शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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बहुतसी खिडकियां भी हों जिनमें होकर हवा वार पार निकल
जातो हो । हरएक घोडेके लिये उसमें कोठरियां भी जुदी २ होवें
जिनमें घोडों के दोनों ओर दीवारें कुछ ऊँची होनी चाहिये और
ऊपरसे खुलारहे तो कोई हरकत नही । हरएक कमरेमें कोयलों
की एक टोकरी लटका देनी चाहिये और ये कोयले हर पन्द्रवें
दिन बदल देने चाहिये । पेशाब निकल जानेके लिये मोरियोंका
प्रबन्ध अच्छा रहना चाहिये जिससे मकानमें दुर्गन्ध न बढै लीद
को उसी दम हटवाते रहें । मकानकी गच घोडेकी छातीकी ओर
कुछ ऊँचो और पीछे को ढालू होना चाहिये. यदि मकान मैला
न होगा तो मच्छर मक्खियां उसे अधिक दुःख न देंगी इस मकान
की दीवारें छठे महिने चुने से पुतवा देना उचित है ।
जिन घोडोंको किसी प्रकारका रोग होजाय उसको स्वस्थ घोड़ों
से थलग करदिया जावे। जिससे वह शेष जानवरोंमें न फैलने पावै
सांयकाल के समय घोडे के नीचे सूखी घास का विस्तर बना देवें
पृथ्वीपर घासकी तह आठ दस अंगुलकी होवे जिससे कड़ी पृ-
थ्वी उसमें गढने न पावे और घासमें भी कोई कठोर वस्तु नहो
जिससे घोडे को कष्ट हो, यह घास दिन निकलते ही उठा देनी
चाहिये और रातमें जितनी घास लीद और पेशावसे खराब हो
गई हो उसको सर्वथा दूरकर देवे पीछे उसमें उतनीही नई घास
मिलाकर विस्तर बनादेवे । जाडेकी ऋतुमें ठंडसे बचानेके लिये
खिडकियों पर परदे लटका देने चाहिये जिससे ठण्डी हवा
भातर न घुसने पावे और घोडेकी पीठपर कंबल वा और कोई
गरम कपड़ा डाल देवे जिससे ठण्ड न लगे । वर्षाऋतुमें रक्षाकी