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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 42

शालिहोत्र । २३
गति को कहते हैं, जिसमें सवार के हाथ से पानी भरे हुए
कटोरों में से बूंद भी न पडे ।
( २ ) गला उठाकर अगले पैरों को घुमाकर चलने का नाम
इन्गा है ।
( ३ ) गर्दन और सिर इतना उठाले कि सवार की पगड़ी
भी दिखाई न दे ।
( ४ ) चारों पांव से एक ही बार उछल उछल कर कूदता
चले उसे रहोवाल कहते हैं ।
घोडे के चार अङ्ग ।
दीर्घाणि चत्वार्यथ चोन्नतानि चत्वारि रक्तान्यतिसूक्ष्म-
ङ्गानि । ह्रस्वानि चत्वार्यथ चायतानि भूयस्तु चत्वार्यथ
निम्नानि ।
घोडेके अङ्ग प्रत्यंगोंमें चार दीर्घ, चार उन्नत, चार रक्त, चार
सूक्ष्म, चार लघु, चार विस्तृत और चार निम्न ग्रहण किये
गये हैं । यथाः—
आस्यं भुजौ केश कटी च दीर्घमेतच्चतुष्कन्तुरगस्य शस्तम् ।
तथोन्नते प्राणपुटे ललाटे शक्रश्च तज्ज्ञाश्चरणौ वदन्ति ॥
मुख, भुजा, केश, और कटि ये चार दीर्घ अच्छे होते हैं ।
नासिका, मस्तक, खुर और चरण ये चार उन्नत अच्छे होते हैं ।
ओष्ठौ च जिह्वात्वथ, तालुकश्च मेऽढ्रं सुरक्तं शुभदं हयस्य ।
लघूनि बन्धाश्चरणौ सुकोष्ठे श्रोत्राणि सर्वाणि तथैव पुच्छम् ॥
ओष्ठ, जिह्वा, तालु, और पेढू ये चार रक्त वर्णके अच्छे होतेहैं.
इसी तरह बन्ध, कोष्ट, कान और पूंछ छोटे अच्छे होते हैं ।
करणान्तरी कर्णसमन्विता च वंशी तथा ह्रस्वतरं प्रशस्तम् ।