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सर्वकोश
शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

शालिहोत्रम् । १६
चने भी न मिलें तो सूखी वा भीगी हुई मसूर तेल मिला
कर देवे !
पर्वतानां यथामेरुरायुधानां च वज्रकम् ।
तथा सर्वोपचाराणां सस्ये श्रेष्ठतमा यवाः ।
जैसे पर्व्वतोंमें सुमेरु और शस्त्रों में वज्र सर्वोत्तम हे इसी तरह
घोडे के लिये जौ सर्वोत्तम है।
यश्चाश्नाति यवान् वाजी शुष्कांश्च स्वेच्छया सदा ॥
न तस्य जायते रोगः कदाचिदपि चान्यथाक् ॥
जो घोडा अपनी इच्छा के अनुसार सूखे जौ खाता रहता है,
उसको कभी किसी प्रकार का रोग नहीं होने पाता है ॥
हमारे देशमें बहुत दिनों से मुसलमान बादशाहोंका राज्य रहा
और उनके समयमें घोडों की परीक्षा आदि का काम भी इन्हीं
लोगों के हाथमें रहा इससे अबहम घोडेके नाम भेद, रंग, भोंरी
आदिका वर्णन फारसी ग्रन्थों के अनुसार लिखते हैं ।
भोंरियों की पहचान ।
भोंरी आठ प्रकारकी होती है ( १ ) पानीके भंवरसी, ( २ )
काली सी ( ३ ) खिले हुए फूल के सदृश, ( ४ ) मृगना-
भिसी, ( ५ )
गुलरसी; [ ६ ] सेवके समान [ ७ ] जूती के सदृश और
[ ८ ] भोंरी ऐसी होती है जैसे गौके चाटने से बच्चे के बालों
पर चिन्ह पड जाता है।
भोंरियों का स्थान ।
घोडेकी देहपर दस जगह भोंरियां होती हैं, दो छाती पर, दो
सिरपर, दो माथेपर, एक टीके पर, एक ओष्ठ के नीचे और दो