शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६ )
आप ही प्रभाकर, त्यौं आकर कला के आप
आप ही अनिल, तैसे आप ही अनल हैं
आसमान है कै आप ही तौ भासमान होत
आतमाहू आप आप भूमि और जल हैं
या बिधि असीमहू कौ सीमित बतायौ करें
मनुज प्रवीन पीन मति के सकल में
हम तौ न जानें, या अखिल जड़ चेतन में
ऐसो कौन तत्व जो न आप अविकल हैं ॥२६॥
हे शंकर ! सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी
और आत्मा आदि पदार्थ स्वरूप आप ही हैं। आपको जानने
वाले आपके विषय में बहुत ही वर्णन कर सकते हैं। आगे उनकी
बुद्धि चल नहीं सकती। अर्थात ऐसा कोई पदार्थ हम नहीं देखते
जिसमें आप व्यापक न हों ॥२६॥
त्रयीं तिस्रो वृत्तिस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा-
नकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत्तीर्णविकृतिः ।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद ! गुणात्योमिति पदम् ॥२७॥
तीनहू अवस्था, तीन वेद की विवस्था कहै
तीन भुवन, तीन देवन लखावै है
बरन अकार सौं उकार सौं मकारहू सौं
रावरेई रूप के प्रकार बतरावैं हैं