सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 130 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 37

१८ शालिहोत्रम् ।
एवं शरदि यःसम्यक् पुष्टिन्नयति वाजिनम् ।।
शरदऋतुके आनेपर बहुतसी शकर डालकर ८ पल दूध चांव-
ल खिलावै, अथवा रात्रिके समय ओटाया हुआ केवल दूध देवै,
अथवा औरभी कोई मधुर पदार्थ देवै, पीनेके लिये सरोवर का
जल, खानेके लिये हरी दूब, मूंगका दाना अथवा घृतयुक्त मांस
देवै । इस तरह शरद ऋतुमें घोडेकी परिचर्या करने से कैसा
ही छोटा घोड़ा हो वह भी सवारी के योग्य हो जाता है ।
हेमन्त ऋतुमें घोडेकी परिचर्या ।
ततो हेमन्तमासाद्य निर्वाते निदधेद्धयम् ।
मासार्द्धं यवसं दद्यात् पानीयञ्च यथेच्छया ।
घृतं वा यदि तैलं वा पानं दद्याद्विचक्षणः ॥
वाहयेच्च शनैर्नित्यं सर्वदोषप्रशान्तये ।
हेमन्त ऋतुमें घोडेको निर्वातस्थान में बांधै । आधे महीने तक
घासदे और यथेच्छ जलपान कराता रहे, घी वा तेलभी कभी २
देता रहे और प्रति दिन उसपर सवारी करता रहे, जिससे सब
दोष शान्त रहते हैं ।
ततः शिशिरमासाद्य दद्यात्तैलं हि वाजिनाम् ।
प्रमाणञ्च पलान्यष्टौ दिनानाञ्च त्रिसप्तकम् ।।
यवोत्थं यवसं दद्यात्पश्चाद्विंशद्दिनानि तु ।
यवाभावेऽथ चणकं दद्यादार्द्रतरं सदा ।
तदभावे मसूरांश्च शुष्कार्द्रान् स्तैलसंयुतान् ॥
शिशिरऋतुमें २१ दिनतक घोडेको आठ पलतैल देता रहे फिर
बीस दिनतक जौका भुसा देवै, जौ न मिलैंतौ भीगे हुए चने देवै