेष अड़बंग लै अनंग अंगहारी आप
नाचत मसान मैं पिसाच सहचारी हैं
भासत चिता कौ लाग्यौ भसम निराला तन
माला निरमुण्डन के झुण्ड की भारी है
मिलित अमंगल सौं सील यौं लखायौ करै
भायौ करै विपरीत रीति त्यों तिहारी है
तोहू जे तिहारे पद सुमिरन हारे तिन्हें
बरद ! सहारे आप अति सुभकारी हैं ॥२४॥
हे मदन-दहन ! जिनके देखने या सुनने से ग्लानि तथा भय
होता है । जैसा कि श्मशान तो खेलने का स्थान, खिलाड़ी भूत-
पिशाच आदि, आभूषण चिता का भस्म शरीर में लगा हुआ,
मनुष्य खोपड़ियों की माला पहने हुए ये सब अमंगल पदार्थ हैं
तो भी हे वरद शिव ! स्मरण करने वाले को आप सर्वदा मंगल
ही करते हो ॥२४॥
मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमपधायाऽऽत्तमरुतः
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमदसलिलोत्संगितदृशः ।

( २५ )
यदालोक्याऽऽह्लादं ह्रद इव निमज्ज्यामृतमये
दधत्यन्तस्तत्वं किमपि यमिनस्तत्किल भवान् ॥२५॥
अन्तरमुखी कै मन, थापि चित्त चेतना में
सब विधि ही सौं प्राणायाम में निरत हैं
जोगी अवदात जाहि देखि पुलकित गात
आनन्द सलिल स्रोत बैन ते झरत हैं
जाको ध्याइह भरत उमंग भूरि मानस में
सर में सुधा के मनो मजन करत हैं
आप ही सों अकथ अनूप रूप वस्तु, जाहि
अन्तर में संजमी निरन्तर धरत हैं ॥२५॥
हे भगवन ! योगीजन प्राणायाम कर और आत्मा को हृदय
के बीच में ठहरा कर जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता ऐसे
तत्व को देखकर आनन्द प्राप्त करते हैं । जिससे उनके रोयें
खड़े हो जाते और नेत्र तृप्त हो जाते हैं, मानो अमृतमय तालाब
में स्नान कर रहे हैं। वह अनिर्वचनीय तत्व आप ही का
स्वरूप है ॥२५॥
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवह-
स्त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च ।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं
न विद्मस्तत्तत्वं वयमिह तु यत्वं न भवसि ॥२६॥

( २६ )
आप ही प्रभाकर, त्यौं आकर कला के आप
आप ही अनिल, तैसे आप ही अनल हैं
आसमान है कै आप ही तौ भासमान होत
आतमाहू आप आप भूमि और जल हैं
या बिधि असीमहू कौ सीमित बतायौ करें
मनुज प्रवीन पीन मति के सकल में
हम तौ न जानें, या अखिल जड़ चेतन में
ऐसो कौन तत्व जो न आप अविकल हैं ॥२६॥
हे शंकर ! सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी
और आत्मा आदि पदार्थ स्वरूप आप ही हैं। आपको जानने
वाले आपके विषय में बहुत ही वर्णन कर सकते हैं। आगे उनकी
बुद्धि चल नहीं सकती। अर्थात ऐसा कोई पदार्थ हम नहीं देखते
जिसमें आप व्यापक न हों ॥२६॥
त्रयीं तिस्रो वृत्तिस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा-
नकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत्तीर्णविकृतिः ।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद ! गुणात्योमिति पदम् ॥२७॥
तीनहू अवस्था, तीन वेद की विवस्था कहै
तीन भुवन, तीन देवन लखावै है
बरन अकार सौं उकार सौं मकारहू सौं
रावरेई रूप के प्रकार बतरावैं हैं

