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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 25

( २३ )
स्वलावण्याशंसाधृतधनुषमन्हाय तृणवत
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरतदेहार्धघटना
दवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः ॥२३॥
अपनी लुनाई के भरोसे गिरिजा न लख्यौ
चाप गहें दाप सौं कुसुम धनु वारौ है
संजम विरत सुरभंजन ! भया सौ तहाँ
सामुहैं तिनूका सो तुरत जरि छारौ है
ताहू पे तिहारे तन आधे मैं निवास पाय
दास तिय कौ जो तुम्हें करति बिचारो है
चारों कहा, वरद ! बिचारौ एती गूढ़ बात
मूढ़ जुवतीन की जमात निरधारौ है ॥२३॥
हे भगवन ! आपने धनुषधारी कामदेव को शीघ्र ही भस्म
किया, उसका आधा शरीर पैदा कर अपने शरीर में धारण
किया। यह लीला देखकर निज स्वरूपाभिमानी पार्वती जी
आपको स्त्री पर आसक्त समझती हैं, क्योंकि कामदेव को भस्म
किया और फिर उत्पन्न कर अपने शरीर में धारण किया।
परन्तु हे भगवन ! आपमें यह दोष लगाना यथार्थ में सत्य नहीं,
क्योंकि युवती स्त्री अर्धांगिनी होती है, उनके कहने में क्या
लगता है ॥२३॥