शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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एक हाथ लंबी, अंड चार अंगुल, गुदामार्ग २४ अँगुल, छाती
१६ अंगुल कटि और कच्छका मध्यम प्रदेश ४० अंगुलका होताहै ।
इसी तरह फारसी ग्रन्थोंमें लिखा है कि घोडेकी गर्दन ४० अं-
गुल दुमसे सिरतक १६० अंगुल, ऊँचाई १०० अंगुल होती है,
इस प्रमाणवाले घोडे अच्छे समझे जाते हैं जो इससे न्यूनाधिक
होते हैं वे उत्तम नहीं होते ।
नापनेकी रीति-एक आदमी डोरका एक सिरा पकड कर कंधे
पर लगादे और दूसरा आदमी इसे सुमतक लेजाय यही ऊ-
चाई होती है । लंबाई जाननेकी यह रीति है कि आंखके कोण
से दुमकी जड तक नापा जाता है ।
उपयोगमें लानेका समय-जब तक घोडेका बच्चा चार वर्षका
होता है तब तक उसकी अवस्था बालक समझना चाहिये, इस
व्यवस्था में उससे किसी प्रकार का परिश्रम लेना उचित नहीं है,
इस समय उनको कार्य में लगाने से उनकी युवा अवस्था में ही
बुढापा आ जायगा और वे किसी काम के नहीं रहते हैं ।
परन्तु इस समय में भी उनको लगाम का अभ्यास कराता रहें
पांच वर्ष से ऊपर यौवन काल आता है, तभी से उनको काम
सिखलाने का यत्न करना चाहिये बीस वर्षकी अवस्था तक ये
हर प्रकार के कठिन काम कर सकते हैं, बीस वर्ष से ऊपर वृद्धा
वस्था आ जाती है इस समय काम लिया जावै तो बहुत दिन
तक काम दे सकते हैं ।
संस्कृत ग्रन्थसे ऋतुचर्यादि वर्णन ।
कूपोदकं सदा शस्तं पानाय जलदागमे ।
अभ्यंगे कटु तैलेन निर्वातस्थानबन्धनम् ॥