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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 32

शालिहोत्रम् । १३
दन्त और दूसरे को द्वितीय पेषण दंत कहते हैं । जब बच्चा
सात दिन का हो जाता है तब उसके प्रत्येक जावडे में दो
छेदन दंत निकल आते हैं । जो दांत पैदा होने ही साथ
निकलते हैं उन्हें क्षीर दंत कहते हैं । पांच सप्ताह के पीछे
सामने की ओर दो छेदन दंत तथा एक पेषण दंत और निकल
आता है तथा आठवें महीने में साम्हने की ओर दो छेदन दंत
और निकल आते हैं, इन सब दांतों का रङ्ग अत्यन्त सफेद होता
है और इनके ऊपर एक काले रङ्ग का छोटा गढ़ाभी होता है ।
जब बच्चा बारह महीने का हो जाता है तौ चौथा पेषण दंत
और दो वर्ष में पांचवां और कुछ दिन पीछे छटा दांत निकल
आता है ।
त्रिंशन्मासोद्भवास्सर्वे अखण्डाः परिकीर्तिताः ।
द्वौ स्यातां वाः त्रय स्स्यातामूर्ध्वाधस्तु यथाक्रमम् ॥
ढाई वर्षकी अवस्थासे ऊपर दो तीन महीने निकल जाने पर
बीचके दो छेदन दंत गिरकर उनकी जगह ऊपर नीचेके जावडों
में क्रम से दो और तीन स्थायी दंत निकल आते हैं जिन्हें
अखण्ड बोलते हैं, यह दांत भी सफेद गड्ढेदार होते हैं ।
चतुर्भिर्वत्सरैर्दन्ताश्चत्वारः पतितोत्थिताः ।
पञ्चभिर्हुदन्तेषु जायन्ते त्वथकालिका ॥
जब घोडा साडे तीन वर्ष से ऊपर और चार वर्ष के भीतर
होता है तब उसके दो छेदन दंत और गिर कर दो बडे
दांत ऊपर की ओर और निकल आते हैं और पांचवें
वर्ष के अन्त तक शेष दो दांत निकल आते हैं इसी अवसर
में नेश भी निकल आती हैं । जो नेश निकलती है तौ हरएक