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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

६ शालिहोत्रम् ।
जिस घोडे की कुक्षिपर एक आवर्त्त होता है वह शीघ्र ही
मर जाता है और यदि एकही स्थान पर ऐसे दो घोडे होंतो
मालिक को भी भारी होते हैं ।
जिस घोडे के जानुपर एक आवर्त्त होता है उसका मालिक
क्लेशयुक्त होकर सदा प्रदेश में वास करता है
जिसके मेढ्रके नीचे आवर्त होता है वह अशुभ है ।
जिसकी त्रिवली में आवर्त होता है वह उत्तम होता है और
उसे श्रीपार्श्व कहते हैं ।
अशुभ घोडों के लक्षण–जिस घोडेकी जिव्हा काली होता है,
वह कृष्णजिव्हा कहलाता है, जिसके तालुमें काला रंग होता है
वह कृष्णतालु, जिसके दांत छोटे बडे, ऊँचे नीचे होते हैं वह
कराली, जिसका संपूर्ण देह एक पांव दूसरे रंगका वह मुशली
कहाता है, जिसके छेदन दंत चार या पांच हों वह हीन दन्त,
और जिसके सात वा आठ दंत हों वह अधिक दन्त कहाता है
जिसके कानके पास आवर्त होता है वह शृंगी है, ये छः प्रकार
के घोडे अपने स्वामी का अनिष्ट चाहते हैं ॥
जिसका एक अंडकोष बढ गया हो वह एकाण्ड कहाता है,
जिसके दोनों अंड बडे हैं। वह जातकांड, जिसका कोई अंग
हीन हो वह हीनाङ्ग जिसका कोई अंग अत्यंत बढ गया हो
वह अधिकांग कहाता है ये चारों प्रकारके घोडे अशुभ समझे
जावे हैं ॥
जिसका सब देह एक रंग का और सिर काले रंग का होता है

प्रथम अध्याय: अश्व-लक्षण, आवर्त (भँवरी) एवं वर्ण-परीक्षा

शालिहोत्रम् । ७
वह तीसरी कहाता हे जिसके अंडकोषके दोनों आगे दो थन होते हैं
वह स्तनी वा स्थलो कहलाता है जिसका एक पांव श्वेतवर्ण और
शेष तीनों पांव किसी और रंगके होते हैं वह आर्जिल कहलाता हैं।
जिसके पांव और गामचीमें भिन्न भिन्न रंगकी रेखा होती है
उसे राजारपाद कहते हैं जिसकी एक आंखकी पुतली काली
और दूसरी आंखकी पुतली पिंगल अर्थात् नीलवर्ण होती हैं उसे
ताक्षी कहते हैं। ये सब घोडे भी अशुभ समझे जाते हैं।
इनके सिवाय घंटी, वदनी और कांचाक्षी आदि घोडे भी
अशुभ होते हैं।
जो घोडा चलने में दुम घुमाता है, वा मारने से पीछे को
हटता है वा दो पैर उठाकर कूदने वा पिछली दुलत्तिया झाड-
ताहै उत्तम नहीं समझा जाता है।
जिस घोडेके खुर सफेद होते हैं वह अच्छा नहीं होता क्योंकि
सफेद खुर नरम होता है।
शुभ घोडोंके लक्षण-जो घोडा अगले पांवसे पृथ्वीको खोदता
है, चलने में अपने स्वामी के मनोनुकूल चलता है, न कभी
अड़ता है, न पीछे को हटता है, वही घोड़ा उत्तम समझा
जाता है।
अश्वशाला-अश्वशाला को घुडसाल भी कहते हैं, घुडशाल
चौडे मैदानों में बनवाना चाहिये जहां किसी प्रकार की शरदी
न रहती हो और भूमिभी बहुत रेतीली वा कंकरीली नहो, हवा
और धूप बे रोक टोक आतीहो। घोडे रखनेके मकान ऐसे होने
चाहिये जो वडे वडे एकही पंक्तिमें हो और उनमें चारों ओर

