शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१ )
कि चैतन्य पुरुष की उपासना के बिना नष्ट कर्म भी फल देने
वाले नहीं होते । अर्थात कर्ममात्र के फलदाता आप ही हो ॥२०॥
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता-
मृषीणामात्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः ।
क्रतुभ्रन्तस्त्वत्तः क्रतुफलविधानव्यसनिनो
ध्रु ॰ वक्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥२१॥
जजमान दच्छ हैं क्रिया में अति दच्छ जहां
अखिल अधीस जिन्हें जानें प्रजाजन हैं
एही सरनागत को] पालन करनहार
ऋषिवृन्द ऋत्विज, सदस्य सुरगन हैं
हाथ सों तिहारे नाथ जग्य कौ बिनास तहां
जाहि जग्य फल के विधान को व्यसन हैं
साँचि यह बात होति हानि जजमान ही की
जानि को करत बिन श्रद्धा को जतन है ॥२१॥
हे शरणागतरक्षक ! यज्ञ की क्रिया में कुशल दक्ष प्रजापति
जैसा यज्ञकर्ता यजमान और जिसके सभासद ब्रह्मादि देवताओं
का समूह और त्रिकालदर्शी ऋषि जिसमें यज्ञ कराने वाले थे ।
इतने पर भी यज्ञ बिगड़ जाय तो आश्चर्य है, सो हे भगवन् !
आपकी अश्रद्धा से ही यज्ञ का नाश हुआ । क्योंकि यज्ञ के फल-
दाता आप ही हैं । आपकी श्रद्धा से जो किया जाय वह सब
सफल हो होगा ॥२१॥