( २७ )
तिन ते परे जो हीनविकृत तुरीय धाम
ताकौ अर्धमात्र सूक्ष्म ध्वनि सौं जतावै है
एक है कै एक, त्यों अनेक हैं अनेक रूप
सरनद ! आप कौं प्रनवपद गावे है ॥२७॥
हे शरण देने वाले ! आप सब में व्यापक होकर अर्थात
ओंकार से ऋग्, यजु, साम तीनों वेद जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति
तीनों अवस्था स्वर्ग, मृत्यु और पाताल तीनों लोक—ब्रह्मा,
विष्णु, रुद्र तीनों देवता इनको धारण करते हुए आपका चौथा
पवित्र धाम है, जिनको तुरीय कहते हैं, उस चैतन्य स्वरूप को भी
स्मरण करता हुआ हे भगवन ! समस्त रूप में व्यस्त ऐसे आपकी
स्तुति किया करता हूँ ॥२७॥
भवः शर्वा रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सह महां-
स्तथा भीमेशानाविति तदाभिधानाष्टकमिदम् ।
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव ! श्रुतिरपि
प्रियायास्मैधामने प्रणिहितनमस्योऽस्मिभवते॥२८॥
भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, महादेव उग्र
भीम औ ईसान—ये जो आठ दिव्य नाम हैं
एहो देव ! वेद इन में ते एक एकहू कौं
बोलिबे के हेतु बरनत आठों जाम हैं
प्रानहू ते प्यारे मेरे परम अधार आप
आप कौ सरूप दिव्य ललित ललाम हैं
याते हम भक्ति अनुरक्ति भरे अन्तर में
आप को निरन्तर ही करत प्रनाम हैं ॥२८॥

( २८ )
हे देवाधिदेव ! १. भव (उत्पत्तिकर्ता) २. शर्व (सर्वरूप
शुभ कर्ता) ३. रुद्र (रोदन कर्ता) ४. पशुपति (जीवों का पालक)
५. उग्र (क्रोधी) ६. महादेव सब में महान विशिष्ट, ७. भीम
(भयंकर) ८. ईशान (विशिष्ट, ऐश्वर्यवान) के लिए सभी
नमस्कार करते हैं ॥२८॥
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो ।
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर ! महिष्ठाय च नमः
निमोवर्षष्ठाय त्रिनयन ! यविष्ठाय च नमो
नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नमः॥२९॥
एहो बन वीथिन में बिहरन बारे ! अति
निकट हमारे भगवान कौ प्रनाम है
अति दूरबारे कौं प्रनाम मदनारे ! त्योंही
लघुतर परम महान कौं प्रनाम है
तीन नैनवारे प्रभो ! अतिवय बूढ़हू कौं
नव वय रूढ़ त्यों जबान को प्रनाम है
सब मैं तुम्हीं हौ, सब रूप में तुम्ही हौ देव
'यह', 'वह' सकल जहान को प्रनाम है ॥२९॥
हे कामदेवनाशक ! आप समीप रहने वाले हो और दूर
रहने वाले भी हो, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और बड़े-से-बड़े रूप को धारण
करते हो, सब रीति से शिव आपको नमस्कार है ॥२९॥

( २६ )
बहलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः
जनसुखकृते सत्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥३०॥
बिस्व बिरचैवे कौ रजोगुन अधिक जाको
भव के प्रभाव भव रूप को नमन है,
तम के बढ़े पै जान समय संहारहू को
हर है हरत, हर रूप कौं नमन है ।
शुद्ध सत्व वृद्धि की सुजोग पाय लोगन कौं
सुख दैनवारे मृडरूप कौं नमन है,
त्रिगुन रहित हित परम प्रकासमय
पद में लसित शिव रूप कौं नमन है ॥३०॥
संसार की उत्पत्ति के समय आपने रजोगुण सहित जो भव
रूप धारण किया, और सृष्टि के पालन करने को सत्व गुण
सहित सत्यरूप और प्रलय करने के समय तमोगुण सहित हर
रूप धारण किया; मोक्ष के समय तीनों गुणों से रहित अर्थात
निर्गुण शिव शान्त रूप धारण किया। हे भगवन ! आपके स्वयं
प्रकाश अनेक शिव स्वरूपों को नमस्कार है ॥३०॥

  • कृशहरिणति चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
    क्व च तव गुणसीमोल्लङ्घिनो शश्वदृद्धि ।

