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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

( २४ )
श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर ! पिशाचाः सहचरा
श्चिताभस्माऽऽलेपः स्रगपिनृकरोटी परिकरः ।
अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं ।
तथाऽपि स्मर्तॄणां वरद ! परमं मंगलमसि ॥२४॥
भेष अड़बंग लै अनंग अंगहारी आप
नाचत मसान मैं पिसाच सहचारी हैं
भासत चिता कौ लाग्यौ भसम निराला तन
माला निरमुण्डन के झुण्ड की भारी है
मिलित अमंगल सौं सील यौं लखायौ करै
भायौ करै विपरीत रीति त्यों तिहारी है
तोहू जे तिहारे पद सुमिरन हारे तिन्हें
बरद ! सहारे आप अति सुभकारी हैं ॥२४॥
हे मदन-दहन ! जिनके देखने या सुनने से ग्लानि तथा भय
होता है । जैसा कि श्मशान तो खेलने का स्थान, खिलाड़ी भूत-
पिशाच आदि, आभूषण चिता का भस्म शरीर में लगा हुआ,
मनुष्य खोपड़ियों की माला पहने हुए ये सब अमंगल पदार्थ हैं
तो भी हे वरद शिव ! स्मरण करने वाले को आप सर्वदा मंगल
ही करते हो ॥२४॥
मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमपधायाऽऽत्तमरुतः
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमदसलिलोत्संगितदृशः ।