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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( २५ )
यदालोक्याऽऽह्लादं ह्रद इव निमज्ज्यामृतमये
दधत्यन्तस्तत्वं किमपि यमिनस्तत्किल भवान् ॥२५॥
अन्तरमुखी कै मन, थापि चित्त चेतना में
सब विधि ही सौं प्राणायाम में निरत हैं
जोगी अवदात जाहि देखि पुलकित गात
आनन्द सलिल स्रोत बैन ते झरत हैं
जाको ध्याइह भरत उमंग भूरि मानस में
सर में सुधा के मनो मजन करत हैं
आप ही सों अकथ अनूप रूप वस्तु, जाहि
अन्तर में संजमी निरन्तर धरत हैं ॥२५॥
हे भगवन ! योगीजन प्राणायाम कर और आत्मा को हृदय
के बीच में ठहरा कर जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता ऐसे
तत्व को देखकर आनन्द प्राप्त करते हैं । जिससे उनके रोयें
खड़े हो जाते और नेत्र तृप्त हो जाते हैं, मानो अमृतमय तालाब
में स्नान कर रहे हैं। वह अनिर्वचनीय तत्व आप ही का
स्वरूप है ॥२५॥
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवह-
स्त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च ।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं
न विद्मस्तत्तत्वं वयमिह तु यत्वं न भवसि ॥२६॥