८ शालिहोत्र ।
बहुतसी खिडकियां भी हों जिनमें होकर हवा वार पार निकल
जातो हो । हरएक घोडेके लिये उसमें कोठरियां भी जुदी २ होवें
जिनमें घोडों के दोनों ओर दीवारें कुछ ऊँची होनी चाहिये और
ऊपरसे खुलारहे तो कोई हरकत नही । हरएक कमरेमें कोयलों
की एक टोकरी लटका देनी चाहिये और ये कोयले हर पन्द्रवें
दिन बदल देने चाहिये । पेशाब निकल जानेके लिये मोरियोंका
प्रबन्ध अच्छा रहना चाहिये जिससे मकानमें दुर्गन्ध न बढै लीद
को उसी दम हटवाते रहें । मकानकी गच घोडेकी छातीकी ओर
कुछ ऊँचो और पीछे को ढालू होना चाहिये. यदि मकान मैला
न होगा तो मच्छर मक्खियां उसे अधिक दुःख न देंगी इस मकान
की दीवारें छठे महिने चुने से पुतवा देना उचित है ।
जिन घोडोंको किसी प्रकारका रोग होजाय उसको स्वस्थ घोड़ों
से थलग करदिया जावे। जिससे वह शेष जानवरोंमें न फैलने पावै
सांयकाल के समय घोडे के नीचे सूखी घास का विस्तर बना देवें
पृथ्वीपर घासकी तह आठ दस अंगुलकी होवे जिससे कड़ी पृ-
थ्वी उसमें गढने न पावे और घासमें भी कोई कठोर वस्तु नहो
जिससे घोडे को कष्ट हो, यह घास दिन निकलते ही उठा देनी
चाहिये और रातमें जितनी घास लीद और पेशावसे खराब हो
गई हो उसको सर्वथा दूरकर देवे पीछे उसमें उतनीही नई घास
मिलाकर विस्तर बनादेवे । जाडेकी ऋतुमें ठंडसे बचानेके लिये
खिडकियों पर परदे लटका देने चाहिये जिससे ठण्डी हवा
भातर न घुसने पावे और घोडेकी पीठपर कंबल वा और कोई
गरम कपड़ा डाल देवे जिससे ठण्ड न लगे । वर्षाऋतुमें रक्षाकी

शालिहोत्रम् । ६
अधिक आवश्यकता है मलमूत्र और सडी घासको बहुत दूर
फेंकवाना चाहिये क्योंकि सडाहटके कारण मच्छर मक्खी इकट्ठे
होकर पशुको बडा कष्ट पहुंचाते हैं उनको दूर रखने के लिये
कोई पतला कपडा घोडे पर डाल देना चाहिये ।
खाने पीनेका वर्णन-सबसे उत्तम खानेकी वस्तु घोडे के लिये
सूखी दूब है. इससे किसी प्रकारकी हानि नहीं पहुंचती और
यह हर समय देनेके योग्य है, घोडा इससे बहुत प्रसन्न रहता है
दूबको लाकर धोडालनी चाहिये और फिर सुखाकर घोडे को
खिलावे । घोडेके पेटमें इतनी अधिक जगह नहीं होती है कि
वह एक दमसे इतनी घास खाले जो बहुत देरतक काम देसके
इस लिये थोडी थोडी देरके पीछे थोडी थोडी घास देनी चाहिये,
इससे अधिक लाभ होगा, अजीर्ण आदि उदर रोग न होने पा-
वेंगे । कभी २ थोडी गाजर खिला देनेसे घोडे को अत्यन्त लाभ
होगा । परन्तु बहुत गाजर खिलाना हानि कारक है इससे पेट
फूलने का डर रहता है ।
घोडेकी शारीरिक शक्ति बढाने के लिये दिनमें दो बार दाना
देना चाहिये. दानेके लिये चना सबके उत्तम वस्तु है, बेदला वा
दला हुआ चना कुछ देर भिगोकर तोबडे में भरकर घोडेके मुखसे
बांध दिया जाता है इस दाने के साथ कभी थोडासा नमक भी
मिलाकर दिया जाता है। प्राचीन कालमें घोडोंके बांधने के स्थान
में सैन्धव नमकके बडे बडे ढेले रक्खे जाते थे. जिन्हें घोडा जब
चाहता था चाट लिया करता था ।
पीनेके लिये निर्मल पानी देना चाहिये. वर्षाऋतुमें नदीका पा

१० शालिहोत्रम् ।
नी पिलाना ठीक नहीं है, ऐसे तालाब और पोखरों का पानी
भी न पिलाना चाहिये, जिनमें धोबी कपडे धोते हों वा गन्दा
पानी उनमें जाता हो, घोडके बीमार होजाने का डर रहता है ।
कुएका पानी बर्तनमें भरकर दिनमें दो तीनवार पिलाता रहे ।
पानी पिलाकर थोडी देरतक इधर उधर टहलाना बहुत आव-
श्यकीय बात है ।
दिनमें दोनों समय थोडी २ देर तक खुले मैदान में टहलाना
चाहिये, बिलकुल छाया और ठंडकमें बँधे रहने से भी घोडे को
हानि पहुंचती है इसमें सर्दी होनेका डर रहता है इस लिये
थोड़ी देर धूपमें रखना भी गुणदायक होता है ।
स्नानादि विधि-जब घोड़ा परिश्रम करके आता है तब उसके
देहमें पसीने आजाते हैं और धूल उड़कर उसकी देहमें जम जाती
है, जिससे मैला होजाता है इस लिये उस धूलको साफ करना
बहुत आवश्यककीय है इस लिये दोनों समय खुरहरे से साफ
करना चाहिये । खुरहरा करनेसे पहिले लगाम चढाकर गलेको कुछ
खींच देना चाहिये । जो घोडा बदमाश हो और सहजमें खुरहरा न
कराता हो तो लगामको तानकर दुमसे बांध देना चाहिये जिससे
वह मुंहको इधर उधर न फेरसके । प्रथमही घोडेके गले को खुर-
हरेसे साफ करें फिर और और अंगोंको साफ करें और थोडी
थोडी देरमें खुरहरेकी धूल भी बुर्शसे साफ करता रहे क्योंकि
खुरहरेको न झाडने से और २ अङ्गोंमें धूलभर जायगी और
खुरहरेसे साफ करदी जाय तब उसपर बुर्श फेर देना चाहिये ।
इसके पीछे एक साफ कपडे से शरीरको पोंछ देना चाहिये इसी

