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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 130 में से

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पृष्ठ 34

शालिहोत्रम् ।
फिर तीन वर्ष तक अर्थात् बीस वर्षकी अवस्थातक उन दांतों
का रंग मत्तिकाके तुल्य होता चला जाता है ।
त्रयोविंशात्पराः पश्चात्पूर्वे दृपलकास्मृताः ।
षड्विंशात्परतो दन्ताः स्थानाच्चलनमाप्नुयुः ॥
तेईस वर्षकी अवस्थातक उनका रंग शंखके तुल्य रहता है फिर
छब्बीस वर्ष तक दृपलक रहते हैं इससे पीछे हिलने लगते हैं
यावर्द्धत्रयमश्चात् पातम्बर्षत्रये पुनः ।
द्वात्रिंशद्वत्सरे प्राप्ते वाजी निर्याणमाप्नुयात् ॥
ये सब दांत बत्तीस वर्षकी अवस्थातक गिर पडते हैं और यही
घोडे के जीवन कालकी परमावधि है ।
घोडेका प्रमाण ।
सप्तविंशत्प्रमाणेन मुखमश्वस्य शस्यते ।
कर्णौ षडंगुला प्रोक्ता तालुकं चतुरंगुलम् ॥
चत्वारिंशच्च सप्ताढ्यः स्कंधः संपरिकीर्तितः ।
पृष्ठवंशश्चतुर्विंशस्सप्तविंशस्तथा कटिः ॥
घोडेके मुखकी लंबाई २७ अंगुल, कान ६ अंगुल, तालु ४
अंगुल, कंधा ४७ अंगुल, पीठ चौबीस अंगुल और कटिप्रदेश
२७ अंगुल का होता है ।
मति सूक्ष्मं तथा निम्नं पुच्छं हस्तद्वयान्वितम् ।
लिंगं हस्तप्रमाणन्तु तथाण्डौ चतुरंगुलौ ॥
मार्गस्थानं चतुर्विंशद् हृदयं षोडशात्मकम् ।
५, कटिकक्षान्तरं प्रोक्तं चत्वारिंशत्प्रमाणकम् ॥
में नेशत्यन्त महीन बालोंसे युक्त दो हाथ लंबी पूछ, गुह्येन्द्री