( ३० )
इति चकितमन्दीकृत्य मां भक्तिराधा-
द्वरद ! चरणयोस्ते वाक्यपुष्पोपहारम् ॥३१॥
मेरो यह चित्त कहाँ चेरौ सै कलेसन कौ
सुध बुध कलप अलप अति पायौ है,
सीमा हीन रावरी सनातन समृद्धि कहाँ
लाँघि गुन सीमा के परेई दरसायौ, है
याते लखि चकित चकित मोहि भक्ति तव
बरद बलात गुन गान में लगायौ है
रुचि अनुसार यह बचन सुमन हार
रावरे चरन उपहार लै चढ़ायौ है ॥३१॥
हे वर देने वाले ! आपकी महिमा का तो अन्त नहीं है
और मेरा चित्त रागद्वेष और क्लेश आदि के वश होकर परिणाम
में दुर्बल है । इसी प्रकार जब मैं गुणों के वर्णन से भयभीत हुआ
तब मेरी भक्ति ने उत्साह देकर वाणीरूपी फूल की माला
आपके चरणारविन्दों को पहना दी अर्थात मेरी सामर्थ्य कहाँ
जो आपके गुणों का वर्णन करूँ, यह मेरी भक्ति ने थोड़ा सा
वर्णन कराया है ॥३१॥
असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिंधुपात्रे
सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं ! न याति ॥३२॥•
• ये ३२ श्लोक शिवजी की महिमा के हैं । इसके आगे के
स्तोत्रों में अन्त तक फल और आपके नामों की विशेषता लिखी है ।

( ३१ )
कारे गिरिराज तुल्य काजर कौं घोरि घोरि............
स्याही करि राखै, महासिंधु मसिदानी है,
भाषा लिखिबे को साखा सुरतरु लेखनी है
कागद की करी त्योंही पूरी वसुधानी है
लै कै सब साधन अराथन में लीन सदा
लिखित महेस गुन गन की कहानी है
हारैथकि साथ, गुन गाथ कौं तिहारे नाथ
तदपि न पावै पार सारदा सयानी है ॥३२॥
हे भगवन ! यदि सरस्वती नील-पर्वत के बराबर काजल
स्याही समुद्ररूपी पात्र में डालकर कल्पवृक्ष रूपी लेखनी से
आपके गुणों को लिखे तो भी पार नहीं पा सकती क्योंकि आपके
अनन्त गुण हैं और हमारो तो सामर्थ्य ही क्या है जो आपके
गुणों का वर्णन कर सकें ॥३२॥
असुरसुरमुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दुमौले-
र्ग्रथितगुणमहिम्नो निगुर्णस्येश्वरस्य ।
सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो
रुचिरमलघुवृत्तैऽ स्तोत्रमेतच्चकार ॥३३॥
पूजत जिनहि सुर असुर मुनींद्र बृन्द
भाल जिनकेई बाल इन्दु छबि पायौ है
गुन ते रहित हित रूप वे महेश जिन,
गुन महिमा कौं इते बरनि सुनायौ है

( ३२ )
खास उनकेई दस गन में महान एक
नामवन्त है जो पुष्पदन्त कहलायो है
वानेई अलघु मृदु छन्द बन्द बारो यह
वन्दन के काज अभिनन्दन बनायो है ॥३३॥
सकल गुणों में श्रेष्ठ पुष्पदंताचार्य ने यह सुन्दर स्तोत्र
देवताओं, राक्षसों और मुनियों से पूजित और चन्द्रमा जिस के
मस्तक पर शोभायमान है। प्रसिद्ध जिनके गुण हैं। ऐसे निर्गुण
श्री शिव जी की महिमा मनोहर विस्तृत छन्दों में की है ॥३३॥
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः ।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र
प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च ॥३४॥
मानस में भारि भूरि भक्ति अनुरक्ति भरे
नित्त जो मनुज शुद्धचित्त है रहत है
स्तवन बिसेस या महेस महिमा को मन्जु
रोज रोज बदन सरोज सौ कहत है
तजि सो असिव लोक सजि सिवलोक जाय
सिव भगवान की समानता गहत है
त्यौंही इतै सम्पदा अनन्त आयु दीर्घ लै
सुतहू कीरति औ सुकीरति लहत है ॥३४॥