शालिहोत्रम् । ११
तरह अयाल और दुमके वालों को भी कंघी से साफ कर
देना उचित है !
प्रत्येक साल में दोवार कार्तिक और फाल्गुन के महीनों में
घोडे के पुराने रोम गिर जाते हैं और उनके बदले में नये
आते हैं इस लिये उस समय खुग्हरा न करना चाहिये ।
गर्मी की ऋतुमें बहती हुई स्वच्छ नदी में वा निर्मल तालाब
में घोडे को स्नान कराकर सूखे कपडे से पोंछ देना चाहिये,
परन्तु इस काम को प्रति दिन नहीं करना चाहिये ।
परिश्रम का वर्णन-जिस घोडे पर प्रतिदिन सवारी का काम
न पडता हो तो एक ही स्थान में लगातार कई दिन तक बँधे
रहने से वह बीमार होजाता है, परिश्रम करने की आदत कम
होती है और फिर किसी दिन यकायक अधिक परिश्रम करने
का काम पड़जाय तो भारी हानि की सम्भावना होती है; पैर
फूल जाते हैं वा लँगडाने लगते हैं, फेंफडे में रोग होजाता है
और कभी २ ज्वर भी हो जाता है. इसलिये प्रतिदिन घण्टे दो
घण्टे खुले मैदान में ले जाकर परिश्रम का काम लेना बहुत ही
आवश्यकीय है । प्रतिदिन परिश्रम करते रहने से देह चुस्त
और फुर्तीली बनी रहती है, प्रतिदिन शक्ति बढती चली
जाती है; मिहनत करने से कभी जी नहीं चुराता है, और न
व्याकुल होता है । घुडदौड और शिकार के घोडों से तो ऐसा
परिश्रम कराना बहुत ही आवश्यकीय है । जिसको परिश्रम-
करने की प्रकृति पड़ जाती है वह कभी कोई भारी काम
आ पड़ने पर भी सहज में कर लेते हैं। जो प्रतिदिन
ऐसा ही परिश्रम काम में लाया जाय तो बुढापे में भी

९२ शालिहोत्रम् ।
घोडा वैसाही परिश्रम करते रहते हैं, मिहनतसे परिश्रान्त नहीं
होते हैं ।
परिश्रम आदि की रीति-घोडे पर सवारी करते ही उसे
बहुत वेग से नहीं चलाना चाहिये, प्रथम ही धीरे धीरे चलावे
फिर वेग से परन्तु रोकने के समय एक साथ रोक भी न लेना
चाहिये, जैसे धीरे धीरे उसका वेग बढाया था वैसे ही धीरे
धीरे उसका वेग कम करके रोकना चाहिये ।
परिश्रम के पीछे उसी समय उसे घुडसाल में ले जाकर न
बांध देना चाहिये, किन्तु स्वच्छ पानी से उसके मुख के फेन
और अंड तथा उसके छोर पास के फेन धोकर इधर उधर
टहलावे, जब पसीना सूख जाय तब घुडसाल में लेजाकर बांध
दे और सूखी घास से उसका शरीर रगड कर कपडे से पोंछ
डाले ऐसा करने से उसकी सब थकावट दूर होजाती है तब
उसकी पिछाडी बांध कर उसके सामने सूखी घास डाल देवे ।
गर्भादि धारण विधि-घोडी सांड़ के अनुसार बच्चा देती है ।
कभी २ गर्भधारण के समय उत्तम जाति का घोडा उसके सम्मुख
लाकर खडाकर देते हैं, इससे भी उत्तम बच्चा होने की संभावना
होती है ।
घोडी के ग्यारह महीने में बच्चा हुआ करता है और पैदा
होते ही खुर से जानु तक जितनी ऊंचाई होती है,
उससे तिगुनी ऊंचाई उस बच्चे की युवावस्था में होती है ।
जब बच्चा पैदा होता है तब उसके मुख के सामने कोई
दांत नहीं होता है । परन्तु जावडे के दोनों किनारों पर दो २
पेषण दंत निकला करते हैं जिन में से एक को प्रथम पेषण

