शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २२ )
प्रजानाथं नाथ ! प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥२२॥
बस में अनंग के ह्वै निज तनुजा के संग
धायो विधि करन प्रसंग वरजोरी सौं
ताहीं धरी लाज सौं गरीं सो हरिनी ह्वै भगी
ह्वै कै प्रजानाथहू हरिन चल्यौ चोरी सौं
देखि यह पाप आप चाप कौं चढ़ायो, छूटि
बेध्यौ मृग ब्याध ज्यौं सपंष सर, डोरी सौं
नाकहूँ गए पे डारि ना कहूँ तजै है अबौं
बान सो पिनाकपानि जू कौ खरौ खोरी सौं ॥२२॥
यहाँ उषा और सूर्यदेव के प्रातःकालिक संयोग का रुचिर
रूप के द्वारा वर्णन किया गया है।
हे नाथ ! जिस समय ब्रह्मा काम के वश हो रमण की इच्छा
से अपनी पुत्री के पीछे दौड़े तब वह कन्या पाप के डर से मृगी
बनकर भाग चली। उस समय ब्रह्मा ने भी मृग का रूप धारण
कर उसका पीछा किया। उस समय आपने ऐसी अनीति देख-
कर मृग पर धनुष हाथ में लेकर शिकार का उत्साह किया तो
वह ब्रह्मा स्वर्ग तक भागे परन्तु आपके धनुष ने उनका पीछा
नहीं छोड़ा। आपका धनुष बाण अन्यायियों का पीछा कभी
नहीं छोड़ता है ॥२२॥