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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 130 में से

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पृष्ठ 39

२० शालिहोत्रम् ।
नाभि के पास जिस घोडे के यह दस भौंरी नहीं होती हैं वह
उत्तम नहीं समझे जाते हैं ।
भौंरियों के नाम ।
टीके के पास वाली भौंरी को ढकनी कहते हैं, यह भौंरियां
यदि एक वा दो से अधिक होंतो सीकन कहते हैं । ईरानी वा
मुग़ल लोग इसे खेश वा हेजचल कहते हैं । पञ्जाबी लोग दो
गर और कोई कोई चुनक भी कहते हैं जुल्फ के नीचे की
भौंरी एक, दो वा तीन हों तो उसे नसरत बीनी कहते हैं
यवन लोग इसे अच्छा बताते हैं ।
आंसू ढाल की पहिचान-आंख के कोने के दाहिनी वा बाईं
ओर हो अथवा कान के ऊपर नीचे होवे तो बुरी होती है ।
अरवल की पहिचान-कानों की जड में या ठुड्डी के दोनों ओर
या सिर के ऊपर होवे तो सिर की भौंरी को छोडकर सबका
नाम अर्रवल है, जो दो २ भौंरी होवें तो अच्छी और जो एक
एक हो तो बुरी होती है ।
चांद सूरज की पहिचान-सिर के ऊपर की दो भौंरियों को
चांद सूरज कहते हैं ये शुभ होती हैं ।
गंदा बागल की पहिचान-पिंडली, घुटने, गुह्येन्द्रिय और
दुम इनमें से किसी जगह पर भौंरी हो तो अशुभ होती है,
और इन भौंरियों का नाम गंदाबागल है ।
मारुत की पहिचान-घुटने के पीछे, अंडकोश के नीचे ऊपर
नाभिके ऊपर नीचे, एक वा दोनों कंधोंके ऊपर, मुँहपर या ओष्ठ
के नीचे जो भौंरियां होती हैं वह सब अशुभ होती हैं ।