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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 130 में से

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पृष्ठ 29

१० शालिहोत्रम् ।
नी पिलाना ठीक नहीं है, ऐसे तालाब और पोखरों का पानी
भी न पिलाना चाहिये, जिनमें धोबी कपडे धोते हों वा गन्दा
पानी उनमें जाता हो, घोडके बीमार होजाने का डर रहता है ।
कुएका पानी बर्तनमें भरकर दिनमें दो तीनवार पिलाता रहे ।
पानी पिलाकर थोडी देरतक इधर उधर टहलाना बहुत आव-
श्यकीय बात है ।
दिनमें दोनों समय थोडी २ देर तक खुले मैदान में टहलाना
चाहिये, बिलकुल छाया और ठंडकमें बँधे रहने से भी घोडे को
हानि पहुंचती है इसमें सर्दी होनेका डर रहता है इस लिये
थोड़ी देर धूपमें रखना भी गुणदायक होता है ।
स्नानादि विधि-जब घोड़ा परिश्रम करके आता है तब उसके
देहमें पसीने आजाते हैं और धूल उड़कर उसकी देहमें जम जाती
है, जिससे मैला होजाता है इस लिये उस धूलको साफ करना
बहुत आवश्यककीय है इस लिये दोनों समय खुरहरे से साफ
करना चाहिये । खुरहरा करनेसे पहिले लगाम चढाकर गलेको कुछ
खींच देना चाहिये । जो घोडा बदमाश हो और सहजमें खुरहरा न
कराता हो तो लगामको तानकर दुमसे बांध देना चाहिये जिससे
वह मुंहको इधर उधर न फेरसके । प्रथमही घोडेके गले को खुर-
हरेसे साफ करें फिर और और अंगोंको साफ करें और थोडी
थोडी देरमें खुरहरेकी धूल भी बुर्शसे साफ करता रहे क्योंकि
खुरहरेको न झाडने से और २ अङ्गोंमें धूलभर जायगी और
खुरहरेसे साफ करदी जाय तब उसपर बुर्श फेर देना चाहिये ।
इसके पीछे एक साफ कपडे से शरीरको पोंछ देना चाहिये इसी