शालिहोत्रम् । १३
दन्त और दूसरे को द्वितीय पेषण दंत कहते हैं । जब बच्चा
सात दिन का हो जाता है तब उसके प्रत्येक जावडे में दो
छेदन दंत निकल आते हैं । जो दांत पैदा होने ही साथ
निकलते हैं उन्हें क्षीर दंत कहते हैं । पांच सप्ताह के पीछे
सामने की ओर दो छेदन दंत तथा एक पेषण दंत और निकल
आता है तथा आठवें महीने में साम्हने की ओर दो छेदन दंत
और निकल आते हैं, इन सब दांतों का रङ्ग अत्यन्त सफेद होता
है और इनके ऊपर एक काले रङ्ग का छोटा गढ़ाभी होता है ।
जब बच्चा बारह महीने का हो जाता है तौ चौथा पेषण दंत
और दो वर्ष में पांचवां और कुछ दिन पीछे छटा दांत निकल
आता है ।
त्रिंशन्मासोद्भवास्सर्वे अखण्डाः परिकीर्तिताः ।
द्वौ स्यातां वाः त्रय स्स्यातामूर्ध्वाधस्तु यथाक्रमम् ॥
ढाई वर्षकी अवस्थासे ऊपर दो तीन महीने निकल जाने पर
बीचके दो छेदन दंत गिरकर उनकी जगह ऊपर नीचेके जावडों
में क्रम से दो और तीन स्थायी दंत निकल आते हैं जिन्हें
अखण्ड बोलते हैं, यह दांत भी सफेद गड्ढेदार होते हैं ।
चतुर्भिर्वत्सरैर्दन्ताश्चत्वारः पतितोत्थिताः ।
पञ्चभिर्हुदन्तेषु जायन्ते त्वथकालिका ॥
जब घोडा साडे तीन वर्ष से ऊपर और चार वर्ष के भीतर
होता है तब उसके दो छेदन दंत और गिर कर दो बडे
दांत ऊपर की ओर और निकल आते हैं और पांचवें
वर्ष के अन्त तक शेष दो दांत निकल आते हैं इसी अवसर
में नेश भी निकल आती हैं । जो नेश निकलती है तौ हरएक

९४ शालिहोत्रम् ।
जावडे में बीस दांत, और न निकलने पर केवल अठारह दांत
होते हैं ।
षष्ठे संवत्सरे जाते कालिकादशनद्वये ।
तथा स्यात् सप्तमे वर्षे दाशो दंतचतुष्टये ॥
छठे वर्ष में बीचवाले दो अखण्ड दांतों का गढा भर जाता
है और उनका कालापन भी जाता रहता है, और सातवें वर्ष में
उनके पासवाले और दो दांतों का गढा भर जाता है उनका
कालापन भी जाता रहता है ।
अष्टमे वर्षेऽतीते तु नष्टाः स्युः सर्वकालिकाः ।
नवमेऽथ ते सर्वे पीतत्वं सम्भवन्ति च ॥
आठवें वर्ष में शेष दो दांतोंका गढ़ा भर जाता है और उनका
कालापन भी जाता रहता है और नवें वर्ष में उनमें पीलापन
आने लगता है ।
यावदेकादशं वर्षं तावत् पीतत्वमागतम् ।
तिष्ठन्ति दशनास्तेषां वाजिनां ससिताभ्रमाः ॥
ग्यारहवें वर्ष तक पीलापन बढता रहता है, इसके पश्चात् उन
में सफेदी की झलक मारने लगती है ।
ततः श्वेताः प्रजायन्ते चतुर्दशसमाश्रिताः ।
ततः काचप्रभास्तदृक् यावत् संवत्सरास्त्रयः ॥
तदन्तर चौदह वर्ष की अवस्था पर पहुँचने पर दांत फिर
सफेद होजाते हैं, फिर सत्रह वर्ष की अवस्था तक कांच के
तुल्य रहते हैं ।
तावत्संवत्सरादूर्ध्वं यावद्वर्षाणि विंशतिः ।
माक्षिकाभा रदास्तेषां यावद्वर्षत्रयं पुनः ॥ ४ण

शालिहोत्रम् ।
फिर तीन वर्ष तक अर्थात् बीस वर्षकी अवस्थातक उन दांतों
का रंग मत्तिकाके तुल्य होता चला जाता है ।
त्रयोविंशात्पराः पश्चात्पूर्वे दृपलकास्मृताः ।
षड्विंशात्परतो दन्ताः स्थानाच्चलनमाप्नुयुः ॥
तेईस वर्षकी अवस्थातक उनका रंग शंखके तुल्य रहता है फिर
छब्बीस वर्ष तक दृपलक रहते हैं इससे पीछे हिलने लगते हैं
यावर्द्धत्रयमश्चात् पातम्बर्षत्रये पुनः ।
द्वात्रिंशद्वत्सरे प्राप्ते वाजी निर्याणमाप्नुयात् ॥
ये सब दांत बत्तीस वर्षकी अवस्थातक गिर पडते हैं और यही
घोडे के जीवन कालकी परमावधि है ।
घोडेका प्रमाण ।
सप्तविंशत्प्रमाणेन मुखमश्वस्य शस्यते ।
कर्णौ षडंगुला प्रोक्ता तालुकं चतुरंगुलम् ॥
चत्वारिंशच्च सप्ताढ्यः स्कंधः संपरिकीर्तितः ।
पृष्ठवंशश्चतुर्विंशस्सप्तविंशस्तथा कटिः ॥
घोडेके मुखकी लंबाई २७ अंगुल, कान ६ अंगुल, तालु ४
अंगुल, कंधा ४७ अंगुल, पीठ चौबीस अंगुल और कटिप्रदेश
२७ अंगुल का होता है ।
मति सूक्ष्मं तथा निम्नं पुच्छं हस्तद्वयान्वितम् ।
लिंगं हस्तप्रमाणन्तु तथाण्डौ चतुरंगुलौ ॥
मार्गस्थानं चतुर्विंशद् हृदयं षोडशात्मकम् ।
५, कटिकक्षान्तरं प्रोक्तं चत्वारिंशत्प्रमाणकम् ॥
में नेशत्यन्त महीन बालोंसे युक्त दो हाथ लंबी पूछ, गुह्येन्द्री

