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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

शालिहोत्रम् । ७
वह तीसरी कहाता हे जिसके अंडकोषके दोनों आगे दो थन होते हैं
वह स्तनी वा स्थलो कहलाता है जिसका एक पांव श्वेतवर्ण और
शेष तीनों पांव किसी और रंगके होते हैं वह आर्जिल कहलाता हैं।
जिसके पांव और गामचीमें भिन्न भिन्न रंगकी रेखा होती है
उसे राजारपाद कहते हैं जिसकी एक आंखकी पुतली काली
और दूसरी आंखकी पुतली पिंगल अर्थात् नीलवर्ण होती हैं उसे
ताक्षी कहते हैं। ये सब घोडे भी अशुभ समझे जाते हैं।
इनके सिवाय घंटी, वदनी और कांचाक्षी आदि घोडे भी
अशुभ होते हैं।
जो घोडा चलने में दुम घुमाता है, वा मारने से पीछे को
हटता है वा दो पैर उठाकर कूदने वा पिछली दुलत्तिया झाड-
ताहै उत्तम नहीं समझा जाता है।
जिस घोडेके खुर सफेद होते हैं वह अच्छा नहीं होता क्योंकि
सफेद खुर नरम होता है।
शुभ घोडोंके लक्षण-जो घोडा अगले पांवसे पृथ्वीको खोदता
है, चलने में अपने स्वामी के मनोनुकूल चलता है, न कभी
अड़ता है, न पीछे को हटता है, वही घोड़ा उत्तम समझा
जाता है।
अश्वशाला-अश्वशाला को घुडसाल भी कहते हैं, घुडशाल
चौडे मैदानों में बनवाना चाहिये जहां किसी प्रकार की शरदी
न रहती हो और भूमिभी बहुत रेतीली वा कंकरीली नहो, हवा
और धूप बे रोक टोक आतीहो। घोडे रखनेके मकान ऐसे होने
चाहिये जो वडे वडे एकही पंक्तिमें हो और उनमें चारों ओर