( ३३ )
जो मनुष्य श्री शिवजी के इस सुन्दर स्तोत्र को प्रति दिन
शुद्ध चित्त से पढ़ेगा वह शिवलोक में इन्द्र के समान गिना
जायेगा और इस संसार में धन, आयु, सन्तान और अच्छी
कीर्ति पावेगा ॥३४॥
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः ।
अघोरान्नापरो मंत्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥३५॥
देव न दूजो महेश्वर के सिवा
है जो कहीं तौ समत्व न कोई,
त्यों ही समीप महिम्न के हैं स्तुति
और जो राखै महत्व न कोई
मन्त्र अघोर ते और बड़ी नहीं
और कौ इते सत्व न कोई
श्रीगुरु ही त्यों महान जहान में;
है गुरु सों बड़ौ तत्व न कोई ॥३५॥
सम्पूर्ण देवताओं में शिवजी के बराबर कोई दूसरा देवता
नहीं है । शिव की स्तुति करने के बाद किसी दूसरे देवता की
स्तुति की आवश्यकता नहीं । अघोर मन्त्र से बड़ा कोई दूसरा
मन्त्र नहीं है । शिवजी के समान इस पृथ्वी पर और कोई बड़ा
तत्व गुरु से बढ़कर नहीं है ॥३५॥

स्तोत्र फलश्रुति, शिव नामावली एवं आरती ताण्डव

( ३४ )
दीक्षा दानं तपस्तीर्थ ज्ञानं योगादिकाः क्रियाः ।
महिम्नस्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥३६॥
दीक्षा, दान, सुतीर्थ; तप
अग्य आदि कृति ग्यान ।
होत न महिम्न पाठ की
षोडश कला समान ॥३६॥
दीक्षा, दान, तप, तीर्थ करना, ज्ञान और यज्ञादिक कर्म
महिम्न स्तोत्र के पाठ के फल के सोलहवें भाग के भी बराबर
फल नहीं देते ॥३६॥
कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः
शशिधर वर मोलेर्देवदेवस्य दासः ।
स खलु निज महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद्दिव्यदिव्यं महिम्नः ॥३७॥
जिनके भाल बिसाल बल विधु शोभा पावत
जो देवन के देव, देव जिन्हें सीस नवावत,
तिन कोई इक दास पास रहि विजन डुलावत
पुष्पदन्त गन्धर्वराज जग बीच कहावत ।
निज प्रभु के ही कोप ते निज महिमा सों जो गिरयौ
वाने स्तवन महिम्न कौ दिव्य दिव्यतर यह करयौ ॥३७॥

( ३५ )
ये पुष्प दंताचार्य जो पहली योनि में कुसुमदर्शन नामक
गन्धर्व थे, ये किसी समय एकान्त में शिवजी और पार्वती जी
की आनन्द की बातें छिपकर सुनने लगे तो शिवजी ने देखते ही
यह शाप दिया कि—"जाओ तुम गन्धर्व पदवी से पतित होकर
मनुष्य लोक में जन्म लो।" तब उन्होंने यहाँ जन्म लेकर परम
दिव्य इस महिम्न स्तोत्र से शिवजी को अत्यन्त प्रसन्न कर मनो-
वांछित फल प्राप्त किया ॥३७॥
सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नन्यचेताः ।
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥३८॥
सुर नर मुनि सब पढ़ें, करें याकौ आराधन,
स्वर्ग और अपवर्गहु को यह एकै साधन ।
पुष्पदन्त कौ रचिन स्तोत्र अनुपम गुनवारौ,
आराधन कौ यह अचूक फल साधनहारौ ।
जोरि जुगल कर पढ़त नर यदि इकचित नित प्रात है,
किन्नर गन सौं गुन सुनत सिव समीप वह जात है ॥३८॥
पुष्पदंताचार्य का बनाया जो यह सुन्दर महिम्न स्तोत्र है;
वह देवता और मुनियों से पूजित और स्वर्ग तथा मोक्ष को

