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सर्वकोश
शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 43

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९९ शालिहोत्रम्
वदत्रं सुखं कन्धरजानुदी च पार्श्वं च सप्तः शुभदं प्रदिष्टम् ॥
कानोंका मध्यभाग, दोनों कान पीठ का वांसा ये ह्रस्व अच्छे
होते हैं । मुख, कन्धा जानु और पार्श्व यह लंबे अच्छे होतेहै !
कक्षान्तरं चोदरमध्यमं च निम्ना कटी तालुसजानुकानि ।
वक्षश्शिफोरूजघनस्थलंच चतुष्कमेतत् पृथुलं प्रदिष्टम् ॥
कक्षाओंका मध्य भाग, उदर मध्य भाग, कटि और तालु ये
चार निम्न शुभ है । वक्षस्थल, शेफ, ऊरू, और जंघा ये चार
पुष्ट अच्छे होते हैं ।
घोडेके खेत—जिस २ स्थानोंमें घोडे पैदा होतेहैं वे उसी देशके
नामसे प्रसिद्ध होतेहैं और उनके शारीरिक बल आदि भी उन्हीं
देशों के अनुसार होते हैं ।
सर्वोत्तम घोडे—अर्बी, खुरासानी, इराकी, यमनी, तुर्की, तातारी,
खतन अदन, चीनी, काबुली, काश्मीरी, काठियावाडी, भोटिया