शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
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हे त्रिपुरान्तक ! श्री विष्णुजी सहस्रकमल लेकर आपके
चरणों का पूजन करते समय एक कमल कम रहा देखकर दृढ़
भक्ति से उन्होंने अपना नेत्र निकाल कमल की जगह देकर पूजन
पूर्ण कर दिया । श्रीविष्णुजी की यह दृढ़ भक्ति सुदर्शन चक्र का
रूप होकर तीनों लोकों में रक्षा कर रही है । १६॥
क्रतौ सुप्ते जाग्रत्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते ।
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढ़परिकरः कर्मसु जनः॥२०॥
सौंवैं जग्य दान, तउ आप जजमानन कों
नित फल देन काज जागत रहत है
साधन कहाँ है छोड़ पुरुष आराधन कों
बीते कर्महू को फल जाते प्रगटत है ।
देखत सबैई फल दीबे हेतु जग्यन में
स्वामी समरथ आप जामिन बनत हैं ।
यातें धरि आस बिश्वास बेदबादन पै
कर्म करिवे में लोग चाव सौं लगत हैं ॥२०॥
हे भगवन ! आप ही को यज्ञ फल देने वाला जानकर और
देवताओं में दृढ़ विश्वास कर मनुष्य कटिबद्ध होकर कर्मों को
करते हैं, क्योकि जब कार्य समाप्त होता है तो आप ही विद्यमान
रहते हो, यदि कहो कि नष्ट कर्म ही फल देता है तो निश्चय है