९६ शालिहोत्रम् ।
एक हाथ लंबी, अंड चार अंगुल, गुदामार्ग २४ अँगुल, छाती
१६ अंगुल कटि और कच्छका मध्यम प्रदेश ४० अंगुलका होताहै ।
इसी तरह फारसी ग्रन्थोंमें लिखा है कि घोडेकी गर्दन ४० अं-
गुल दुमसे सिरतक १६० अंगुल, ऊँचाई १०० अंगुल होती है,
इस प्रमाणवाले घोडे अच्छे समझे जाते हैं जो इससे न्यूनाधिक
होते हैं वे उत्तम नहीं होते ।
नापनेकी रीति-एक आदमी डोरका एक सिरा पकड कर कंधे
पर लगादे और दूसरा आदमी इसे सुमतक लेजाय यही ऊ-
चाई होती है । लंबाई जाननेकी यह रीति है कि आंखके कोण
से दुमकी जड तक नापा जाता है ।
उपयोगमें लानेका समय-जब तक घोडेका बच्चा चार वर्षका
होता है तब तक उसकी अवस्था बालक समझना चाहिये, इस
व्यवस्था में उससे किसी प्रकार का परिश्रम लेना उचित नहीं है,
इस समय उनको कार्य में लगाने से उनकी युवा अवस्था में ही
बुढापा आ जायगा और वे किसी काम के नहीं रहते हैं ।
परन्तु इस समय में भी उनको लगाम का अभ्यास कराता रहें
पांच वर्ष से ऊपर यौवन काल आता है, तभी से उनको काम
सिखलाने का यत्न करना चाहिये बीस वर्षकी अवस्था तक ये
हर प्रकार के कठिन काम कर सकते हैं, बीस वर्ष से ऊपर वृद्धा
वस्था आ जाती है इस समय काम लिया जावै तो बहुत दिन
तक काम दे सकते हैं ।
संस्कृत ग्रन्थसे ऋतुचर्यादि वर्णन ।
कूपोदकं सदा शस्तं पानाय जलदागमे ।
अभ्यंगे कटु तैलेन निर्वातस्थानबन्धनम् ॥

शालिहोत्रम् । १७
एकाहान्तरितं दद्याल्लवणं च विचक्षणः ।
पलद्वयप्रमाणे मुखतापविशुद्धये ॥
वर्षोदकेन सिक्ताङ्गस्तेजसा त्यज्यते हयः ।
मुखरोगमवाप्नोति शालिहोत्रेऽब्रवीदिदम् ॥
अशुद्धोदकतः रोगान् प्राप्नोति शतशः परान् ।
वर्षोदकस्य पानेन बलहीनश्च जायते ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रावृट्काले उपस्थिते ।
अनेन विधिना प्राज्ञो वाजिनं परितोषयेत् ॥
वर्षा ऋतुमें कूपका जल, कडुवे तेलका लगाना निर्वात
स्थान में बांधना, एक दिन बीच में छोड़कर चार तोले नमक
देना, गुण कारक होता है, इससे मुखका ताप जाता रहता है ।
वर्षा का जल ऊपर पड जाने से घोडा तेज हीन होजाता है
और उसके मुखका रोग भी उत्पन्न होता है । वर्षाका मैला जल
पीने से और भी सैकड़ों रोग तथा बलहीनता होती है, इस
लिये यत्नपूर्वक वर्षा काल में पशुकी रक्षा करना उचित है ।
शरद ऋतुमें कर्त्तव्य विधि ।
ततश्शरदमासाद्य बहुखण्डसमन्वितम् ।
शस्तं क्षीरोदनं पानं पलाष्टपग्निसंख्यया ॥
दुग्धं वा केवलं रात्रौ कथितं संप्रशस्यते ।
अथान्यदपि यत्किंचित् मधुरं सम्प्रदापयेत् ॥
पानाय सारसंतोयं यवसं सुमनोहरम् ।
नीलवर्णं मकुण्ठं च घृतं मांसेन संयुतम् ॥
वाहनं च प्रयत्नेन सूस्त्वल्पमपि जायते ।