( ३६ )
प्राप्त कराने वाला है। ऐसे स्तोत्र को जो मनुष्य एकचित्त
होकर हाथ जोड़कर पढ़ता है, वह शिवजी के समीप जाता है
और उसकी स्तुति किन्नर आदि करते हैं ॥३८॥
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुष्पगन्धर्वभाषितम्
अनौपम्य मनोहारि पुण्यमीश्वरवर्णनम् ॥३९॥
स्तवन रचित गन्धर्व कौ परिपूरन यह जान ।
सिब वरनन मय मनहरन अनुपमसुचि कल्यान ॥३९॥
गन्धर्व अर्थात पुष्पदंताचार्य का कहा हुआ पुण्यकारी यह
महिम्न स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ, इसके बराबर कोई दूसरा स्तोत्र
नहीं है, इसमें शंकर का ही वर्णन है ॥३९॥
इत्येषा वांगमयी पूजा श्रीमच्छंकरपादयोः ।
अर्पिता तेन मे देवः प्रीयतां च सदाशिवः ॥४०॥
बचन रचनमय अर्चना यह अरपित सिव पाद ।
सदा सदाशिव देवबर सोपर करें प्रसाद ॥४०॥
यह स्तोत्ररूपी पूजा श्रीमहादेवजी के चरणकमल पर मैं
(पुष्पदन्ताचायें) ने चढ़ाई। इस स्तोत्र से श्रीसाम्बसदा शिव
शंकर मुझ पर प्रसन्न होवें ॥४०॥

( ३७ )
तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर ।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ॥४१॥
तत्व न जानौं ईस तब, कस तुम महिमा धाम ।
महादेव जाविध जहाँ ताविध तुम्हें प्रनाम ॥४१॥
हे महेश्वर ! हम आपका तत्व नहीं जानते, तुम्हारी महिमा
भी नहीं जानी जा सकती । आप जैसे भी हैं जहाँ भी हैं मैं
आपको प्रणाम करता हूँ ॥४१॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेत् सदा ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकं स गच्छति ॥४२॥
एक, दोय, तीनों समय पढ़त जो नर अभिराम ।
सब पापन ते मुक्त सो बसत, सदा सिवधाम ॥४२॥
जो मनुष्य इस महिम्नस्तोत्र को एक बार, दो बार या
तीन बार नित्य पढ़ेगा, वह संसार के पापों से छूटकर शिवलोक
को प्राप्त होगा ॥४२॥
श्री पुष्पदन्तमुखपंकज निर्गतेन
स्तोत्रेण किल्विषहरेण हरप्रियेण ।

( ३८ )
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन,
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥४३॥
पुष्पदन्त मुख कंज ते प्रगटयौ स्तोत्र उदार,
रासि रासि अघ हरत है, हर कौ परम पियार ।
कंठ किएं याकें पढ़ें, करिबे ते नित ध्यान,
होत प्रसन्न महेस वर भूतनाथ भगवान ॥४३॥
श्रीपुष्पदन्ताचार्य के मुख से कहा हुआ जो यह शिव प्रिय
पापनाशक महिम्नस्तोत्र है, चित्त लगाकर इसको याद कर पाठ
करने से भूतपति श्री महादेव जी अत्यन्त प्रसन्न होते हैं ॥४३॥
॥ शिवमहिम्नः स्तोत्र सम्पूर्ण ॥

शिवताण्डवस्तोत्रम्
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥१॥
सघन जटामण्डल रूपवन से प्रभावित होकर श्रीगंगाजी की
धारायें जिन शिवजी के पवित्र कण्ठ प्रदेश को प्रक्षालित करती
(धोती) हैं, और जिनके गले में लम्बे-लम्बे बड़े-बड़े सर्पों की
मालायें लटक रही हैं, तथा जो शिवजी डमरू को डम डम डम
बजाकर प्रचण्ड ताण्डव नृत्य करते हैं, वे शिव जी हमारा
कल्याण करें ॥१॥
जटाकटाहसम्भ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
( ३६ )