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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 130 में से

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पृष्ठ 25

६ शालिहोत्रम् ।
जिस घोडे की कुक्षिपर एक आवर्त्त होता है वह शीघ्र ही
मर जाता है और यदि एकही स्थान पर ऐसे दो घोडे होंतो
मालिक को भी भारी होते हैं ।
जिस घोडे के जानुपर एक आवर्त्त होता है उसका मालिक
क्लेशयुक्त होकर सदा प्रदेश में वास करता है
जिसके मेढ्रके नीचे आवर्त होता है वह अशुभ है ।
जिसकी त्रिवली में आवर्त होता है वह उत्तम होता है और
उसे श्रीपार्श्व कहते हैं ।
अशुभ घोडों के लक्षण–जिस घोडेकी जिव्हा काली होता है,
वह कृष्णजिव्हा कहलाता है, जिसके तालुमें काला रंग होता है
वह कृष्णतालु, जिसके दांत छोटे बडे, ऊँचे नीचे होते हैं वह
कराली, जिसका संपूर्ण देह एक पांव दूसरे रंगका वह मुशली
कहाता है, जिसके छेदन दंत चार या पांच हों वह हीन दन्त,
और जिसके सात वा आठ दंत हों वह अधिक दन्त कहाता है
जिसके कानके पास आवर्त होता है वह शृंगी है, ये छः प्रकार
के घोडे अपने स्वामी का अनिष्ट चाहते हैं ॥
जिसका एक अंडकोष बढ गया हो वह एकाण्ड कहाता है,
जिसके दोनों अंड बडे हैं। वह जातकांड, जिसका कोई अंग
हीन हो वह हीनाङ्ग जिसका कोई अंग अत्यंत बढ गया हो
वह अधिकांग कहाता है ये चारों प्रकारके घोडे अशुभ समझे
जावे हैं ॥
जिसका सब देह एक रंग का और सिर काले रंग का होता है