१८ शालिहोत्रम् ।
एवं शरदि यःसम्यक् पुष्टिन्नयति वाजिनम् ।।
शरदऋतुके आनेपर बहुतसी शकर डालकर ८ पल दूध चांव-
ल खिलावै, अथवा रात्रिके समय ओटाया हुआ केवल दूध देवै,
अथवा औरभी कोई मधुर पदार्थ देवै, पीनेके लिये सरोवर का
जल, खानेके लिये हरी दूब, मूंगका दाना अथवा घृतयुक्त मांस
देवै । इस तरह शरद ऋतुमें घोडेकी परिचर्या करने से कैसा
ही छोटा घोड़ा हो वह भी सवारी के योग्य हो जाता है ।
हेमन्त ऋतुमें घोडेकी परिचर्या ।
ततो हेमन्तमासाद्य निर्वाते निदधेद्धयम् ।
मासार्द्धं यवसं दद्यात् पानीयञ्च यथेच्छया ।
घृतं वा यदि तैलं वा पानं दद्याद्विचक्षणः ॥
वाहयेच्च शनैर्नित्यं सर्वदोषप्रशान्तये ।
हेमन्त ऋतुमें घोडेको निर्वातस्थान में बांधै । आधे महीने तक
घासदे और यथेच्छ जलपान कराता रहे, घी वा तेलभी कभी २
देता रहे और प्रति दिन उसपर सवारी करता रहे, जिससे सब
दोष शान्त रहते हैं ।
ततः शिशिरमासाद्य दद्यात्तैलं हि वाजिनाम् ।
प्रमाणञ्च पलान्यष्टौ दिनानाञ्च त्रिसप्तकम् ।।
यवोत्थं यवसं दद्यात्पश्चाद्विंशद्दिनानि तु ।
यवाभावेऽथ चणकं दद्यादार्द्रतरं सदा ।
तदभावे मसूरांश्च शुष्कार्द्रान् स्तैलसंयुतान् ॥
शिशिरऋतुमें २१ दिनतक घोडेको आठ पलतैल देता रहे फिर
बीस दिनतक जौका भुसा देवै, जौ न मिलैंतौ भीगे हुए चने देवै

शालिहोत्रम् । १६
चने भी न मिलें तो सूखी वा भीगी हुई मसूर तेल मिला
कर देवे !
पर्वतानां यथामेरुरायुधानां च वज्रकम् ।
तथा सर्वोपचाराणां सस्ये श्रेष्ठतमा यवाः ।
जैसे पर्व्वतोंमें सुमेरु और शस्त्रों में वज्र सर्वोत्तम हे इसी तरह
घोडे के लिये जौ सर्वोत्तम है।
यश्चाश्नाति यवान् वाजी शुष्कांश्च स्वेच्छया सदा ॥
न तस्य जायते रोगः कदाचिदपि चान्यथाक् ॥
जो घोडा अपनी इच्छा के अनुसार सूखे जौ खाता रहता है,
उसको कभी किसी प्रकार का रोग नहीं होने पाता है ॥
हमारे देशमें बहुत दिनों से मुसलमान बादशाहोंका राज्य रहा
और उनके समयमें घोडों की परीक्षा आदि का काम भी इन्हीं
लोगों के हाथमें रहा इससे अबहम घोडेके नाम भेद, रंग, भोंरी
आदिका वर्णन फारसी ग्रन्थों के अनुसार लिखते हैं ।
भोंरियों की पहचान ।
भोंरी आठ प्रकारकी होती है ( १ ) पानीके भंवरसी, ( २ )
काली सी ( ३ ) खिले हुए फूल के सदृश, ( ४ ) मृगना-
भिसी, ( ५ )
गुलरसी; [ ६ ] सेवके समान [ ७ ] जूती के सदृश और
[ ८ ] भोंरी ऐसी होती है जैसे गौके चाटने से बच्चे के बालों
पर चिन्ह पड जाता है।
भोंरियों का स्थान ।
घोडेकी देहपर दस जगह भोंरियां होती हैं, दो छाती पर, दो
सिरपर, दो माथेपर, एक टीके पर, एक ओष्ठ के नीचे और दो

२० शालिहोत्रम् ।
नाभि के पास जिस घोडे के यह दस भौंरी नहीं होती हैं वह
उत्तम नहीं समझे जाते हैं ।
भौंरियों के नाम ।
टीके के पास वाली भौंरी को ढकनी कहते हैं, यह भौंरियां
यदि एक वा दो से अधिक होंतो सीकन कहते हैं । ईरानी वा
मुग़ल लोग इसे खेश वा हेजचल कहते हैं । पञ्जाबी लोग दो
गर और कोई कोई चुनक भी कहते हैं जुल्फ के नीचे की
भौंरी एक, दो वा तीन हों तो उसे नसरत बीनी कहते हैं
यवन लोग इसे अच्छा बताते हैं ।
आंसू ढाल की पहिचान-आंख के कोने के दाहिनी वा बाईं
ओर हो अथवा कान के ऊपर नीचे होवे तो बुरी होती है ।
अरवल की पहिचान-कानों की जड में या ठुड्डी के दोनों ओर
या सिर के ऊपर होवे तो सिर की भौंरी को छोडकर सबका
नाम अर्रवल है, जो दो २ भौंरी होवें तो अच्छी और जो एक
एक हो तो बुरी होती है ।
चांद सूरज की पहिचान-सिर के ऊपर की दो भौंरियों को
चांद सूरज कहते हैं ये शुभ होती हैं ।
गंदा बागल की पहिचान-पिंडली, घुटने, गुह्येन्द्रिय और
दुम इनमें से किसी जगह पर भौंरी हो तो अशुभ होती है,
और इन भौंरियों का नाम गंदाबागल है ।
मारुत की पहिचान-घुटने के पीछे, अंडकोश के नीचे ऊपर
नाभिके ऊपर नीचे, एक वा दोनों कंधोंके ऊपर, मुँहपर या ओष्ठ
के नीचे जो भौंरियां होती हैं वह सब अशुभ होती हैं ।

शालिहोत्रम् । ९९
सर्पिणी की पहिचान-कंथों को जड़ में बालों के पास जो
भौंरी होती है वह बुरी होती है ।
खूंटीगाठकी पहिचान-किसो २ घोडे के हाथ पर भौंरी होती
है, जो भौंरी का मुंह नीचे को होवे तो अच्छी समझे और
गांठ के नीचे की ओर बाहर वा भीतर की ओर होवे तो कोई
उसे बुरा और कोई अच्छा बताते हैं ।
खूंटी उखाड़ की पहिचान-जो भौंरी का मुख ऊपर की ओर
होता है तो अशुभ होती हैं ।
भुजबद्ध की पहिचान-जिस घोडे की भुजा पर भौंरी होती
है, वह बड़ा पराक्रमी होता है ।
छत्र भङ्ग की पहिचान-जिस घोडे की पीठ पर अथवा जीन
के नीचे भौंरी होती है उसे छत्रभंग कहते हैं यह भौंरी अशुभ होती है।
हरदावलकी पहिचान-छातीपर वा दोनों हाथोंके जोडपर जो
भौंरी होती है उन्हें हरदावल कहते हैं ये बहुत बुरी होती है।
गामकी पहिचान-नाभिके सन्मुख जो पेटके ऊपर भौंरी होती
है उसे गाम कहते हैं उसे कोई शुभ बताता है और कोई अ-
शुभ, मरहटे लोग ऐसे घोडे को लेना नहीं चाहते हैं ।
देवमन की पहिचान-जो भौंरी कंठमणि के निकट वा कुछ
ऊपर नीचे भी हो तो यह बहुत शुभ होती है, इसके होने पर
सहस्र दूषण भी कुछ नहीं कर सक्ते हैं ।
गङ्गापाट की पहिचान-यह भौंरी पेट पर होती है, जो यह
भौंरी तङ्ग के भीतर आजाय तो अच्छी होती है और तङ्ग से
हटने पर बुरी समझी जाती है ।

२२ शालिहोत्रम् ।
घोडे की गति-संस्कृत में घोडे की गति पांच प्रकार की
लिखीहै यथाः-आस्कन्दित, धौरितक, वल्गित, प्लुत और रेचित
(१) आस्कन्दित गति-वह है जिसमें घोड़ा क्रोधित मनुष्य
की तरह सिरको झुकायेहुए चारोंचरणोंसे दुरकी भरकर चलता है।
(२) धौरितक गति-इसके चार भेद हैं यथा-धौरितक, धौर्य,
धोरण और धोरित। नकुल की तरह चलने को धौरितक,
कौवारी पक्षीकी तरह चलने को धौर्य, मोरकी तरह नृत्य करते
हुए चलने को धोरण और वाराह के सदृश गति को धोरित
कहते हैं। इसी में एक 'धाण' गति भी लिखी है जिसमें
घोडा ऐसे वेग से दौड़ता है कि न कुछ सुन पड़ता न देख
पड़ता है।
(३) वल्गित गति-जो घोडा ऊंचा मुख करके और रीर
दवा कर चलता है उसे वल्गित कहते हैं।
(४) प्लुत गति-हरिणों की तरह चौकडी भरकर वा मंडूक
की तरह चलने को प्लुत कहते हैं।
(५) रेचित-जो समान चाल से चलता है अर्थात् न वेगसे
न धीरे से उसकी गति को रेचित कहते हैं।
फारसी ग्रन्थों के अनुसार ।
(१) रपट-उछलकर अत्यन्त वेगसे चलनेको रपट कहते हैं।
(२) छारतक-उछलकर धीरे से चलनेको छारतक कहते हैं।
(३) दुलकी-सब देहको हिलाकर चलना दुलकी कहलाता है।
(४) कूदना-अगले दो पैर उठाकर चलने को कूदना
कहते हैं।
(५) कदम-कदम चार प्रकार के होते हैं (१) सागम उस

शालिहोत्र । २३
गति को कहते हैं, जिसमें सवार के हाथ से पानी भरे हुए
कटोरों में से बूंद भी न पडे ।
( २ ) गला उठाकर अगले पैरों को घुमाकर चलने का नाम
इन्गा है ।
( ३ ) गर्दन और सिर इतना उठाले कि सवार की पगड़ी
भी दिखाई न दे ।
( ४ ) चारों पांव से एक ही बार उछल उछल कर कूदता
चले उसे रहोवाल कहते हैं ।
घोडे के चार अङ्ग ।
दीर्घाणि चत्वार्यथ चोन्नतानि चत्वारि रक्तान्यतिसूक्ष्म-
ङ्गानि । ह्रस्वानि चत्वार्यथ चायतानि भूयस्तु चत्वार्यथ
निम्नानि ।
घोडेके अङ्ग प्रत्यंगोंमें चार दीर्घ, चार उन्नत, चार रक्त, चार
सूक्ष्म, चार लघु, चार विस्तृत और चार निम्न ग्रहण किये
गये हैं । यथाः—
आस्यं भुजौ केश कटी च दीर्घमेतच्चतुष्कन्तुरगस्य शस्तम् ।
तथोन्नते प्राणपुटे ललाटे शक्रश्च तज्ज्ञाश्चरणौ वदन्ति ॥
मुख, भुजा, केश, और कटि ये चार दीर्घ अच्छे होते हैं ।
नासिका, मस्तक, खुर और चरण ये चार उन्नत अच्छे होते हैं ।
ओष्ठौ च जिह्वात्वथ, तालुकश्च मेऽढ्रं सुरक्तं शुभदं हयस्य ।
लघूनि बन्धाश्चरणौ सुकोष्ठे श्रोत्राणि सर्वाणि तथैव पुच्छम् ॥
ओष्ठ, जिह्वा, तालु, और पेढू ये चार रक्त वर्णके अच्छे होतेहैं.
इसी तरह बन्ध, कोष्ट, कान और पूंछ छोटे अच्छे होते हैं ।
करणान्तरी कर्णसमन्विता च वंशी तथा ह्रस्वतरं प्रशस्तम् ।

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९९ शालिहोत्रम्
वदत्रं सुखं कन्धरजानुदी च पार्श्वं च सप्तः शुभदं प्रदिष्टम् ॥
कानोंका मध्यभाग, दोनों कान पीठ का वांसा ये ह्रस्व अच्छे
होते हैं । मुख, कन्धा जानु और पार्श्व यह लंबे अच्छे होतेहै !
कक्षान्तरं चोदरमध्यमं च निम्ना कटी तालुसजानुकानि ।
वक्षश्शिफोरूजघनस्थलंच चतुष्कमेतत् पृथुलं प्रदिष्टम् ॥
कक्षाओंका मध्य भाग, उदर मध्य भाग, कटि और तालु ये
चार निम्न शुभ है । वक्षस्थल, शेफ, ऊरू, और जंघा ये चार
पुष्ट अच्छे होते हैं ।
घोडेके खेत—जिस २ स्थानोंमें घोडे पैदा होतेहैं वे उसी देशके
नामसे प्रसिद्ध होतेहैं और उनके शारीरिक बल आदि भी उन्हीं
देशों के अनुसार होते हैं ।
सर्वोत्तम घोडे—अर्बी, खुरासानी, इराकी, यमनी, तुर्की, तातारी,
खतन अदन, चीनी, काबुली, काश्मीरी, काठियावाडी, भोटिया

शालिहोत्रम् । २५
काठियावाड के घोडे बहुत अच्छे होते हैं इन्हें काठियावाडी
कहते हैं, ये घोडे ग्यारह प्रकारके होते हैं; जैसे-चादरिया, मा-
किया, मांग़लिया, ताजनियां, रेडिया, लखमियां, रेशमियां, देश-
रियां, हरनियां बादलिया और मोटरियां ।
मारवाडी घोडे मारवाड से आते हैं ये चार प्रकारके होते हैं
जैसेः-डहा, राजघडा, बालेवडा और तलवाडा ।
दक्षिणी घोडे-यह घोडे दक्षिणसे आतेहैं, ये मिली हुई नस्ल
के होतेहैं अर्थात् अर्त्री और काठियावाडी से मिलकर उत्पन्न
होतेहैं. इनमें से भीमरा; मकुन्दासी, कन्दासी और नागपुरी
बहुत अच्छे होते हैं ।
सिन्ध देशके घोडे सिन्धी कहलाते हैं।
पंजाब के घोडे पंजाबी कहलाते हैं, परन्तु सिंधी और पंजाबी
दोनों दोगले होते हैं. ये ईरानी और हिन्दुस्तानी घोडों से
उत्पन्न होते हैं, यह भी चार प्रकार के हैं. जैसे:-धन्नी, घेप,
सायडू और भटंडा ।
मालवी घोडे-यह घोडे मलवा देशमें होतेहैं, परन्तु वहां अ-
नेक प्रकारके घोडे रहने से मिली हुई नस्लके होते हैं ।
टांगन घोडे-ये घोडे बहुत छोटे और सुन्दर होते हैं। छोटे
होने ही के कारण इनको टांगन कहते हैं, येछः प्रकार के होते
हैं यथाः-
(१) वर्म्मापेगू-यह प्रायः ब्रह्मासे आते हैं। (२) मनीपुरी ये
मनीपुर के होते हैं। (३) भूटानी भुटानसे काफरी गुट आते
हैं। यहांके घोडोंको भोटियाभी कहते हैं। (४) नेपाली टांगन